न्यूज़11 भारत
रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने मुस्लिम दंपती के वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में गिरिडीह फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें पत्नी को पति के साथ दोबारा वैवाहिक जीवन शुरू करने का निर्देश दिया गया था. हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली यानी restitution of conjugal rights के मामले में केवल पति के अधिकार को देखना पर्याप्त नहीं है. अदालत को यह भी देखना होगा कि पत्नी को पति के साथ रहने के लिए बाध्य करना न्यायसंगत और परिस्थितियों के अनुरूप है या नहीं. मामले की सुनवाई जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की डिवीजन बेंच ने की. कोर्ट ने पत्नी की ओर से लगाए गए क्रूरता और मारपीट के गंभीर आरोपों, पुलिस में दर्ज मामले तथा उपलब्ध साक्ष्यों को महत्वपूर्ण मानते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश में गंभीर त्रुटि पाई.
क्या था पूरा मामला?
मामला गिरिडीह जिले के बेंगाबाद/देवरी क्षेत्र से संबंधित है. दोनों की शादी 27 मई 2013 को मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार हुई थी. शादी के बाद दोनों पति-पत्नी के रूप में रहने लगे. पति का आरोप था कि शादी के करीब दो साल बाद पत्नी का व्यवहार बदल गया और वह पति पर अपने माता-पिता से अलग रहने का दबाव बनाने लगी. पति के मुताबिक, बाद में वह पत्नी को अपने कार्यस्थल बेंगलुरु ले गया, जहां दोनों करीब दो साल तक साथ रहे. इसके बाद जब पत्नी वापस ससुराल आई तो फिर विवाद शुरू हो गया. पति ने यह भी दावा किया कि संतान नहीं होने पर उसने पत्नी का इलाज कराया और इलाज पर करीब 2 लाख रुपये खर्च किए. इसके बाद पत्नी गर्भवती हुई, लेकिन करीब तीन महीने बाद गर्भपात हो गया.
पति का आरोप- पत्नी सामान लेकर मायके चली गई
पति के अनुसार, 10 अप्रैल 2022 को उसकी अनुपस्थिति में पत्नी अपने भाई, बहन, मां और अन्य परिजनों के साथ ससुराल आई और घर से करीब 1 लाख रुपये नकद, 2 लाख रुपये के आभूषण तथा अन्य सामान लेकर चली गई. पति का यह भी कहना था कि पत्नी उसके साथ नहीं रहना चाहती थी और खुला (Khula) लेना चाहती थी. उसने पत्नी को वापस लाने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास करने के अलावा समुदाय के लोगों और अंजुमन के पदाधिकारियों की मदद भी ली. पति के अनुसार, 29 मई 2022 को दोनों पक्षों के बीच पंचायत भी हुई, लेकिन पत्नी ससुराल लौटने के लिए तैयार नहीं हुई. इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट में वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए मुकदमा दायर किया.
पत्नी ने लगाए गंभीर क्रूरता के आरोप
दूसरी ओर, पत्नी ने पति के आरोपों को पूरी तरह नकार दिया. उसका कहना था कि पति और उसके परिवार के सदस्य उसके साथ क्रूर व्यवहार करते थे और उसे प्रताड़ित करते थे. पत्नी की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि पति ने उसके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं किए और उसे संतान न होने को लेकर ताने दिए जाते थे. उसके भाई ने अदालत में गवाही देते हुए आरोप लगाया कि पत्नी को दहेज के लिए भी प्रताड़ित किया गया और उसके साथ मारपीट की गई.
पत्नी ने खुद भी अदालत के समक्ष आरोप लगाया कि पति और उसके परिवार के सदस्य उसे लगातार शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे. उसने दावा किया कि 8 जुलाई 2022 को उसके साथ मारपीट और जानलेवा हमला किया गया, जिसके बाद वह किसी तरह अपनी जान बचाकर अपनी बहन के घर पहुंची और देवरी थाना में लिखित शिकायत दी. इसके आधार पर देवरी थाना कांड संख्या 92/2022 दर्ज किया गया.
