एक व्यक्ति, एक संकल्प और हरित क्रांति की आधी सदी: डॉ. कौशल किशोर जायसवाल का वनराखी आंदोलन

Vaibhaw Vikram

संतोष श्रीवास्तव/न्यूज़ 11 भारत
पलामू /डेस्क:
जब पर्यावरण संरक्षण की चर्चा भी आम नहीं थी, तब पलामू की धरती से एक युवा ने प्रकृति को बचाने का संकल्प लिया. वर्ष 1966 के भीषण अकाल ने उसके मन पर ऐसी छाप छोड़ी कि उसने अपना जीवन जंगल लगाने, वृक्ष बचाने और पर्यावरण जागरूकता के लिए समर्पित कर दिया. वह युवा आज देश-विदेश में पर्यावरणविद के रूप में पहचान बना चुके डॉ. कौशल किशोर जायसवाल हैं, जिनके 'वनराखी मूवमेंट' ने इस वर्ष अपने गौरवशाली 50 वर्ष पूरे कर लिए हैं.

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर देशभर में वनराखी आंदोलन की स्वर्ण जयंती समारोह श्रृंखला आयोजित की जा रही है. पर्यावरण धर्म और वृक्ष संरक्षण को जन-आंदोलन का स्वरूप देने वाले डॉ. कौशल का अभियान आज सीमाओं को लांघकर अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है.

अकाल से मिली प्रेरणा, पर्यावरण बना जीवन का धर्म
डॉ. कौशल बताते हैं कि 1966 के महाअकाल ने उन्हें प्रकृति और मानव जीवन के गहरे संबंध को समझने का अवसर दिया. उन्होंने महसूस किया कि जल, जंगल और पर्यावरण के बिना मानव सभ्यता का अस्तित्व संभव नहीं है. इसी सोच ने उन्हें 'पर्यावरण धर्म' और 'वनराखी मूवमेंट' की स्थापना के लिए प्रेरित किया. उनका मानना है कि 'ऊपर सूर्य देव और नीचे वृक्ष देव हैं. यदि ये दोनों नहीं रहेंगे तो पृथ्वी पर जीवन की कल्पना भी संभव नहीं होगी.'

पांच दशक का संघर्ष, लाखों पौधों का हरित संदेश
पिछले छह दशकों में डॉ. कौशल ने देश के 26 राज्यों के 181 जिलों के साथ-साथ नेपाल, भूटान, म्यांमार, सिंगापुर, मलेशिया, अज़रबैजान, थाईलैंड, इंडोनेशिया, जापान और वियतनाम सहित कई देशों में पर्यावरण संरक्षण का संदेश पहुंचाया है. उनके नेतृत्व में अब तक लगभग 59 लाख पौधों का निःशुल्क वितरण एवं रोपण किया जा चुका है. वहीं 26 लाख से अधिक वृक्षों पर रक्षाबंधन कर उन्हें संरक्षण का प्रतीक बनाया गया है. उनका मानना है कि वृक्ष केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य हैं और उनकी रक्षा हमारा नैतिक दायित्व है.

डाली का जंगल: जुनून की जीवंत मिसाल
पलामू जिले के छतरपुर अनुमंडल अंतर्गत ग्राम पंचायत डाली आज डॉ. कौशल की तपस्या का सजीव उदाहरण है. जहां कभी बंजर भूमि थी, वहां आज हरियाली का विस्तृत संसार विकसित हो चुका है. डाली स्थित मोहनलाल खुर्जा-पार्वती देवी पार्क में 22 देशों की 200 से अधिक प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं, जिनमें अनेक दुर्लभ एवं औषधीय प्रजातियां शामिल हैं. यह क्षेत्र आज पर्यावरण प्रेमियों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए अध्ययन एवं प्रेरणा का केंद्र बन गया है.

दुनिया का पहला 'पर्यावरण धर्म ज्ञान वृक्ष देव मंदिर'
डॉ. कौशल की सोच केवल पौधारोपण तक सीमित नहीं रही. उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना से जोड़ने का प्रयास किया. इसी दिशा में 12 फरवरी 2026 को डाली में दुनिया के पहले 'पर्यावरण धर्म ज्ञान वृक्ष देव मंदिर' का उद्घाटन किया गया.

