Atal Bihari Vajpayee: राजनीति के मंच पर सैकड़ों चेहरे आते हैं और समय के साथ ओझल हो जाते हैं, लेकिन कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं, जो इतिहास के पन्नों पर अपना नाम नहीं, बल्कि देश के दिल पर अपनी छाप छोड़ जाती हैं। एक ऐसा जननायक, जो केवल एक कुशल प्रधानमंत्री नहीं था, बल्कि एक कवि, निष्पक्ष पत्रकार, वक्ता और अपने उसूलों की राजनीति करने वाला एक विराट व्यक्तित्व था। नाम था अटल बिहारी वाजपेयी। जो दैनिक अखबार स्वदेश के पहले संपादक रहे है। आज उनकी पुण्यतिथि पर आइए जानते हैं, मध्य प्रदेश के एक साधारण से शहर से निकलकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचने वाले अटल सफर की पूरी कहानी।
बने स्वदेश के पहले संपादक
25 दिसंबर 1924... को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक साधारण शिक्षक परिवार में अटल जी का जन्म हुआ। उनके पिता श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी स्कूल शिक्षक थे। बचपन से ही अटल जी की रुचि पढ़ाई, साहित्य और भाषण में थी। यही ग्वालियर आगे चलकर उनकी पहचान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बना। उन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज जिसे आज लोग एमएलबी कॉलेज के नाम से भी जानते हैं, वहां शुरूआती पढ़ाई की और बाद में कानपुर के डीएवी कॉलेज से अपनी उच्च शिक्षा को पूरा किया. साल 1939 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े। 1942 में जब देश में भारत छोड़ो आंदोलन की लहर थी, तब अटल जी भी इस दौर की घटनाओं से अछूते नहीं रहे। बटेश्वर में हुई घटनाओं के दौरान अंग्रेजों ने अटल जी और उनके बड़े भाई को गिरफ्तार कर लिया। उन्होंने करीब 23 दिन जेल में बिताए।1947 तक वे पढ़ाई के साथ-साथ संघ में रहते हुए विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते रहे. 1947 में वे संघ के पूर्णकालिक 'प्रचारक' बने. संघ ने उनके विचारशील स्वभाव और लेखन कौशल को देखते हुए उन्हें लखनऊ में प्रकाशन का कार्य सौंपा. राष्ट्रधर्म, पांचजन्य, वीर अर्जुन होते हुए वे स्वदेश के पहले संपादक बने. 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 'भारतीय जनसंघ' की स्थापना की। RSS के निर्देश पर अटल जी को पत्रकारिता से राजनीति में भेजा गया और वे जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में शामिल हुए. 1957 के लोकसभा चुनाव में वे उत्तर प्रदेश के बलरामपुर क्षेत्र से पहली बार चुनाव जीतकर संसद (लोकसभा) पहुंचे और यहीं से उनका दीर्घकालिक और ऐतिहासिक राजनीतिक सफर शुरू हुआ।
जब संसद में गूंजी 'अटल' आवाज
1957 में उत्तर प्रदेश की बलरामपुर सीट से जीतकर अटल जी पहली बार लोकसभा पहुंचे। उनकी भाषा शैली का हर कोई कायल हो गया। वे सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना करते थे, लेकिन शब्दों की मर्यादा कभी नहीं लांघते थे। कहा जाता है कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी उनके भाषणों के मुरीद थे और उन्होंने तभी भविष्यवाणी कर दी थी कि यह युवक एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा।

आपातकाल की अग्निपरीक्षा और BJP का जन्म
1975 के काले दौर यानी आपातकाल में अटल जी को भी जेल की सलाखों के पीछे डाला गया। आपातकाल खत्म होने के बाद राजनीतिक स्वरूप बदला और 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी गई। अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उस दौर में पार्टी के पास जनाधार कम था, लेकिन अटल जी के नेतृत्व ने धीरे-धीरे पार्टी को वटवृक्ष बना दिया।
13 दिन की वो सरकार
साल 1996 में भारतीय राजनीति ने नया मोड़ लिया। अटल जी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने, लेकिन स्पष्ट बहुमत न होने के कारण उनकी सरकार महज 13 दिनों में गिर गई। संसद में दिया गया उनका वो भाषण "सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी, मगर यह देश रहना चाहिए, ने उन्हें देश के हर नागरिक का प्रिय नेता बना दिया।
पोखरण का महाविस्फोट और भारत का स्वाभिमान
1998 में जब वे दोबारा सत्ता में आए, तो उन्होंने वो फैसला लिया जिसने दुनिया में भारत की हैसियत बदल दी। मई 1998 में राजस्थान के पोखरण में गुप्त रूप से 5 सफल परमाणु परीक्षण किए गए। अमेरिका समेत कई वैश्विक शक्तियों ने भारत पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए, लेकिन अटल सरकार अडिग रही। भारत अब एक महाशक्तिशाली परमाणु संपन्न राष्ट्र बन चुका था।
लाहौर यात्रा और कारगिल चुनौती
अटल जी जितने कठोर फैसले लेने में सक्षम थे, उतने ही शांति का पैगाम भी देते थे। 1999 में उन्होंने भारत-पाकिस्तान संबंधों को सुधारने के लिए दिल्ली-लाहौर बस यात्रा की। लेकिन पीठ में छुरा घोंपने की आदत से मजबूर पाकिस्तान ने कारगिल में दुस्साहस किया। अटल जी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय चलाकर कारगिल की चोटियों पर दोबारा तिरंगा फहराया और दुनिया को संदेश दिया कि भारत शांति चाहता है, लेकिन दुस्साहस से समझौता कभी नहीं करेगा।
अटल जी के विकास कार्य
स्वर्णिम चतुर्भुज: देश के चारों महानगरों को जोड़ने वाला विशाल हाईवे नेटवर्क।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना: देश के हर छोटे गांव को पक्की सड़कों से जोड़ना।
सर्व शिक्षा अभियान: सब पढ़ें, सब बढ़ें के नारे के साथ शिक्षा को हर बच्चे तक पहुंचाना।
राजनीति में कविता का राग
राजनीति के अनुशासन के बीच भी उनके अंदर का कवि हमेशा जीवित रहा। जब वे मंच से कहते थे, "हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा..." या "बाधाएं आती हैं आएं, घिरें प्रलय की घोर घटाएं..." तो सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उनके विचार और कविताएं आज भी युवा पीढ़ी को प्रेरणा देती हैं।

भारत रत्न और अंतिम विदाई
2004 में सत्ता से बाहर होने के बाद वे धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूर होते गए। 1994 में सर्वश्रेष्ठ सांसद, 1992 में पद्म विभूषण और 2015 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से उन्हें अलंकृत किया गया। 16 अगस्त 2018 को 93 वर्ष की आयु में इस महान आत्मा ने अंतिम सांस ली। देश ने अपना एक महान सपूत खो दिया।
ग्वालियर की एक तंग गली से शुरू हुआ सफर देश के दिलों पर राज करने तक पहुंचा। अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसा नाम हैं, जो किसी दल या विचारधारा की सीमाओं में नहीं बंधे। वे भारत के थे, और भारत उनका था। उनकी पुण्यतिथि पर, इस महान कवि, प्रखर वक्ता और भारत मां के वीर सपूत को शत्-शत् नमन।