पत्नी ने बताया- पति ने सार्वजनिक रूप से तलाक दिया
पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि पति ने उसे सार्वजनिक रूप से तलाक देने की बात कही थी, लेकिन जब लोगों ने लिखित रूप में तलाक देने को कहा तो उसने ऐसा नहीं किया. इसके बाद पत्नी ने पश्चिम बंगाल के काजी-ए-अदालत/काजी-ए-शरियत के समक्ष आवेदन दिया. आदेश के अनुसार, संबंधित काजी कार्यालय की ओर से पति को कई बार नोटिस भेजा गया, लेकिन उसके उपस्थित नहीं होने के बाद 9 नवंबर 2023 को उपलब्ध दस्तावेजों और गवाहों के आधार पर पत्नी का खुला स्वीकार किया गया. पत्नी ने अदालत के समक्ष खोलनामा प्राप्त होने की बात भी कही.
फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में दिया था फैसला
गिरिडीह फैमिली कोर्ट ने मामले में पांच प्रमुख मुद्दे तय किए थे. इनमें वैवाहिक अधिकारों की बहाली का मुकदमा सुनवाई योग्य है या नहीं, पति के पास मुकदमा दायर करने का कारण था या नहीं, मुस्लिम कानून के तहत अदालत का अधिकार क्षेत्र, पत्नी के पति से अलग रहने का कारण और क्या पति वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री पाने का हकदार है-जैसे सवाल शामिल थे. फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में फैसला देते हुए पत्नी को पति के साथ वापस जाकर वैवाहिक जीवन शुरू करने का निर्देश दिया था. इसी फैसले को पत्नी ने झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
हाईकोर्ट ने कहा- मुस्लिम कानून में भी अदालत को परिस्थितियां देखनी होंगी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में मुस्लिम कानून के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली से संबंधित प्रावधान पर विस्तार से चर्चा की. कोर्ट ने Mulla's Principles of Mohammedan Law की धारा 281 का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि पत्नी बिना वैध कारण पति के साथ रहना बंद कर देती है तो पति वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए मुकदमा कर सकता है. हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि पति के पक्ष में हर मामले में स्वतः वैवाहिक अधिकारों की बहाली का आदेश दे दिया जाए. कोर्ट ने कहा कि यदि उपलब्ध साक्ष्यों से यह सामने आता है कि पति ने पत्नी को अनावश्यक रूप से प्रताड़ित किया है या उसका ऐसा आचरण रहा है जिससे पत्नी को उसके साथ रहने के लिए बाध्य करना अन्यायपूर्ण होगा, तो अदालत वैवाहिक अधिकारों की बहाली की राहत देने से इनकार कर सकती है.
"पत्नी को वापस भेजने से पहले देखना होगा कि उसके लिए वहां रहना सुरक्षित है या नहीं"
हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली का फैसला केवल पति के अधिकार पर आधारित नहीं हो सकता. फैमिली कोर्ट को यह भी देखना होगा कि परिस्थितियों को देखते हुए पत्नी को पति के साथ रहने के लिए मजबूर करना अन्यायपूर्ण या असमान तो नहीं होगा. कोर्ट ने कहा कि कानून को आधुनिक सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप समझने की जरूरत है. ऐसा कोई नियम नहीं है जिसके तहत अदालत को हर मामले में पति के पक्ष में वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री देनी ही पड़े. यदि परिस्थितियां ऐसी हों कि पत्नी को पति के साथ रहने के लिए बाध्य करना न्यायसंगत न हो, तो अदालत राहत से इनकार कर सकती है.
पत्नी के क्रूरता के आरोपों को हाईकोर्ट ने माना महत्वपूर्ण
डिवीजन बेंच ने कहा कि पत्नी ने अपने पति और ससुराल वालों पर गंभीर क्रूरता के आरोप लगाए थे. उसके मुताबिक, उसके साथ मारपीट की गई, उस पर जानलेवा हमला हुआ और वह किसी तरह वहां से निकलकर अपनी बहन के घर पहुंची. इसके बाद उसने देवरी थाना में शिकायत दर्ज कराई और पुलिस केस दर्ज हुआ. हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि फैमिली कोर्ट ने इस पहलू को उचित तरीके से नहीं तौला. कोर्ट के अनुसार, रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से यह स्पष्ट था कि पत्नी ने क्रूरता के गंभीर आरोप लगाए थे और उसके भाई की गवाही ने भी उन आरोपों को समर्थन दिया था.
