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रांची/डेस्क: महाराष्ट्र में If का But की राजनीति का पटाक्षेप हो गया. क्योंकि कई दिनों से महाराष्ट्र की राजनीति में मची हलचल अपने अंजाम पर पहुंच गई है. शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह लोकसभा सांसद एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए हैं. यानी जिस “ऑपरेशन टाइगर” की कई दिनों से चर्चा चल रही थी, वह सफल रही. यह न सिर्फ शिंदे गुट वाली शिवसेना का विस्तार चरण है, बल्कि देश की राजनीति में एनडीए को और भी बड़ी ताकत मिली है. इससे पहले पश्चिम बंगाल में भी बड़ा राजनीतिक उलटफेर हो चुका है. वहां टीएमसी के 20 लोकसभा सांसद NCPI में विलय के बाद एनडीए फोल्डर में आ चुके हैं.
सोमवार को मुंबई के वाई.बी. चव्हाण सेंटर में एकनाथ शिंदे की मौजूदगी में शिवसेना-यूबीटी के छह सांसद शिंदे गुट में शामिल हुए. सांसद संजय जाधव, भाऊसाहेब वाकचौरे, संजय देशमुख, नागेश पाटिल आष्टीकर, ओमराजे निंबालकर और संजय दीना पाटिल का एकनाथ शिंदे ने स्वागत किया और एकजुटता का परिचय भी दिया. बता दें कि अब उद्धव ठाकरे के पाले में अब केवल तीन सांसद बचे हैं.
पश्चिम बंगाल में टीएमसी में बगावत के बाद महाराष्ट्र की इस बगावत के बड़े राजनीतिक मायने हैं. इससे पहले आम आदमी पार्टी के भी 6 राज्यसभा सांसद बीजेपी के पाले में आ चुके हैं. इन राजनीतिक हलचलों का असर दिल्ली तक महसूस किया जा रहा है. राजनीति में इसे बीजेपी की एक सोची-समझी साजिश करार दिया जा रहा है. इस बड़ी टूट पर शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. वह इसे बाघ नहीं भेड़िया राजनीति करार दे रहे हैं. राउत ने आरोप लगाया कि सांसदों को तोड़ने के लिए 50 करोड़ रुपये का प्रलोभन दिया गया है. जो भी हो यूबीटी के 6 सांसदों का पाला बदलना संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत सदन में अयोग्यता कानून के दायरे में नहीं आता. क्योंकि दल बदल कानून से बचने के लिए मूल दल के कम से कम दो-तिहाई विधायी सदस्यों का अलग होना जरूरी है. चूकी उद्धव गुट के कुल नौ सांसद थे तो छह का टूटना ठीक दो-तिहाई का आंकड़ा है,
अब थोड़ी चर्चा बीजेपी और एनडीए के नजरिए से भविष्य में मिलने वाले लाभ की कर ली जाए. संसद के दोनों सदनों में बहुमत का आंकड़ा तो एनडीए के पास है, लेकिन दो तिहाई बहुमत के लिए उसे अभी भी मगजमारी करनी पड़ेगी. टीएमसी और शिवसेना-यूबीटी की टूट से दो तिहाई बहुमत की ओर थोड़ी और खिसकी है, लेकिन मंजिल अभी भी दूर है. ग्रीष्मकालीन सत्र की तरह केन्द्र सरकार मानसून सत्र में कोई गड़बड़ी नहीं होने देना चाहती, इसलिए इस बार वह पूरी तरह से फूंक-फूंक कर ही कदम उठाएगी. लेकिन सवाल अभी भी शेष है कि दोनों सदनों में वह दो तिहाई का आंकड़ा कैसे छू पाएगी?
अगले महीने यानी जुलाई में संसद का मॉनसून सत्र शुरू होगा. केन्द्र सरकार को विश्वास है कि मानसून सत्र महिला आरक्षण को लोकसभा और विधानसभा सीटों के नए परिसीमन से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण विधेयक को सदन से पारित करा लेगी. बीजेपी 2029 के आम चुनाव से पहले पूरे देश में 'एक देश, एक चुनाव भी कराना चाहती है.
अब सवाल है कि एनडीए सरकार इन विधेयकों को सदन में कैसे पास करापाएगी. वर्तमान में लोकसभा में 540 सांसद हैं. लोकसभा में किसी भी संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 360 वोटों की दरकार होगी. पिछले संसद सत्र में एनडीए सरकार 293 वोट ही जुटा पाई थी. पिछले सत्र और आगामी सत्र में जो राजनीतिक बदलाव हुए हैं, उसके अनुसार, तृणमूल कांग्रेस के 28 में से 20 बागी सांसदों और शिवसेना (यूबीटी) के 9 में से 6 बागी सांसदों का पाला बदलना एनडीए को फायदा पहुंचाएगा. फिर भी आंकड़ा 319 तक ही पहुंच रहा है. यानी 360 से 41 कम. अब यहां पर एनडीए सरकार के पास दो सम्भावनाएं और बन सकती हैं. एक, बीजेपी अगर अपनी धुर प्रतिद्वन्द्वी पार्टी डीएमके को समर्थन के लिए राजी करले. बता दें कि डीएमके के पास अभी 22 सांसद है. एक नयी सम्भावनाओं की सुगबुगाहट भी बीजेपी की बांछें खिला सकती है. केन्द्रीय मंत्री ओपी राजभर ने दावा किया है कि 37 सांसदों वाली समाजवादी पार्टी और कुछ विपक्ष दलों में भी बड़ी बगावत होने वाली है. अगर यह बगावत वाकई में होती है तो यह एनडीए सरकार को बड़ी ताकत देगी.
उसी तरह 245 सांसदों वाली राज्यसभा में भी एनडीए की वर्तमान ताकत 150 के करीब पहुंच गई है. यहां पर एनडीए को 163 वोटों की जरूरत होगी. एनडीए सरकार को उम्मीद है कि देश में ताजा राजनीतिक हालात का यहां भी उसे फायदा मिल सकेगा.
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