अमित चौहान,रायपुर। छत्तीसगढ़ की प्राचीन ऐतिहासिक और पुरातात्विक विरासत में भगवान का महत्वपूर्ण स्थान है। यहां खुदाई और पुरातात्विक अध्ययन के दौरान कई देवी-देवताओं की प्राचीन प्रतिमाएं मिली हैं। इनमें गणेश की प्रतिमाएं भी शामिल हैं, जिन्हें 5वीं से 7वीं शताब्दी के बीच की कला परंपरा से जोड़ा जाता है। पत्थर पर उकेरी गई इन प्रतिमाओं में तत्कालीन शिल्पकारों की कलात्मक दक्षता और धार्मिक आस्था की झलक दिखाई देती है। मल्हार से प्राप्त शिव, कार्तिकेय, गणेश, स्कंदमाता और अर्धनारीश्वर की मूर्तियां इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को सामने लाती हैं। पढि़ए प्रदेश की गौरवशाली विरासत के बारे में अमित चौहान की रिपोर्ट...

मदकू में 10वीं-11वीं शताब्दी की अष्टभुजी नृत्य गणेश प्रतिमा।
-छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के मदकू द्वीप में स्थित है प्राचीन मंदिर, गणेशोत्सव पर उमड़ते हैं श्रद्धालु
छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले में सरगांव के पास स्थित श्री हरिहर क्षेत्र केदार मदकू द्वीप में भगवान गणेश की प्राचीन अष्टभुजी नृत्य प्रतिमा स्थापित है। कलचुरीकालीन यह दक्षिणावर्त प्रतिमा 10वीं-11वीं शताब्दी की स्थापत्य कला का सुंदर उदाहरण है। लगभग 60-70 वर्ष पहले स्थानीय लोगों को द्वीप क्षेत्र में प्रतिमा मिली थी। बाद में छोटा चौरा बनाकर स्थापना की गई। श्री हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप सेवा समिति ने लाल बलुआ पत्थर से मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। महाशिवरात्रि 2021 में प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा हुई। गणेश चतुर्थी से दस दिनों तक दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। प्रत्येक बुधवार विशेष पूजा होती है। मूर्तिकला विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थल प्राचीन शैव परंपरा और शक्ति साधना का केंद्र रहा होगा।

ढोलकल की पहाड़ी पर विराजे 11वीं सदी के भगवान गणेश।
-दंतेवाड़ा जिले के बैलाडीला पर्वत पर 2994 फीट ऊंचाई पर स्थापित है प्राचीन प्रतिमा
दंतेवाड़ा जिले में बैलाडीला पर्वत श्रेणी की ढोलकल पहाड़ी पर भगवान गणेश की प्राचीन पत्थर की प्रतिमा स्थापित है। समुद्र तल से करीब 2994 फीट ऊंचाई पर स्थित यह स्थल प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक आस्था के लिए प्रसिद्ध है। लगभग तीन फीट ऊंची प्रतिमा को पुरातात्विक विशेषज्ञ 11वीं शताब्दी का मानते हैं। माना जाता है कि इसका निर्माण नागवंशीय काल में हुआ था, हालांकि स्थापना किसने और कब की, इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं है। जिला मुख्यालय दंतेवाड़ा से सडक़ मार्ग द्वारा ढोलकल पहुंचने के बाद हरे-भरे जंगलों और पहाडिय़ों के बीच ट्रेकिंग करनी पड़ती है। अलग-अलग विवरणों में दूरी 13 से 22 किलोमीटर बताई गई है।

बारसूर में विराजे जुड़वा गणेश, बाणासुर की पुत्री उषा से जुड़ी है मंदिर की कथा।
दंतेवाड़ा जिले के बारसूर में स्थापित हैं बालू पत्थर से निर्मित दो विशाल प्रतिमाएं, साढ़े सात और साढ़े पांच फीट है ऊंचाई
दंतेवाड़ा जिले के बारसूर में भगवान गणेश का प्राचीन मंदिर स्थित है। यहां एक ही स्थान पर गणेशजी की दो विशाल प्रतिमाएं स्थापित हैं। बड़ी मूर्ति करीब साढ़े सात फीट और छोटी प्रतिमा साढ़े पांच फीट ऊंची है। बालू पत्थर से निर्मित इन प्रतिमाओं को लेकर मान्यता है कि यह दुनिया का इकलौता जुड़वा गणेश मंदिर है। पौराणिक कथा के अनुसार, बारसूर के राजा बाणासुर की पुत्री उषा और उनकी सखी चित्रलेखा गणेशजी की भक्त थीं। आसपास मंदिर नहीं होने की बात उषा ने पिता को बताई, जिसके बाद बाणासुर ने दोनों सहेलियों के लिए गणेश प्रतिमाओं का निर्माण कराया।

