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रांची/डेस्क: जमशेदपुर में दो मासूम बच्चों की हत्या के करीब 13 साल पुराने मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने आरोपी मां शमा परवीन की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है. जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने उसकी अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को सही माना. कोर्ट ने कहा कि मामले में मौजूद Circumstantial Evidence की कड़ियां आरोपी की भूमिका की ओर इशारा करती हैं. शमा परवीन को जमशेदपुर कोर्ट ने जुलाई 2021 में IPC की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद के साथ 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी.
19 मई 2013 की रात हुई थी घटना
अभियोजन के अनुसार, 19 मई 2013 की शाम करीब 7:30 बजे शमा परवीन अपने दो बेटों, 4 वर्षीय कासिफ उमर और 2 वर्षीय सरिफ उमर, को लेकर मनजूर आलम के घर गई थी. देर रात तक उसके वापस नहीं लौटने पर पति मोहम्मद रकीब ने उसकी तलाश की, लेकिन वह नहीं मिली. अगली सुबह शमा सड़क किनारे परेशान हालत में मिली. कुछ देर बाद पड़ोसी ने रकीब को बताया कि उसके दोनों बच्चे पास के नाले में पड़े हैं. मौके पर पहुंचने पर दोनों बच्चों के शव कपड़े में लिपटे मिले. उनके शरीर पर चोट के निशान थे. पुलिस को सूचना दी गई और शवों को MGM अस्पताल ले जाया गया.
बच्चों की हत्या का लगाया गया था आरोप
मामले में आरोप लगाया गया था कि मनजूर आलम का शमा परवीन के साथ संबंध था और वह उससे शादी करना चाहता था. अभियोजन के अनुसार, दोनों बच्चे इस रिश्ते में बाधा थे और इसी वजह से उनकी हत्या की गई. इस मामले में साकची थाना कांड संख्या 159/2013 दर्ज किया गया था. पुलिस ने जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की और मामला सेशन कोर्ट पहुंचा.
पोस्टमार्टम में मिले थे चोट के निशान
डॉक्टर ने दोनों बच्चों का पोस्टमार्टम किया था. छोटे बच्चे सरिफ के शरीर पर गर्दन और दोनों हाथों पर धारदार हथियार से चोट के निशान पाए गए. वहीं, दोनों बच्चों के शरीर पर मुंह और गर्दन समेत कई जगह केमिकल बर्न के निशान भी मिले थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दोनों की मौत का कारण poisoning बताया गया था.
घटनास्थल से मिले थे कई अहम सुराग
जांच के दौरान पुलिस ने घटनास्थल से कई जगहों से खून के नमूने और खून लगी मिट्टी बरामद की. नाले के पास एक साड़ी का पल्लू भी मिला, जिसके बारे में जांच अधिकारी ने कहा कि वह शमा द्वारा पहनी गई साड़ी से मिलता था. जांच अधिकारी के अनुसार, शमा के कथित बयान के आधार पर खून लगी ब्लेड और चूड़ियां भी बरामद की गई थीं. पुलिस ने इन सामानों को जांच के लिए फॉरेंसिक लैब भेजा था.
प्रत्यक्षदर्शी नहीं था, कई गवाह बयान से पलटे
इस मामले में अभियोजन ने नौ गवाह पेश किए थे, लेकिन कई गवाहों ने अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया और उन्हें hostile घोषित कर दिया गया. घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी भी नहीं था. बचाव पक्ष ने हाईकोर्ट में इसी आधार पर कहा कि मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर टिका है और आरोपी को इसका लाभ मिलना चाहिए. बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि असली हत्या मनजूर आलम ने की थी.
आरोपी ने खुद को बताया था निर्दोष
शमा परवीन ने अदालत में अपने बचाव में कहा था कि वह अपने पति से संबंधित कर्ज की रकम और गिरवी रखे आभूषण वापस लेने के लिए मनजूर आलम के घर गई थी. उसके अनुसार, वहां मनजूर ने उसके साथ गलत व्यवहार किया और उसके हाथ-मुंह बांध दिए. उसने आरोप लगाया कि मनजूर ने ही दोनों बच्चों को कुछ पिलाया और उनकी हत्या की. शमा ने खुद के बच्चों की हत्या में शामिल होने से इनकार किया था.
हाईकोर्ट ने हालात से जुड़े सबूत को माना महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने पूरे मामले की परिस्थितियों को एक साथ देखा. कोर्ट ने कहा कि घटना वाली शाम आरोपी अपने दोनों बच्चों को लेकर मनजूर आलम के घर गई थी. अगले दिन वह सड़क किनारे परेशान हालत में मिली और उसके बाद दोनों बच्चों के शव नाले से बरामद हुए.
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि जांच में खून लगी ब्लेड और चूड़ियों की बरामदगी हुई तथा बच्चों को जिस कपड़े में लपेटा गया था, उसका संबंध आरोपी की साड़ी से जोड़ा गया. अदालत ने इन सभी परिस्थितियों को महत्वपूर्ण माना.
हाईकोर्ट ने कहा- सजा में हस्तक्षेप का आधार नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि मामले की परिस्थितियां एक-दूसरे से जुड़ती हैं और आरोपी की भूमिका की ओर इशारा करती हैं. अदालत के अनुसार, आरोपी इन परिस्थितियों को लेकर कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सकी. डिवीजन बेंच ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का उचित तरीके से मूल्यांकन किया था और दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है. इसके साथ ही हाईकोर्ट ने शमा परवीन की अपील खारिज कर दी और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी.
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