अनुराग तागड़े, इंदौर। स्वाद के मामले में इंदौर की पहचान देशभर में है। सुबह की कचौरी हो, गरमागरम समोसा, शाम के भजिए, जलेबी, पूड़ी या फिर तरह-तरह का नमकीन-शहर में रोज बड़ी मात्रा में खाद्य पदार्थ तेल में तले जाते हैं। लेकिन इन व्यंजनों के स्वाद और कुरकुराहट के पीछे एक महत्वपूर्ण सवाल है। लेकिन इसका जवाब ग्राहक के पास शायद ही होता है। सवाल है कि जिस तेल में कचौरी या समोसा तला जा रहा है, वह आखिर कितना पुराना है और कितनी बार इस्तेमाल हो चुका है?
हालांकि ग्राहक दुकान की सफाई देख सकता है, खाद्य पदार्थ का रंग और स्वाद जांच सकता है, लेकिन कड़ाही में मौजूद तेल का इतिहास नहीं जान सकता। यह तेल नया है या सुबह से लगातार गर्म हो रहा है? इसमें कितने बैच समोसे और कचौरियां तल चुकी हैं? और जब यह तेल उपयोग योग्य नहीं रहता, तब आखिर जाता कहां है? यही सवाल अब खाद्य सुरक्षा के दायरे में गंभीरता से उठने लगा है।
महाराष्ट्र में खाद्य सुरक्षा को लेकर सख्ती के बीच खाद्य एवं औषधि प्रशासन के आयुक्त तुकाराम मुंढे ने खुले खाद्य तेल की बिक्री को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। इस कार्रवाई ने देशभर में खाद्य तेल की गुणवत्ता, उसके स्रोत और उपभोक्ता सुरक्षा पर नई बहस छेड़ दी है। अब सवाल यह है कि जब मिलावटी पनीर, नकली मावा और खराब खाद्य पदार्थों की जांच हो सकती है, तो बार-बार गर्म किए जा रहे तेल की नियमित जांच क्यों नहीं?
रंग से नहीं, गुणवत्ता से तय होगी तेल की स्थिति
अक्सर दुकानों पर इस्तेमाल होने वाला तेल काफी गहरा दिखाई देता है। कहीं उसमें जल्दी धुआं निकलने लगता है, कहीं झाग बनने लगता है और कई बार जले हुए खाद्य पदार्थों के कण भी उसमें दिखाई देते हैं। ये तेल की गुणवत्ता खराब होने के संकेत हो सकते हैं।लेकिन केवल रंग देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि तेल सुरक्षित है या असुरक्षित। साफ दिखाई देने वाला तेल भी जरूरी नहीं कि पूरी तरह सुरक्षित हो और गहरे रंग का तेल भी केवल रंग के आधार पर असुरक्षित घोषित नहीं किया जा सकता।तेल को बार-बार और लंबे समय तक गर्म करने से उसमें रासायनिक परिवर्तन होते हैं। गर्मी, हवा, नमी और खाद्य पदार्थों के अवशेष तेल की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों में बार-बार गर्म किए गए तेल में ऑक्सीकरण से बनने वाले उत्पादों और अन्य अपघटन यौगिकों को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं व्यक्त की गई हैं।भारत में इस्तेमाल किए गए खाद्य तेल की गुणवत्ता के लिए कुल ध्रुवीय यौगिकों की अधिकतम सीमा 25 प्रतिशत निर्धारित की गई है। यानी असली सवाल यह नहीं कि तेल कितनी बार गर्म हुआ, बल्कि यह है कि तेल की गुणवत्ता कितनी बिगड़ चुकी है।
पनीर की जांच होती है, तेल की क्यों नहीं?
