Dr Mohan Bhagwat: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अमेरिका के न्यूयॉर्क में आयोजित 'एक दुनिया, एक मानवता' कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मानवता की मूल एकता, धार्मिक विविधता, संवाद और सेवा के महत्व पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि दुनिया में भले ही धर्म, पंथ, भाषा, संस्कृति और जीवन-पद्धतियां अलग हों, लेकिन मनुष्य की मूल पहचान एक ही है। अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, "यदि कोई हिंदू यह मानता है कि किसी मुस्लिम को भारत में नहीं रहना चाहिए, तो वह हिंदू विचार और हिंदुत्व के मूल दर्शन को समझता ही नहीं है। किसी मुस्लिम को भारत से बाहर करना हिंदुत्व कदापि नहीं हो सकता।"
धर्म के बाहरी रूप से आगे बढ़ना जरूरी
सरसंघचालक ने कहा कि वर्तमान समय में धर्मों की पहचान मुख्यतः रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों तक सीमित होकर रह गई है। यद्यपि धार्मिक अनुशासन आध्यात्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन साधन को ही साध्य या लक्ष्य मान लेना उचित नहीं है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि कोई व्यक्ति रोशनी की ओर उंगली से इशारा करे, तो हमें उंगली पर अटकने के बजाय उस रोशनी को देखना चाहिए। यदि हम उंगली पर ही ध्यान केंद्रित रखेंगे, तो रोशनी तक पहुंचने का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। उसी प्रकार, विभिन्न धार्मिक परंपराएं जिस अंतिम सत्य (ईश्वर/मानवता) की ओर संकेत करती हैं, उसे समझना अत्यंत आवश्यक है।
"नदियां अलग हो सकती हैं, पर सबका गंतव्य समुद्र ही है"
डॉ. भागवत ने भारतीय दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस प्रकार आकाश से गिरने वाली जल की हर बूंद अंततः विभिन्न रास्तों से होती हुई समुद्र में ही विलीन होती है—चाहे वह रास्ता सीधा हो, घुमावदार हो, छोटा हो या जंगलों से होकर गुजरता हो—ठीक उसी प्रकार ईश्वर तक पहुंचने के धार्मिक मार्ग अलग हो सकते हैं, लेकिन सभी का अंतिम लक्ष्य एक ही है। उन्होंने कहा कि विविधता प्रकृति का शाश्वत नियम है और उस विविधता के पीछे छिपी 'एकता' ही प्रकृति का परम सत्य है। इसलिए विविधता को समाप्त करने का प्रयास करने के बजाय उसका सम्मान और संरक्षण किया जाना चाहिए।
राजनीति से पहले समाज में परिवर्तन आवश्यक
संघ प्रमुख ने समाज सुधार और राजनीति के संबंधों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि युद्ध रोकने और नीतियां बनाने में राजनीति की बड़ी भूमिका होती है, लेकिन स्थायी सामाजिक बदलाव की शुरुआत राजनीति के माध्यम से नहीं हो सकती। लोकतंत्र में राजनीति जनमत के अधीन होती है। यदि समाज की राय मजबूत और स्पष्ट होगी, तो राजनेताओं के लिए उसे नजरअंदाज करना असंभव होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि सबसे पहले समाज में एकता, समरसता और परस्पर विश्वास का माहौल बनाना होगा, जिसका सकारात्मक प्रभाव स्वतः ही राजनीति पर दिखाई देगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है।