Hardoi Bjp Politics

Hardoi Bjp Politics: आरक्षण समीक्षा पर भाजपा के भीतर ही चढ़ी कमान, पूर्व जिलाध्यक्ष की पोस्ट पर घमासान

जंतर-मंतर पर आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और आर्थिक आधार को लेकर चल रही बहस के बीच लोकल भाजपा में भी यह मुद्दा सोशल मीडिया पर विमर्श के केंद्र में आ गया है।

By : विकास जैन
Hardoi Bjp Politics: आरक्षण समीक्षा पर भाजपा के भीतर ही चढ़ी कमान, पूर्व जिलाध्यक्ष की पोस्ट पर घमासान

Hardoi Bjp Politics: आरक्षण समीक्षा पर भाजपा के भीतर ही चढ़ी कमान, पूर्व जिलाध्यक्ष की पोस्ट पर घमासान

बृजेश ’कबीर’, हरदोई: जंतर-मंतर पर आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और आर्थिक आधार को लेकर चल रही बहस के बीच लोकल भाजपा में भी यह मुद्दा सोशल मीडिया पर विमर्श के केंद्र में आ गया है। भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष श्रीकृष्ण शास्त्री की एक पोस्ट ने पार्टी के समर्थक और पदाधिकारी लोगों के बीच ही आरक्षण को लेकर अलग-अलग राय सामने ला दी है। शास्त्री ने आरक्षण व्यवस्था में बदलाव को ’आरक्षण विरोधी’ कोट करते हुए मौजूदा आंदोलन को ‘इकोसिस्टम’ का हिस्सा बताया और सामान्य वर्ग से इस मुद्दे को फिलहाल किनारे रखने की अपील की। इसके बाद उनकी पोस्ट पर आई प्रतिक्रियाओं में कई लोगों ने सवाल किया, यदि युवाओं के मन में आरक्षण व्यवस्था को लेकर प्रश्न हैं तो उन्हें महज राजनीतिक साजिश या ‘मोहरा’ बताकर खारिज क्यों किया जाए?

पूर्व भाजपा महामंत्री बोले- समस्या समाज की है, कांग्रेस या मीडिया की नहीं

शास्त्री की पोस्ट पर भाजपा के पूर्व जिला महामंत्री और पूर्व विधानसभा प्रत्याशी (2012) अभय शंकर शुक्ल ने सीधे सवाल खड़े किए। उन्होंने लिखा, यह समस्या समाज की है, न कि किसी कांग्रेसी या मीडिया की। उनका कहना था, लोगों ने सरकार को इसलिए चुना कि वह उनके प्रश्नों का समाधान करेगी। ऐसे में सरकार से जुड़े अपने लोगों को समाज में उठ रहे सवालों पर चर्चा कर उनके उत्तर तलाशने चाहिए। उन्होंने युवाओं की प्रतिक्रिया को पहचानने और शॉर्टकट के बजाय समस्या के समाधान की कोशिश करने की जरूरत बताई।

भाजयुमो जिला उपाध्यक्ष का प्रश्न- हक की बात करना भाजपा विरोध कैसे?

सबसे स्पष्ट और तल्ख प्रतिक्रिया भारतीय जनता युवा मोर्चा के जिला उपाध्यक्ष कार्तिकेय तिवारी की रही। उन्होंने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व और सामान्य वर्ग के लिए उपलब्ध अवसरों को लेकर कई सवाल उठाए। उनका सवाल था, यदि कोई अपने और बच्चों के हक की बात करता है तो उसे भाजपा विरोधी कैसे माना जा सकता है। कार्तिकेय ने सरकारी विभागों में अलग-अलग सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व की समीक्षा की जरूरत जताते हुए ईडब्ल्यूएस छात्रों के लिए छात्रावास, छात्रवृत्ति और सामान्य वर्ग के लिए आयोग जैसे सवाल भी उठाए। पूछा, 50 प्रतिशत आरक्षण को लंबे समय से अधिकार और ईडब्ल्यूएस के 10 प्रतिशत को अहसान की तरह देखने की मानसिकता पर बहस क्यों नहीं होनी चाहिए।

आरक्षण खत्म नहीं, सुधार की बात

पत्रकार और अधिवक्ता योगेंद्र सिंह ने भी बहस को आरक्षण सुधार से जोड़ने की जरूरत बताई। उनका तर्क था, प्रत्येक आरक्षित वर्ग में एक अपेक्षाकृत संपन्न तबका लगातार लाभ पा रहा है और वंचित जातियों तक लाभ अपेक्षित रूप से नहीं पहुंच रहा। उन्होंने आरक्षण के लाभ के असमान वितरण पर आंकड़ों के साथ बहस की जरूरत बताई और पूछा कि क्या सुधार की बात करना भी गलत है।

हजारों युवा सड़कों पर हैं, मोहरा कहना जवाब नहीं

कमलकांत दीक्षित ने बहस का मूल सवाल सामने रखते हुए कहा, किसी मुद्दे पर हजारों युवा सड़क पर हैं तो उन्हें ‘मोहरा’, ‘इकोसिस्टम’ या किसी राजनीतिक दल का आदमी कह देना समस्या का उत्तर नहीं है। असली सवाल है, मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में सुधार, समीक्षा और समान अवसर पर खुली बहस होनी चाहिए या नहीं? इंजीनियर हेमंत सिंह ने भी शास्त्री की पोस्ट पर आरक्षण से जुड़े आंदोलनों को महज प्रोपेगेंडा मानने पर सवाल उठाया। उन्होंने इसे छात्रों, किसानों और नौजवानों की प्रतिक्रियाएं बताते हुए आत्ममंथन की जरूरत बताई।