खाद्य सुरक्षा विभाग समय-समय पर दूध, मावा, पनीर, मिठाई और नमकीन के नमूने लेकर जांच करता है। मिलावट मिलने पर कार्रवाई भी होती है। लेकिन इंदौर जैसे बड़े खाद्य शहर में कड़ाहियों में इस्तेमाल हो रहे तेल की गुणवत्ता भी नियमित जांच का हिस्सा बननी चाहिए। क्योंकि खाद्य सुरक्षा केवल कच्चे माल की शुद्धता तक सीमित नहीं है। पूरी श्रृंखला महत्वपूर्ण है कच्चा माल, तेल पकाने की प्रक्रिया, तापमान, भंडारण और तैयार भोजन। यदि खाद्य पदार्थ की सामग्री अच्छी है, लेकिन उसे अत्यधिक खराब हो चुके तेल में तला जा रहा है, तो उपभोक्ता की सुरक्षा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
विशेषज्ञों के अनुसार तेल का प्रकार, तापमान, गर्म करने की अवधि, उसमें तले जाने वाले खाद्य पदार्थ और तेल में मौजूद जले हुए कण सभी उसकी गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। इसलिए केवल यह नियम कि तेल को दो या तीन बार ही इस्तेमाल किया जाए, हर स्थिति का वैज्ञानिक समाधान नहीं हो सकता। जरूरी है कि तेल की गुणवत्ता का परीक्षण हो।
खराब तेल का स्वास्थ्य पर असर
वैज्ञानिक अध्ययनों में अत्यधिक गर्म और बार-बार इस्तेमाल किए गए तेल में बनने वाले ऑक्सीकरण उत्पादों को लेकर चिंता जताई गई है। कुछ अध्ययनों में इनके संभावित संबंध ऑक्सीडेटिव तनाव, सूजन और हृदय तथा चयापचय संबंधी जोखिमों से जोड़े गए हैं।हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि हर बार दोबारा गर्म किया गया तेल सीधे किसी गंभीर बीमारी का कारण बनता है। जोखिम तेल की स्थिति, उसके उपयोग की मात्रा और लंबे समय तक सेवन सहित कई कारकों पर निर्भर करता है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि जब तेल खाद्य उपयोग के लिए निर्धारित गुणवत्ता मानकों से नीचे चला जाए तो उसे दोबारा भोजन बनाने में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
इंदौर में उठे “कड़ाही निगरानी” का सवाल
इंदौर में रोज हजारों लीटर तेल का उपयोग भोजनालयों, मिठाई दुकानों, नमकीन निर्माताओं और स्ट्रीट फूड विक्रेताओं द्वारा किया जाता है। ऐसे में खाद्य सुरक्षा विभाग एक विशेष अभियान चलाकर बड़े पैमाने पर तलने वाले प्रतिष्ठानों में तेल की जांच कर सकता है।
निरीक्षण के दौरान पूछा जा सकता है
तेल कब डाला गया?
कितने समय से इस्तेमाल हो रहा है?
उसकी गुणवत्ता की जांच कब हुई?
खराब होने पर तेल कब बदला गया?
और निकाला गया पुराना तेल आखिर गया कहां?
यहीं से खाद्य सुरक्षा की एक नई व्यवस्था शुरू हो सकती है।
खराब तेल कचरा नहीं, बन सकता है जैव ईंधन
खाद्य उपयोग के लिए अनुपयुक्त हो चुका तेल पूरी तरह बेकार नहीं होता। इसे दोबारा खाद्य श्रृंखला में जाने से रोककर अधिकृत व्यवस्था के माध्यम से संग्रहित किया जा सकता है और जैव ईंधन जैसे स्वीकृत उपयोगों में भेजा जा सकता है। यानी जो तेल खाने योग्य नहीं रहा, वह ऊर्जा का स्रोत बन सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि कड़ाही से निकला पुराना तेल किसी अनधिकृत रास्ते से दोबारा भोजन बनाने में न पहुंच जाए। इसलिए बड़े खाद्य प्रतिष्ठानों के लिए तेल खरीदने, इस्तेमाल करने और खराब तेल को अधिकृत संग्रहकर्ता को देने का रिकॉर्ड रखना उपयोगी व्यवस्था हो सकती है।
खुले मक्खन पर भी नजर जरूरी
तेल के साथ एक और सवाल तेजी से उभर रहा है खुले और अत्यधिक मात्रा में इस्तेमाल होने वाले मक्खन का। सोशल मीडिया और फूड व्लॉग्स में कई दुकानों पर भोजन पर मक्खन की मोटी परत डालने का चलन दिखाई देता है।मक्खन स्वयं असुरक्षित खाद्य पदार्थ नहीं है, लेकिन उसकी गुणवत्ता, स्रोत, भंडारण और अत्यधिक उपयोग पर निगरानी जरूरी है। पहले से तेल और वसा से भरपूर भोजन में अत्यधिक मक्खन मिलाने से कुल वसा और संतृप्त वसा की मात्रा बढ़ सकती है।
अब नजर थाली से कड़ाही तक पहुंचे
इंदौर की कचौरी, समोसा और भजिया शहर की पहचान हैं। सवाल इन खाद्य पदार्थों पर रोक लगाने का नहीं है। सवाल है सुरक्षित स्वाद का। महाराष्ट्र में खुले खाद्य तेल को लेकर सख्ती के बाद मध्यप्रदेश में भी खाद्य तेल की गुणवत्ता और उसकी आपूर्ति व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। खासतौर पर इंदौर जैसे शहर में, जहां रोज बड़ी मात्रा में तले हुए खाद्य पदार्थ बिकते हैं।
अब खाद्य सुरक्षा का सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए
“खाने में क्या मिलाया गया है?”बल्कि यह भी होना चाहिए “खाना किस तेल में पकाया गया है?”और सबसे महत्वपूर्ण सवाल “जो तेल खाने लायक नहीं रहा, वह आखिर जा कहां रहा है?”इंदौर ने स्वच्छता में देश को रास्ता दिखाया है। अब समय है कि सुरक्षित खानपान के मामले में भी शहर एक नया उदाहरण पेश करे जहां स्वाद भी बना रहे और कड़ाही की गुणवत्ता पर भी पूरी नजर हो।