फैमिली कोर्ट को "सिर्फ सबूत" नहीं, विवाद की जड़ भी देखनी चाहिए
फैसले में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की भूमिका को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की. कोर्ट ने Family Courts Act की धारा 14 का उल्लेख करते हुए कहा कि पारिवारिक विवादों में अदालत केवल भारतीय साक्ष्य अधिनियम के कठोर नियमों तक सीमित नहीं है. वह ऐसी रिपोर्ट, बयान, दस्तावेज या अन्य सामग्री पर भी विचार कर सकती है जो विवाद को प्रभावी ढंग से समझने और निपटाने में मदद करे. कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवादों में फैमिली कोर्ट का दृष्टिकोण सामान्य सिविल मुकदमों से अलग होना चाहिए. अदालत को केवल तकनीकी तौर पर साक्ष्यों को देखने के बजाय विवाद के पीछे की वास्तविक वजह और दोनों पक्षों के बीच मतभेद की जड़ को समझने का प्रयास करना चाहिए.
"यह नहीं कहा जा सकता कि पत्नी अपनी मर्जी से घर छोड़कर चली गई"
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का विश्लेषण करते हुए कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें यह कहा जा सके कि पत्नी ने अपनी इच्छा से और बिना किसी दबाव या कारण के वैवाहिक घर छोड़ा. कोर्ट के अनुसार, उपलब्ध मौखिक साक्ष्यों से यह सामने आता है कि पत्नी अपने वैवाहिक घर में विभिन्न कथित क्रूरता की घटनाओं के कारण सहज नहीं थी. ऐसी परिस्थितियों में यदि पत्नी घर छोड़ती है तो केवल इस आधार पर पति को वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री नहीं दी जा सकती कि पत्नी घर छोड़कर चली गई.
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश "perverse" माना
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि गिरिडीह फैमिली कोर्ट ने पूरे तथ्यात्मक परिदृश्य और उपलब्ध साक्ष्यों का उचित तरीके से मूल्यांकन नहीं किया. विशेष रूप से पत्नी के साथ मारपीट और जानलेवा हमले के आरोप तथा उसके आधार पर दर्ज पुलिस केस को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया. डिवीजन बेंच ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने उचित विचार-विमर्श और साक्ष्यों के समुचित मूल्यांकन के बिना वैवाहिक अधिकारों की बहाली का आदेश दिया. हाईकोर्ट ने इस आदेश को perverse यानी साक्ष्यों के उचित मूल्यांकन के विपरीत माना.
Family Court का फैसला रद्द, पत्नी की अपील मंजूर
अंततः झारखंड हाईकोर्ट ने पत्नी की अपील स्वीकार कर ली. अदालत ने गिरिडीह फैमिली कोर्ट के उस फैसले और डिक्री को रद्द कर दिया, जिसके तहत पत्नी को पति के साथ वैवाहिक जीवन बहाल करने का निर्देश दिया गया था. कोर्ट ने Original Suit No. 198 of 2022 में पारित फैमिली कोर्ट के फैसले और डिक्री को निरस्त कर दिया तथा अपील को मंजूर करते हुए मामले का निपटारा कर दिया. लंबित इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन भी समाप्त कर दी गईं.
फैसले का अहम संदेश
इस फैसले में झारखंड हाईकोर्ट ने साफ किया है कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली के मुकदमे में केवल पति का अधिकार ही निर्णायक नहीं है. अदालत को यह भी देखना होगा कि पत्नी के अलग रहने के पीछे कोई उचित कारण, क्रूरता, उत्पीड़न या ऐसी परिस्थिति तो नहीं है जिसके कारण उसे पति के साथ रहने के लिए बाध्य करना अन्यायपूर्ण हो. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मुस्लिम पति द्वारा वैवाहिक अधिकारों की बहाली का दावा किए जाने के बावजूद अदालत परिस्थितियों, उपलब्ध साक्ष्यों और पत्नी की सुरक्षा एवं हितों को ध्यान में रखकर राहत देने या न देने का निर्णय कर सकती है.