जेपीसी ने शीर्ष पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों को ‘पद से हटाने’ की जगह ‘निलंबन’ की दी सलाह, और भी दिए कई अहम सुझाव

Pramod Kumar,News11 Bharat,

‘गंभीर अपराध’ के मामलों में कम से कम पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा पर ही कार्रवाई की दी सलाह

न्यूज11  भारत

रांची/डेस्क: मानसून सत्र में मोदी सरकार कई अहम विधेयक सदन पटल पर रखने वाली हैं, इनमें एक महत्वपूर्ण विधेयक है, आपराधिक मामलों में पीएम-सीएम को हटाने वाला बिल. मानसून सत्र जो कि 20 जुलाई से शुरू हो रहा है, सत्र शुरू होने से पहले बड़ी जानकारी निकल करआ रही है कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के जो 130वें संविधान संशोधन विधेयक आने वाला है उस पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने कई अहम सिफारिशें की हैं. समिति ने की सिफारिश है कि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को हमेशा के लिए पद से बेदखल करने के बजाय 'निलंबन' ज्यादा सही कदम होगा. इसके पीछे समिति का तर्क है कि अदालत का आखिरी फैसला आने से पहले स्थायी रूप से हटाना जाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा.

जेपीसी ने सुझाव दिया है कि मसौदे में ‘पद से हटाने’ (Removal) शब्द की जगह ‘निलंबन’ (Suspension) शब्द को शामिल किया जाना चाहिए. समिति का कहना है कि यदि प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों या मुख्यमंत्रियों पर गंभीर आरोप लगते हैं, तो मुकदमों का अंतिम फैसला आने तक उन्हें सिर्फ अस्थायी निलंबित किया जाना ज्यादा उचित होगा. इससे उच्च संवैधानिक पदों की मर्यादा के साथ न्यायिक प्रक्रिया भी सुरक्षित रह पाएगा.

इसके साथ ही जेपीसी का विरोध समय सीमा को लेकर भी देखने को मिल रहा है. समिति का कहना है कि यदि कोई प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो 31वें दिन उसका पद स्वतः ही समाप्त मान लिया जाएगा. जेपीसी ने इस पर असहमति जताते हुए कहा कि महज हिरासत को आधार बनाकर पद छीन लेना असंवैधानिक होगा. दोषी या बेगुनाह सिद्ध करना अदालत का काम है, इसलिए ऐसा अंतिम फैसले के बाद होना चाहिए.

जेपीसी ने ‘गंभीर अपराध’ को भी परिभाषित करने की सलाह दी है. समिति की सलाह है कि गंभीर अपराध मामलों में केवल उन्हीं मामलों को शामिल किया जाना चाहिए जिनमें कम से कम पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो. 

समिति ने एक महत्वपूर्ण सलाह यह भी दी है कि यदि आरोपी जनप्रतिनिधि अदालत से ससम्मान बरी हो जाता है, या फिर तय समय सीमा के भीतर कानूनी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती है, तो उसका निलंबन अविलंब समाप्त कर दिया जाना चाहिए. साथ ही प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों जैसे शीर्ष पदों के मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक या विशेष अदालतों में समयबद्ध तरीके से की जानी चाहिए. 

यह भी पढ़ें: रांची में अगस्त में सजेगा भव्य झारखंड आदिवासी महोत्सव-2026, 700 ड्रोन शो, 5D थिएटर, एआई चैटबॉट होंगे मुख्य आकर्षण