मरार पारा में 70 साल से विराजे स्वयंभू गणेश, जमीन से निकला था गणेश स्वरूप पत्थर।
बालोद नगर के मरार पारा में भगवान गणेश का स्वयंभू मंदिर है। करीब 70 साल पहले यहां जमीन से एक पत्थर निकला था, जिसका आकार भगवान गणेश जैसा दिखाई दिया। इसके बाद स्थानीय लोगों ने पूजा-अर्चना शुरू कर दी। लोगों ने पाई-पाई जोडक़र प्रतिमा को ढकने के लिए शेड तैयार किया। धीरे-धीरे मंदिर की प्रसिद्धि बढ़ी और बालोद जिले के अलावा छत्तीसगढ़ के दूसरे हिस्सों तथा अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचने लगे। कोरोना काल में जरूरतमंदों के लिए मंदिर के पास गणेश प्रसादी शुरू की गई। गणेश चतुर्थी के पहले दिन से गरीबों को निशुल्क भोजन दिया जाता है, जबकि अन्य लोगों को महज 30 रुपए में घर जैसा भोजन उपलब्ध कराया जाता है।

25 युवकों ने उठाने की कोशिश की, फिर भी नहीं हिली गणेश प्रतिमा
राजनांदगांव-खैरागढ़ मार्ग पर गोपालपुर में विराजमान है आठ भुजाओं वाला प्राचीन पाषाण गणेश प्रतिमा आकर्षण का केंद्र है।
राजनांदगांव-खैरागढ़ मार्ग पर ग्राम गोपालपुर में भगवान गणेश का अनोखा मंदिर है। यहां आठ भुजाओं वाली प्राचीन पाषाण प्रतिमा विराजमान है, जिसे ग्रामीण स्वयंभू स्वरूप मानते हैं। स्थानीय जानकारों के अनुसार, पहले प्रतिमा नीम के पेड़ के नीचे खुले में स्थापित थी। वर्ष 2006 में मंदिर निर्माण के दौरान इसे भीतर ले जाने की कोशिश की गई। करीब 25 युवकों ने प्रतिमा उठाने का प्रयास किया, लेकिन वह अपनी जगह से नहीं हिली। स्थानीय मान्यता के अनुसार प्रतिमा की स्थापना वर्ष 1884 में नागवंशी शासक उमराव सिंह के काल में हुई थी। गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक 11 दिन उत्सव होता है, लेकिन प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाता। अंतिम दिन दो बाल्टी पानी से भगवान को स्नान कराया जाता है। मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करने से भी ग्रामीण परहेज करते हैं। प्रतिमा को सिंगारपुर ले जाने की कोशिश और बैलगाड़ी में नहीं रख पाने की मान्यता भी प्रचलित है।

तालागांव में विराजे सदियों पुराने गणेश, अनोखी मूर्तियां हैं पहचान
बिलासपुर से करीब 30 किमी दूर मणियारी नदी किनारे स्थित तालागांव, देवरानी-जेठानी मंदिर और दुर्लभ शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध, प्राचीन गणेश प्रतिमाएं आकर्षण का केंद्र।
बिलासपुर जिले का तालागांव छत्तीसगढ़ की प्राचीन कला और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है। मणियारी नदी के किनारे स्थित इस गांव में देवरानी-जेठानी मंदिर परिसर के आसपास कई प्राचीन शिल्प और मूर्तियां देखने को मिलती हैं। इनमें भगवान गणेश की दुर्लभ प्रतिमाएं विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। यहां गणेश को अलग-अलग रूपों में प्रदर्शित किया गया है, जो तत्कालीन शिल्पकारों की कलात्मक कल्पना और धार्मिक परंपराओं को दर्शाता है। तालागांव की पुरातात्विक विरासत को 6वीं से 10वीं शताब्दी की शिल्प परंपरा से जोड़ा जाता है। यहां मिली गणेश प्रतिमाओं में एक स्वरूप में भगवान गणेश को चंद्रमा की ओर उड़ान भरते हुए दर्शाया गया है। वहीं, द्विमुखी गणेश की प्रतिमा भी यहां की सबसे अनोखी मूर्तियों में गिनी जाती है। इन प्रतिमाओं में गणेश के पारंपरिक स्वरूप के साथ तत्कालीन मूर्तिकला की विशिष्ट शैली दिखाई देती है।

