अनिता चौधरी, बेंगलुरु। कर्नाटक की राजनीति में अगली विधानसभा चुनावी जंग को लेकर बीजेपी ने अभी से जीत का दावा ठोकना शुरू कर दिया है। स्वदेश से बातचीत में बीजेपी के वरिष्ठ नेता और एमएलसी एच.एस. गोपीनाथ ने कांग्रेस सरकार, डी.के. शिवकुमार की महत्वाकांक्षा, वंदे मातरम विवाद और युवाओं के रुझान पर खुलकर अपनी बात रखी। उनका दावा है कि बीजेपी और जेडीएस का गठबंधन आगामी चुनाव में 150 सीटों तक पहुंच सकता है, जबकि कांग्रेस 78 सीटों पर सिमट सकती है।
जेडीएस के साथ गठबंधन से बीजेपी को बड़ी उम्मीद
कर्नाटक की राजनीति में बीजेपी की चुनावी रणनीति पर बात करते हुए एच.एस. गोपीनाथ ने स्वीकार किया कि पिछले दो विधानसभा चुनावों में पार्टी अधिकतम 110 सीटों तक ही पहुंच सकी। जबकि सरकार बनाने के लिए मैजिक नंबर 112 है । हालांकि, इस बार जनता दल (सेक्युलर) यानी जेडीएस के साथ गठबंधन को उन्होंने बड़ी ताकत बताया। उनके मुताबिक, 2024 के राष्ट्रीय चुनाव में गठबंधन का प्रदर्शन अच्छा रहा था और हालिया सर्वे में दोनों दलों को मिलाकर 150 सीटें मिलने का अनुमान सामने आया है। इसके मुकाबले उन्होंने कांग्रेस के खाते में 78 सीटें आने का दावा किया।
1985 के बाद सरकार दोहराने में नाकाम रहे दल
गोपीनाथ ने कर्नाटक की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के पुराने रुझान को भी बीजेपी की उम्मीदों का आधार बताया। उनका कहना है कि 1985 के बाद से राज्य में कोई भी पार्टी लगातार अगली बार सरकार नहीं बना सकी। कांग्रेस, जनता दल और बीजेपी, किसी को भी लगातार सत्ता में बने रहने में सफलता नहीं मिली। उनके मुताबिक, हर पांच साल में सरकार बदलने का यह सिलसिला आगे भी जारी रह सकता है। उन्होंने 2013 से 2018 तक सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री रहने का उदाहरण देते हुए कहा कि उस दौरान बेहतर सरकार देने के बावजूद कांग्रेस दोबारा सत्ता में नहीं लौट सकी।
डी.के. शिवकुमार की महत्वाकांक्षा पर उठाए सवाल
कांग्रेस के भीतर नेतृत्व की राजनीति पर टिप्पणी करते हुए गोपीनाथ ने डी.के. शिवकुमार को महत्वाकांक्षी नेता बताया। उनके मुताबिक, शिवकुमार का प्रमुख लक्ष्य मुख्यमंत्री बनना रहा है और इसके लिए उन्होंने अतीत में कई कदम उठाए। गोपीनाथ का दावा है कि अब वही पुरानी बातें उनके राजनीतिक जीवन का पीछा कर रही हैं। उन्होंने कहा कि शिवकुमार अपनी छवि बदलने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन उनके लिए अतीत से पीछा छुड़ाना आसान नहीं होगा। गोपीनाथ ने सिद्धारमैया को वैचारिक रूप से बीजेपी के विरोध में खड़ा नेता बताया, जबकि शिवकुमार को उन्होंने सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहने वाला नेता करार दिया। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जनता शिवकुमार को कब तक स्वीकार करेगी।
वंदे मातरम विवाद पर कांग्रेस को घेरा
कर्नाटक विधानसभा में वंदे मातरम को लेकर हुए विवाद पर गोपीनाथ ने कांग्रेस के रुख पर सवाल उठाए। अनीता चौधरी ने बातचीत में कहा कि जब विधानसभा में वंदे मातरम गाया जा रहा था, तब कांग्रेस के कुछ विधायक खड़े नहीं हुए और उन्होंने गायन में हिस्सा नहीं लिया। इस पर गोपीनाथ ने कहा कि कांग्रेस के ज्यादातर नेता वैचारिक रूप से पार्टी की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हैं। उनके मुताबिक, बी.के. हरिप्रसाद, मल्लिकार्जुन खड़गे और प्रियंका खड़गे जैसे कुछ नेताओं को वह वैचारिक रूप से कांग्रेस के साथ जुड़ा मानते हैं, जबकि बड़ी संख्या में नेता अपने राजनीतिक भविष्य को प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने दावा किया कि इनमें से कुछ नेता अवसर मिलने पर बीजेपी में भी आ सकते हैं।
केंद्रीय नेतृत्व के फैसले का पालन कर रहे कांग्रेसी
