नई दिल्ली। भारतीय चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इन दिनों बड़े राजनीति विवाद के केंद्र में हैं। SIR अभियान के दौरान लिए गए फैसलों को लेकर विपक्ष उनसे इस्तीफा मांग रहा है। ऐसे में लोग जानना चाहते हैं कि ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल कब खत्म होगा और उनके बाद देश का अगला मुख्य चुनाव आयुक्त कौन बनेगा।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई
एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट ने आयोग के भीतर के मतभेदों को सामने रखा है। रिपोर्ट का दावा है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने बीते 10 महीनों में कम से कम 14 बार आधिकारिक तौर पर आपत्तियाँ दर्ज कराईं। ये आपत्तियाँ SIR प्रक्रिया से जुड़े फैसलों और आदेशों पर थीं। इनमें मतदाता पंजीकरण, फॉर्म 6 में बदलाव और मतदाता सूची के डेटाबेस को एक जगह जोड़ने जैसे मुद्दे शामिल थे।
कौन हैं ज्ञानेश कुमार
जानकारी के लिए बता दें कि ज्ञानेश कुमार उत्तराखंड कैडर के 1988 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। उन्होंने फरवरी 2025 में देश के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला। इसके चलते उनका कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक चलेगा। पढ़ाई की बात करें तो उन्होंने आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग की है। इसके अलावा ICFAI से बिजनेस फाइनेंस और अमेरिका की हावर्ड यूनिवर्सिटी से एनवायर्नमेंटल इकोनॉमिक्स की डिग्री ली है।
इसके बाद करियर की शुरुआत उन्होंने केरल सरकार में अलग अलग अहम पदों से की थी। केंद्र में आने के बाद वे रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहे। गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव की जिम्मेदारी भी संभाली। बदा में संसदीय कार्य मंत्रालय और सहकारिता मंत्रालय में सचिव बने। गृह मंत्रालय में रहते हुए उन्होंने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधान हटने के बाद के प्रशासनिक फैसलों में बड़ी भूमिका निभाई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट बनाने की प्रक्रिया में भी उनका अहम योगदान रहा।
ज्ञानेश कुमार के बाद कौन
ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल पूरा होने पर सीनियरटी के हिसाब से चुनाव आयुक्त विवेक जोशी के अगले सीईसी बनने की संभावना है। जोशी हरियाणा कैडर के 1989 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। वे पहले हरियाणा के मुख्य सचिव रह चुके हैं। उनकी नियुक्ति भी 2023 में संसद से पास हुए कानून और तय चयन प्रक्रिया के तहत ही होगी।
कैसे चुना जाता है मुख्य चुनाव आयुक्त
दिसंबर 2023 में संसद से पास कानून के अनुसार पहले एक सर्च कमेटी योग्यता के आधार पर पांच नाम छांटती है। इस कमेटी की अध्यक्षता कानून मंत्री करते हैं और इसमें भारत सरकार के दो सचिव स्तर के अधिकारी होते हैं। इसके बाद तीन सदस्यों की उच्चस्तरीय समिति अंतिम नाम तय करती है। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री का नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री होते हैं। समिति की सिफारिश पर राष्ट्रपति नियुक्ति को मंजूरी देते हैं। 2023 से पहले यह नियुक्ति राष्ट्रपति सीधे प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर करते थे।
नई प्रक्रिया पर क्यों उठ रहे सवाल
ज्ञानेश कु्मार की नियुक्ति के समय से ही इस प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। मार्च 2023 में सु्प्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने अनूप बरनवाल बनाम भारत सरकार मामले में फैसला दिया था। कोर्ट ने कहा था कि जब तक संसद नया कानून नहीं बनाती, तब तक पैनल में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश रहेंगे। हालांकि केंद्र सरकार ने दिसंबर 2023 में नया कानून बनाया और पैनल से मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया। उनकी जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा गया। विपक्ष का तर्क है कि तीन में से दो सदस्य सरकार के होने से बहुमत हमेशा सत्ता पक्ष के पास रहता है। ऐसे में नेता प्रतिपक्ष की असहमति का कोई असर नहीं पड़ता।
इस कानून की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने इस पर विभाजित फैसला सुनाया है।