मीडिया की ’समझाइश’: मर्म समझें, कुप्रचार ठीक नहीं

‘खंजर सूत्र’ के फाउंडर अभिनव द्विवेदी ने कहा, मौजूदा मुद्दा आरक्षण खत्म करने का नहीं बल्कि ‘आरक्षण रिफॉर्म’ का है। उन्होंने जातिगत आधार के स्थान पर आर्थिक स्थिति को आधार बनाने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन को लेकर सवाल उठाया कि यदि मांग में किसी जाति विशेष का नुकसान नहीं है तो उसके बारे में कुप्रचार क्यों किया जा रहा है। सत्ता भयभीत है? सत्यव्रत शुक्ला ने कहा, सामान्य भाजपा समर्थक कांग्रेस का समर्थन नहीं कर रहे, लेकिन इस बात से निराश हैं कि उनका नेतृत्व अपने लोगों की सुध नहीं ले रहा।

गिरिजेश त्रिपाठी की पोस्ट शेयर कर फंसे शास्त्री

दरअसल, श्रीकृष्ण शास्त्री द्वारा शेयर गिरिजेश त्रिपाठी की पोस्ट में आरक्षण के मुद्दे से ध्यान हटाकर सरकार के अन्य कामों की तुलना करने की बात थी। उन्होंने अनुच्छेद 370, राममंदिर, नक्सलवाद, रक्षा उत्पादन, इंफ्रास्ट्रक्चर, आर्थिक विकास, सीएए और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों को सरकार की उपलब्धियों के रूप में गिनाया। तर्क यह कि आरक्षण खत्म करना राजनीतिक रूप से संभव नहीं है और अधिक सरकारी सीटें बढ़ाकर हर वर्ग को अवसर मिलने की दिशा में काम करना बेहतर रास्ता है। लिखा, राजनीतिक दल आरक्षण के मुद्दे को चिमटे से भी छूने से बचते हैं, इसलिए सामान्य वर्ग को अन्य मुद्दों पर सरकारों का मूल्यांकन करना चाहिए।

यूजीसी के सवाल पर भी मांगा जा रहा जवाब

गिरिजेश त्रिपाठी की पोस्ट शेयर करके शास्त्री ने मानों आफ़त मोल ले ली। पोस्ट पर हुई बहस आरक्षण तक सीमित नहीं रही। बड़ी संख्या में यूजर्स ने शास्त्री से यूजीसी की ‘विभाजनकारी नियमावली’ पर भी स्पष्ट मत मांगा। इसी क्रम में उनकी टिप्पणी- ‘अंधों के लिए प्रकाश का कोई अर्थ नहीं होता’- पर पूर्व जिला महामंत्री अभय शंकर शुक्ल की प्रतिक्रिया चर्चा में रही। उन्होंने पलटकर कहा कि ’जो आंख होते हुए भी आंख बंद कर लें, उन्हें भाग्यहीन कहते हैं।’

’आधी दुनिया’ भी बहस में शामिल

किसी व्यक्ति/दल की अंधभक्त नहीं : गीतिका चतुर्वेदी 

आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की बहस में महिला दृष्टिकोण भी सामने आया। पिछले पालिकाध्यक्ष चुनाव में महिला सीट होने की संभावना के बीच भाजपा से टिकट की दावेदार रहीं शिक्षण संस्थान संचालिका गीतिका चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया हैंडल पर लिखा, समय के साथ विचारों का विस्तार होना ही एक जागरूक व्यक्ति की पहचान है। कहा, उनके लिए राजनीति किसी व्यक्ति या दल की अंधभक्ति नहीं, अपितु समाज, संविधान, शिक्षा, समानता और आमजन के हितों के प्रति जिम्मेदारी है। सवाल पूछने की आजादी, हर वर्ग के सम्मान, महिलाओं की भागीदारी, युवाओं को अवसर और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा को देश को मजबूत बनाने के लिए जरूरी बताया। कहा, उनकी प्राथमिकता हमेशा समाज और शिक्षा रही है और विचार समय तथा अनुभव के साथ और अधिक परिपक्व होते हैं।

मुबाहिसे का सियासी फलसफा क्या?

जंतर-मंतर के आंदोलन ने आरक्षण को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। हरदोई में सामने आई प्रतिक्रियाएं बताती हैं, मुद्दा आरक्षण समाप्त करने या बनाए रखने का नहीं रह गया है। भाजपा समर्थक वर्ग के भीतर से ही समीक्षा, समान अवसर, आरक्षण के लाभ के समान वितरण और आर्थिक आधार जैसे सवाल उठ रहे हैं। श्रीकृष्ण शास्त्री इसे सरकार को अस्थिर करने वाले ‘इकोसिस्टम’ से जोड़ते हैं, जबकि उनकी पोस्ट पर प्रतिक्रिया देने वाले लोग इसे भाजपा समर्थक समाज के भीतर का आत्ममंथन मान रहे हैं। खास तौर पर कार्तिकेय तिवारी की प्रतिक्रिया ने बहस को राजनीतिक विरोध से हटाकर ‘अपने और अपने बच्चों के हक’ के सवाल तक पहुंचा दिया है। फिलहाल सवाल यही है- सड़क पर उठ रहे सवालों को राजनीतिक साजिश मानकर किनारे किया जाए या भाजपा के अपने समर्थक वर्ग की बेचैनी मानकर उस पर खुली बहस की जाए? हरदोई की सोशल मीडिया बहस ने यह सवाल पार्टी के सामने जरूर खड़ा कर दिया है।