वंदे मातरम के मुद्दे पर कांग्रेस के व्यवहार को गोपीनाथ ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के रुख से जोड़ा। उनका कहना था कि कांग्रेस की केंद्रीय समिति ने जो फैसला लिया है, राज्य के नेता उसी का पालन कर रहे हैं, भले ही उनमें से अधिकांश उससे सहमत न हों। उन्होंने कर्नाटक की राजनीतिक संस्कृति का जिक्र करते हुए कहा कि यहां अलग-अलग दलों के नेताओं के बीच व्यक्तिगत संबंध सामान्यतः अच्छे रहते हैं। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन विरोधी दलों के नेताओं के बीच निजी दुश्मनी नहीं होती। उनके मुताबिक, यही कर्नाटक की राजनीति को तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से अलग बनाता है।
खड़गे की टिप्पणी को बताया कांग्रेस की हताशा
बातचीत के दौरान स्वदेश ने जब सवाल किया कि मल्लिकार्जुन खड़गे के एक कार्यक्रम में पीएम मोदी और उनके पिता जी के लिए दिए गए कथित अभद्र बयान पर उनका क्या कहना है ? इस ओर उनका जवाब था कि , जब खड़गे ने सरकार बदलने की बात कही, तो एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने कहा कि मोदी के रहते ऐसा नहीं हो सकता। इस पर खड़गे ने कथित तौर पर जवाब दिया कि मोदी नहीं, मोदी का बाप भी जाएगा। यही नहीं। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और खड़गे की राजनीतिक भाषा दिन ब दिन और बिगड़ती जा रही जो साफ़ सीखा रहा है कि लगातार हार और सट्टा से नगर रहने की वजह से काँग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में कितनी कुंठा आ गई है और अब काँग्रेस की राजनीति पर जनता भी सवाल उठा रही है ।
गोपीनाथ ने बातचीत करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की एक टिप्पणी का हवाला दिया और कहा कि अटल जी ने ठीक कहा था कि “कांग्रेस को सत्ता में रहते हुए संभालना आसान गई लेकिन सत्ता से बाहर रह कर काँग्रेस और ख़तरनाक , देश विरोधी और अधिक आक्रामक हो जाती है। उन्होंने दावा किया कि करीब 12 वर्षों से केंद्र की सत्ता से बाहर रहने के कारण कांग्रेस में हताशा बढ़ी है। उनके अनुसार, इस तरह की भाषा और बयानबाजी लंबे समय में कांग्रेस को ही नुकसान पहुंचा सकती है। उन्होंने इसे अपरिपक्व राजनीतिक सोच बताया।
मुस्लिम मतदाताओं में बदलाव की उम्मीद
कर्नाटक में जनसांख्यिकीय बदलाव और मुस्लिम मतदाताओं के रुझान पर सवाल उठने के बाद गोपीनाथ ने कहा कि पिछले विधानसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय का बड़ा हिस्सा कांग्रेस के साथ खड़ा था। हालांकि, उन्होंने दावा किया कि अब इस समुदाय के भीतर भी असंतोष है। उनका अनुमान है कि जेडीएस के साथ गठबंधन होने से 20 से 25 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता जनता दल की ओर जा सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जेडीएस करीब 50 से 60 विधानसभा सीटों की मांग कर रही है।
गोपीनाथ के मुताबिक, बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने जेडीएस के साथ गठबंधन का फैसला पहले ही कर लिया है और अब पार्टी के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। उन्होंने गठबंधन को आगामी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद का प्रमुख आधार बताया। हालांकि, मुस्लिम मतदाताओं के संभावित रुझान और सीटों के अनुमान उनके राजनीतिक आकलन हैं, जिन्हें चुनावी नतीजों से पहले अंतिम तस्वीर नहीं माना जा सकता।
येदियुरप्पा के बाद बदले जातीय समीकरण
लिंगायत समुदाय में पैठ रखने वाले कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा के बाद बीजेपी ने क्या विकल्प चुनें है इस बड़े समुदाय को साधने के लिए और फिलहाल बीजेपी की राजनीतिक स्थिति क्या है? क्या पार्टी अपने दम पर काँग्रेस को मजबूत चुनौती दे पाएगी। इस पर गोपीनाथ ने कहा कि येदियुरप्पा के समय जातीय समीकरण बीजेपी के पक्ष में बेहतर तरीके से काम करते थे। अब पार्टी को जीत हासिल करने के लिए सभी समुदायों का समर्थन जुटाना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि बीजेपी किसी एक जाति या समुदाय के वोटों के भरोसे सरकार बनाने की रणनीति नहीं अपना सकती। उनके अनुसार, पार्टी इस बार पिछले चुनाव की तुलना में अधिक व्यापक तैयारी के साथ मैदान में उतरने की उम्मीद कर रही है।
द्रविड़ और लिंगायत राजनीति के प्रभाव को भी किया खारिज