इस अनूठे मंदिर की विशेषता यह है कि यहां ईंट-पत्थर की पारंपरिक संरचना नहीं, बल्कि वृक्ष ही देवस्वरूप माने जाते हैं. मंदिर का उद्घाटन अमेरिका के शोधकर्ता जॉर्ज जेम्स, कर्नाटक के प्रसिद्ध पर्यावरणविद एवं आपीको आंदोलन के नेता पांडुरंग हेगड़े सहित विभिन्न राज्यों से आए पर्यावरण विशेषज्ञों की उपस्थिति में किया गया. आज प्रतिदिन सैकड़ों लोग यहां पहुंचकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश सीख रहे हैं और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझ रहे हैं.

जब लोग कहते थे 'पागल', आज वही आंदोलन बना प्रेरणा
डॉ. कौशल के संघर्ष का प्रारंभिक दौर आसान नहीं था. जब वे अपनी गाड़ी में पौधे लेकर गांव-गांव जाते थे, तब कई लोग उनका मजाक उड़ाते थे. उन्हें "पागल" तक कहा जाता था. लेकिन उन्होंने आलोचनाओं की परवाह किए बिना अपना अभियान जारी रखा. कोरोना महामारी के दौरान जब ऑक्सीजन की कमी ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया, तब लोगों को उनके वर्षों पुराने संदेश का महत्व समझ में आया. डॉ. कौशल कहते हैं कि "जब मैं जल संकट और ऑक्सीजन संकट की बात करता था, तब लोग हंसते थे. लेकिन कोरोना ने बता दिया कि जीवन के लिए सबसे आवश्यक क्या है."

किसानों को सिखाई 'वृक्ष खेती' की अवधारणा
डॉ. कौशल ने दशकों पहले किसानों को वृक्ष आधारित खेती का महत्व समझाया. उनका कहना है कि वृक्ष किसानों के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट की तरह होते हैं. सूखा, बाढ़ या विपरीत परिस्थितियों में भी वृक्ष भविष्य की आर्थिक सुरक्षा प्रदान करते हैं. वे कहते हैं कि वन राष्ट्र की अमूल्य संपत्ति हैं. इन्हें काटना ही नहीं, अनावश्यक क्षति पहुंचाना भी प्रकृति के प्रति अपराध है.

पाठ्यपुस्तकों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहचान
डॉ. कौशल के पर्यावरणीय योगदान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है. उनकी जीवनी सीबीएसई बोर्ड की कक्षा आठ और आईसीएसई बोर्ड की कक्षा छह के पाठ्यक्रम में शामिल की जा चुकी है. झारखंड के कई शैक्षणिक कार्यक्रमों में भी उनके कार्यों का अध्ययन कराया जाता है. उनके जीवन और कार्यों पर आधारित प्रश्न विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं तथा लोकप्रिय ज्ञान कार्यक्रमों में भी पूछे जा चुके हैं. अब तक उन्हें लगभग 80 सम्मान प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें 10 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी शामिल हैं.

एक व्यक्ति का संकल्प, जन-आंदोलन की सफलता
वनराखी आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह किसी संस्था या सरकार का अभियान नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के संकल्प से शुरू होकर जन-आंदोलन में परिवर्तित हुआ है. आज हजारों लोग इस अभियान से जुड़कर वृक्ष संरक्षण और पर्यावरण संवर्धन का कार्य कर रहे हैं. स्वर्ण जयंती वर्ष में प्रवेश कर चुका यह आंदोलन आने वाली पीढ़ियों के लिए संदेश देता है कि यदि संकल्प दृढ़ हो तो एक अकेला व्यक्ति भी समाज और प्रकृति दोनों की दिशा बदल सकता है.

विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का अवसर नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति अपने दायित्व को समझने का दिन है. डॉ. कौशल किशोर जायसवाल की जीवन यात्रा हमें बताती है कि पर्यावरण संरक्षण कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन जीने की संस्कृति है. आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जल संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब वनराखी आंदोलन जैसी पहले आशा की नई किरण बनकर उभर रही हैं. प्रकृति की रक्षा ही मानवता की रक्षा है, और यही संदेश डॉ. कौशल के पांच दशक लंबे संघर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि है.

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