दतिया। देश के तीन राज्यों में की तीन सीटों पर हुए उपचुनाव में एमपी की हाई प्रोफाइल दतिया विधानसभा के परिणाम बेहद चौंकाने वाले रहे। कांग्रेस उम्मीदवार कुंवर घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को हराकर मुकाबला अपने नाम कर लिया। इस नतीजे ने प्रदेश की राजनीति में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। बीजेपी ने चुनाव जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। लेकिन जमीनी हालात और संगठन से जुड़े कई कारण उनके पक्ष में नहीं रहे।
दरअसल, यह सीट पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता रद्द होने के बाद खाली हुई थी। चुनाव प्रचार के दौरान मुकाबला सीधा नजर आया। लेकिन परिणाम आने के बाद राजनीतिक विश्लेषकों और स्थानीय समीकरणों से जुड़े जानकार बीजेपी की हार के पीछे पांच प्रमुख कारणों की चर्चा कर रहे हैं।
नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने से बढ़ा असंतोष
दतिया की राजनीति में पूर्व मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा लंबे समय तक प्रभावशाली चेहरा रहे हैं। इस चुनाव में बीजेपी ने उनकी जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया। प्रत्याशी की घोषणा के बाद नरोत्तम समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन और चक्काजाम भी किया था। बाद में पार्टी नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद नरोत्तम मिश्रा प्रचार में सक्रिय दिखे। लेकिन माना जा रहा है कि कार्यकर्ताओं का एक वर्ग पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुआ। चुनावी माहौल में यही नाराजगी भाजपा के लिए चुनौती बन गई।
असंतुष्ट कार्यकर्ताओं का कांग्रेस की ओर झुकाव
चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने कहा कि नरोत्तम मिश्रा व्यक्तिगत रूप से उनकी कोई मदद नहीं की है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भाजपा के नाराज कार्यकर्ताओं का हिस्सा कांग्रेस के पक्ष में खड़ा दिखाई दिया। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस साइलेंट समर्थन ने कांग्रेस को बढ़त दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और मुकाबले का संतुलन बदल गया।
मजबूत उम्मीदवार पर कांग्रेस का दांव सफल
कांग्रेस ने इस चुनाव में पूर्व विधायक और दतिया राजघराने से जुड़े कुंवर घनश्याम सिंह को मैदान में उतारा। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उनकी पहचान पहले से बनी हुई थी। टिकट वितरण को लेकर शुरूआती चर्चाएं जरूर हुईं थी। लेकिन चुनाव के दौरान पार्टी एकजुट नजर आई। घनश्याम सिंह की स्थानीय पकड़ और सहज राजनीतिक छवि ने कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने में मदद की।
नया चेहरा पुराने प्रभाव की बराबरी नहीं कर सका
दतिया की राजनीति लंबे समय से दादा के नाम से प्रसिद्ध नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव के इर्द-गिर्द रही है। संगठन में सक्रिय रहने के बावजूद आशुतोष तिवारी आम मतदाताओं के बीच उतनी मजबूत पहचान नहीं बना पाए थे। बीजेपी ने नया चेहरा उतारा, लेकिन कई मतदाता और कार्यकर्ता उसी प्रभाव के विकल्प के रूप में स्वीकार नहीं कर सके। स्थानीय स्तर पर यह तुलना पूरे चुनाव के दौरान चर्चा का विषय बनी रही।
कम मतदान ने भी बदले चुनावी समीकरण
इस उपचुनाव में मतदान प्रतिशत पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले कर रहा। साल 2023 में जहां लगभग 80.2 प्रतिशत मतदान हुआ। वहीं, इस बार यह घटकर 71.44 प्रतिशत रह गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतदान में करीब 9 प्रतिशत की गिरावट का असर भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक पर अधिक पड़ा। माना जा रहा है कि टिकट बदलने से नाराज समर्थकों का एक वर्ग मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचा। वहीं कांग्रेस अपने समर्थकों को मतदान के लि अधिक प्रभावी ढंग से सक्रिय रखने में सफल रही। यही कारण रहा कि चुनावी मुकाबले में कांग्रेस बढ़त बनाने में कामयाब हुई। साथ ही बीजेपी को महत्वपूर्ण सीट पर हार का सामना करना पड़ा।