कर्नाटक में द्रविड़ राजनीति की मौजूदगी और उसके संभावित चुनावी प्रभाव पर गोपीनाथ ने कहा कि राज्य में इसका खास प्रभाव नहीं है। उन्होंने कर्नाटक को दूसरे राज्यों से अलग राजनीतिक परिस्थितियों वाला राज्य बताया। उनके मुताबिक, यहां के मतदाता राजनीतिक रूप से जागरूक हैं और केवल पार्टी या जातीय पहचान के आधार पर फैसला नहीं करते, बल्कि यह देखते हैं कि कौन बेहतर सरकार दे सकता है। इसी आधार पर उन्होंने बीजेपी की संभावनाओं को मजबूत बताया, हालांकि आगामी चुनाव में मतदाताओं का वास्तविक रुख ही इस दावे की परीक्षा करेगा।
'मोदी मैजिक' पर जताया पूरा भरोसा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को लेकर पूछे गए सवाल पर गोपीनाथ ने कहा कि कर्नाटक में मोदी का प्रभाव बरकरार है और उनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। उन्होंने राज्य में बीजेपी की संभावनाओं को प्रधानमंत्री की लोकप्रियता से भी जोड़ा। पार्टी की चुनावी रणनीति में मोदी के प्रभाव की भूमिका को लेकर उनका भरोसा साफ नजर आया। हालांकि, विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता के साथ स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार और गठबंधन का प्रदर्शन भी अहम होंगे।
युवाओं के बीच राष्ट्रवादी विचारधारा को बताया ताकत
युवाओं को अपने पक्ष में करने की बीजेपी की क्षमता पर गोपीनाथ ने भरोसा जताया। बातचीत में अनीता चौधरी ने 'कॉकरोच पार्टी' का जिक्र करते हुए पूछा कि क्या वह युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रही है। गोपीनाथ ने इस राजनीतिक समूह को वामपंथी और राष्ट्रविरोधी बताते हुए आरोप लगाया कि वह देश में अराजकता चाहता है। उन्होंने दावा किया कि कर्नाटक में उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। ये आरोप गोपीनाथ के राजनीतिक विचार हैं।
उन्होंने माना कि वामपंथी विचारधारा से जुड़े कुछ वर्गों में लंबे समय से सत्ता से बाहर रहने के कारण असंतोष है और इससे कांग्रेस को फायदा मिलने की उम्मीद हो सकती है। लेकिन उन्होंने कांग्रेस की इस उम्मीद को गलत आकलन बताया। गोपीनाथ के मुताबिक, युवाओं का एक बड़ा वर्ग राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़ा है और बीजेपी को उसका समर्थन मिल सकता है।
आरएसएस के पथ संचलन का दिया उदाहरण
युवाओं में राष्ट्रवादी रुझान का उदाहरण देते हुए गोपीनाथ ने हाल ही में हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयादशमी पथ संचलन का उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि रविवार को अकेले बेंगलुरु में 100 स्थानों पर आयोजित मार्च में 10 हजार से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। उनके अनुसार, इनमें बड़ी संख्या युवाओं की भागीदारी थी, जो राष्ट्रीय हित के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता हैं। उन्होंने कहा कि कर्नाटक का समाज पहले भी राष्ट्रवादी विचारों के साथ खड़ा रहा है और आगे भी ऐसा ही रुझान रहने की उम्मीद है।
बातचीत के अंत में गोपीनाथ ने एक बार फिर भरोसा जताया कि बीजेपी इस बार बेहतर तैयारी के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी और जेडीएस के साथ गठबंधन उसे मजबूत स्थिति में ला सकता है। कांग्रेस की रणनीति, डी.के. शिवकुमार की भूमिका, जातीय समीकरण, मुस्लिम मतदाताओं का रुझान और युवाओं का समर्थन आगामी चुनाव की दिशा तय करने वाले मुद्दे होंगे।
गोपीनाथ के 150 सीटों के अनुमान और कांग्रेस के 78 सीटों पर सिमटने के दावे ने कर्नाटक ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत की चुनावी राजनीति को लेकर बीजेपी की उम्मीदों को एक नए आयाम पर दर्शा रहा था । भाजपा दक्षिण को अपने राजनीति का गढ़ बनाना चाहती है जिसका डियर कर्नाटक से खुलता है लेकिन बदलती डेमोग्राफी , वामपंथ और कॉंग्रेस की एकजुटता भरी रणनीति और हिंदुओं का समुदायों में बंटे रहना भाजा के लिए हमेश एक बड़ी राजनीतिक चुनौती रही है।

(लेखिका स्वदेश दिल्ली में वरिष्ठ विशेष प्रतिनिधि हैं)