आशुतोष शर्मा, आनंदपुर: देशभर में जहां विजयदशमी के पावन पर्व पर रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है, वहीं मध्य प्रदेश के विदिशा जिले की लटेरी तहसील स्थित कालादेव गांव में दशहरा एक बेहद अनोखे और चमत्कारी रूप में मनाया जाता है। यहां रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि उसकी पूजा की जाती है। इसके साथ ही राम और रावण की सेनाओं के बीच गोफन के जरिए पत्थरों का सजीव युद्ध होता है, जिसमें स्थानीय लोगों की अटूट आस्था जुड़ी है।
क्या है 500 साल पुरानी अनोखी परंपरा?
राजधानी भोपाल से करीब 150 किलोमीटर दूर और गुना जिले की सीमा से लगे कालादेव गांव में रावण की लगभग 20 फीट ऊंची प्राचीन पाषाण प्रतिमा स्थित है। दशहरे के दिन यहां दो पक्ष आमने-सामने होते हैं, जिसमें राम दल कालादेव गांव के स्थानीय ग्रामीण और रावण दल गांव से सटे जंगलों में रहने वाले भील और बंजारा आदिवासी समाज के लोग।
कैसे होता है अनूठा युद्ध?
मैदान में रावण की प्रतिमा से करीब 200 मीटर की दूरी पर भगवान राम का ध्वज गाड़ा जाता है। नियम के अनुसार, राम दल के लगभग 200 स्थानीय युवाओं को उस ध्वज की परिक्रमा कर उसे छूना होता है। जैसे ही राम दल के लोग आगे बढ़ते हैं, रावण दल की ओर से गोफन के जरिए पत्थरों की बौछार शुरू हो जाती है। ग्रामीणों की मान्यता है कि इस युद्ध के दौरान गोलियों या तीखे पत्थरों जैसी रफ्तार से आने वाले प्रहार राम दल के किसी भी सैनिक को छू तक नहीं पाते। लोगों का मानना है कि हवा में उड़ती चिड़िया को मार गिराने वाले तीरंदाज भी यहां असहाय नजर आते हैं, और पत्थर राम दल के पास आकर अपनी दिशा बदल लेते हैं। इस परंपरा में यह सख्त नियम है कि राम दल में केवल कालादेव गांव के स्थानीय लोग ही शामिल हो सकते हैं। यदि कोई बाहरी व्यक्ति इसमें शामिल होता है, तो उसे चोट लगने की संभावना मानी जाती है।
जब नवाब ने परखा था चमत्कार
स्थानीय बुजुर्गों की कहानियों के अनुसार, इस परंपरा की सत्यता को परखने के लिए रियासत काल में टोंक के नवाब ने अपने सैनिकों को रावण दल में शामिल किया था और राम दल पर बंदूकों से गोलियां चलवाई थीं। इसके बावजूद कोई भी गोली राम दल के किसी भी सदस्य को नहीं लगी, जिसके बाद नवाब ने भी इस चमत्कारिक परंपरा को स्वीकार किया था।
पूर्व मंत्री ने दिलाई पहचान
लटेरी-सिरोंज क्षेत्र के पूर्व संस्कृति एवं उच्च शिक्षा मंत्री स्वर्गीय लक्ष्मीकांत शर्मा ने इस लुप्त हो रही आदिवासी परंपरा को मुख्यधारा से जोड़ा। उन्होंने कालादेव के इस अनोखे दशहरे को शासन के संस्कृति विभाग की आधिकारिक सूची में शामिल करवाया। आज उनकी इस पहल का परिणाम है कि इस अद्भुत परंपरा को देखने के लिए राजस्थान और अन्य पड़ोसी जिलों से 10 हजार से अधिक लोग कालादेव पहुंचते हैं।