सिरपुर में सदियों पुराना गणेश स्वरूप, सुरंग टीला में मिली प्राचीन प्रतिमा
महानदी किनारे बसे प्राचीन श्रीपुर में 7वीं-8वीं शताब्दी के मंदिर परिसर का हिस्सा है गणेश मंदिर, पुरातात्विक धरोहर में शामिल प्रतिमा
महासमुंद जिले का सिरपुर छत्तीसगढ़ की प्राचीन धार्मिक और पुरातात्विक विरासत का प्रमुख केंद्र है। महानदी के किनारे बसे इस ऐतिहासिक नगर को प्राचीन काल में श्रीपुर के नाम से जाना जाता था। यहां स्थित सुरंग टीला परिसर भगवान शिव के साथ गणेश उपासना के प्राचीन प्रमाण भी समेटे हुए है। यह मंदिर परिसर 7वीं-8वीं शताब्दी का माना जाता है। यहां पांच गर्भगृह मिले हैं, जिनमें एक में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थित है। सिरपुर में पुरातात्विक उत्खनन के दौरान गणेश की कई प्राचीन प्रतिमाएं भी मिलने की जानकारी सामने आई है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार यहां गणेश की अलग-अलग मुद्राओं और स्वरूपों वाली प्रतिमाएं मिली हैं। कुछ प्रतिमाओं को प्रारंभिक मध्यकालीन कला से जोड़ा जाता है।

डीपाडीह में सदियों पुराना गणेश स्वरूप, नृत्य मुद्रा वाली प्रतिमा खास
-8वीं-9वीं शताब्दी के मंदिर अवशेषों में मिली गणेश प्रतिमाएं
-कन्हार-गलफुला नदी क्षेत्र में प्राचीन शिल्पकला की अनूठी झलक।
बलरामपुर-रामानुजगंज जिले का डीपाडीह सरगुजा अंचल की महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहरों में शामिल है। कन्हार और गलफुला नदियों के संगम क्षेत्र के आसपास फैले इस स्थल पर प्राचीन मंदिरों के अवशेष और बड़ी संख्या में शिल्पकृतियां मिली हैं। यहां की मंदिर स्थापत्य और मूर्तिकला को मुख्य रूप से 8वीं से 13वीं शताब्दी के बीच की परंपरा से जोड़ा जाता है। डीपाडीह की सबसे खास शिल्पकृतियों में भगवान गणेश की प्रतिमाएं शामिल हैं। पुरातात्विक विवरणों में यहां नृत्य करते हुए गणेश की प्रतिमा का उल्लेख मिलता है।

