Karila Mela Rang Panchami: करीला धाम मंदिर में रंग पंचमी पर लगता है मेला, इस दिन...

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Karila Mela Rang Panchami: करीला धाम मंदिर में रंग पंचमी पर लगता है मेला, इस दिन मिलती है चमत्कारी कढ़ाई!

karila mela rang panchami करीला धाम मंदिर में रंग पंचमी पर लगता है मेला इस दिन मिलती है चमत्कारी कढ़ाई

Karila Mela Rang Panchami: होली के पांचवे दिन रंग पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। इस बार 8 मार्च को रंग पंचमी है, रंगपंचमी के दिन करीला धाम मंदिर में हर साल 3 दिवसीय विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, यह मंदिर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 165 किलोमीटर दूर अशोकनगर जिले की पहाड़ी पर स्थित है। यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां मां सीता बिना भगवान राम के विराजमान हैं।

लव-कुश का रंग पंचमी के दिन हुआ था जन्म

बताया जाता हैं कि, लव-कुश का जन्म इसी स्थान पर रंग पंचमी के दिन हुआ था। तब से उनके जन्मदिन के अवसर हर साल रंगपंचमी के मौके पर करीला धाम में विशाल मेले का आयोजन किया जाता हैं। यहां सीता माता के साथ लव-कुश और महर्षि वाल्मीकि की मूर्तियां भी विराजमान हैं। इस मेले में दूर-दूर से लाखों श्रद्धालु मां जानकी के दरबार में दर्शन करने के लिए आते हैं।

करीला मेले पर मिलती है चमत्कारी कढ़ाई

मान्यता है कि, रंग पंचमी के दिन लव-कुश का इसी स्थान पर जन्म हुआ था। तब से रंग पंचमी के दिन विशेष आयोजन किए जाते हैं। यहां 3 दिन मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले को लेकर एक मान्यता है यहां बिकने वाली लोहे की कड़ाही जादुई कढ़ाई होती है। क्योकि, उसमें खाना बनाने में बहुत कम तेल खर्च होता है। इस वजह से मेले में लोहे की कढ़ाई की दुकान काफी संख्या में लगाई जाती हैं, हर साल इसका व्यापार लाखों में होता है।

बिना पति के विराजमान माता सीता

कहा जाता है दुनिया में जितने भी भगवान राम के मंदिर हैं, सभी जगह भगवान राम के साथ माता सीता,लक्ष्मण और हनुमान जी की प्रतिमाएं एक साथ विराजमान हैं परंतु यह पूरी दनिया में यह एक ऐसा मंदिर हैं जहां माता सीता बिना अपने स्वामी के विराजमान हैं।

मान्यता है कि रामायण काल के दौरान जब भगवान राम रावण का वध करके अयोध्या आए तो सीता माता के चरित्र पर सभी ने बहुत उंगलियां उठाई थी। जिसके बाद भगवान राम ने माता सीता का त्याग कर दिया था। तब माता सीता ने करीला पहाड़ी पर स्थित महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में शरण ली थीं। यहीं पर उन्होंने लव-कुश को जन्म दिया था।

तभी से इस स्थान पर रंगपंचमी के मौके पर मेला लगता हैं और पहाड़ी पर स्थित महर्षि वाल्मीकि की गुफा खोली जाती है। उस समय देश के हर कोने से श्रद्धालु अपनी मन्नतें लेकर आते हैं।

 करीला धाम में इस नृत्य का है विशेष महत्व

रामायण के अनुसार बताया जाता है कि रंगपंचमी के दिन करीला गांव में स्थित वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश का जन्म हुआ था। महर्षि वाल्मीकि ने बड़े धूमधाम से उनका जन्मदिन मनाया था। इस उत्सव में बेड़नियां जाति की हजारों नृत्यांगनाएं जमकर नाची थीं। तब से हर साल रंगपंचमी के दिन मेला लगता है और लाखों की संख्या में श्रद्धालु माता सीता,लव-कुश और महर्षि वाल्मीकि के दर्शन करने आते है।

मन्नत पूरी होते ही करते है सब ये काम!

प्राचीन परंपरा के अनुसार, करीला धाम में जो भी मन्नत मांगते हैं वह पूरी हो जाती है। मन्नत पूरी होने के बाद, लोग राई नृत्य करवाते हैं। कहा जाता है कि यहां नि:संतान दंपत्ति की झोली माता सीता भर देती हैं। इसके बाद लोग राई नृत्य करवाते हैं।

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