मल्हार में गणेश के दुर्लभ स्वरूप, पंचमुखी हेरम्ब और स्त्री वैनायकी खास
10वीं-11वीं सदी में कल्चुरी शासन की प्रमुख नगरी रहा मल्हार। बिलासपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर मल्हार छत्तीसगढ़ की प्राचीन पुरातात्विक धरोहरों में शामिल है। 10वीं-11वीं शताब्दी में कल्चुरी शासनकाल की महत्वपूर्ण नगरी रहे मल्हार में पुरातात्विक उत्खनन के दौरान भगवान गणेश की दुर्लभ प्रतिमाएं मिली हैं। इनमें पंचमुखी हेरम्ब और स्त्री स्वरूप वैनायकी विशेष आकर्षण हैं। मल्हार में गणेश की एक विशाल प्रतिमा का धड़ मिला था, जबकि बाद में खेत से उसका सिर का हिस्सा भी मिलने की जानकारी सामने आई। प्रतिमा करीब 11 फीट ऊंची बताई गई है। इसके पांच मुख और दस हाथ हैं, जिनमें अस्त्र-शस्त्र दर्शाए गए हैं। हेरम्ब स्वरूप में गणेश को सिंह पर सवार दिखाया जाता है और इसे निर्बलों की रक्षा से जोड़ा जाता है। इस स्वरूप की विशेष मान्यता नेपाल में बताई जाती है। मल्हार के पातालेश्वर मंदिर के भीतरी द्वार पर बने एक पैनल में गणेश का स्त्री स्वरूप वैनायकी भी अंकित है। पुरातत्वविदों के अनुसार वैनायकी को गणेश की शक्ति का नारी रूप माना जाता है। मत्स्य पुराण और विष्णुधर्मोत्तर पुराण में भी इस स्वरूप का उल्लेख मिलता है।

भोरमदेव में अष्टभुजी तांत्रिक गणेश, शिवलिंग के साथ विराजमान है दुर्लभ प्रतिमा
11वीं सदी के मंदिर में तंत्र साधना की झलक, आठ भुजाओं वाले गणेश को लेकर विशेष मान्यता
कवर्धा से करीब 18 किलोमीटर दूर मैकाल की पहाडय़िों और घने जंगलों के बीच स्थित भोरमदेव मंदिर अपनी स्थापत्य कला और प्राचीन मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है। 11वीं सदी में नागवंशी शासकों के काल में निर्मित इस मंदिर को छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है। मंदिर की दीवारों पर बनी कलात्मक नक्काशियां तत्कालीन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की झलक देती हैं। भोरमदेव मंदिर की खास पहचान यहां गर्भगृह में शिवलिंग के साथ स्थापित गणेश प्रतिमा भी है। यह सामान्य गणेश प्रतिमाओं से अलग अष्टभुजी स्वरूप में है। स्थानीय पुजारियों के अनुसार आठ भुजाओं वाले इस गणेश को तांत्रिक गणेश माना जाता है और ऐसी प्रतिमा को लेकर दुर्लभता की विशेष मान्यता है। नागवंशी शासकों की तंत्र साधना से जुड़ी परंपराओं की छाप मंदिर की नक्काशियों में भी दिखाई देती है। मंदिर की कामुक मूर्तियों के कारण इसकी तुलना खजुराहो से की जाती है, जबकि स्थापत्य में ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर जैसी विशेषताएं भी नजर आती हैं। परिसर के आसपास मंडवा महल और छेरकी महल जैसे ऐतिहासिक मंदिर भी इसकी विरासत को और समृद्ध करते हैं।
पचराही में मिली करीब 1500 साल पुरानी गणेश प्रतिमा
हाफ नदी के किनारे प्राचीन नगर के अवशेष, उत्खनन में मिले मंदिर, मूर्तियां और सिक्के; छोटी गणेश प्रतिमा बनी खास आकर्षण
कबीरधाम जिले के बोडला क्षेत्र का सिली पचराही छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में शामिल है। हाफ नदी के किनारे स्थित इस क्षेत्र में वर्ष 2007 से 2011 के बीच संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग ने उत्खनन कराया। खुदाई में प्राचीन मंदिरों, मूर्तियों, सिक्कों, शिलालेखों और नगर बसाहट से जुड़े अनेक अवशेष मिले हैं। यहां प्राप्त पुरावशेषों को संरक्षित करने के लिए स्थल पर संग्रहालय भी बनाया गया है। पचराही की पुरातात्विक खोजों में भगवान गणेश की एक बेहद छोटी प्रतिमा का भी उल्लेख मिलता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार यह प्रतिमा करीब 1500 वर्ष पुरानी मानी जाती है। पचराही में गणेश, शिव, विष्णु और अन्य देवी-देवताओं से जुड़ी प्रतिमाएं मिलने से इस क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक परंपराओं और कला की विविधता का पता चलता है। पुरातत्व विभाग के अनुसार पचराही में कल्चुरी और फणीनागवंशी काल से जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं के प्रमाण मिले हैं।