हिमांशु सिंह, सीतापुर: संदना थाना क्षेत्र में किसान कमल किशोर की मौत को करीब छह सप्ताह बीत चुके हैं, लेकिन ग्रामीणों के सिर से आदमखोर बाघिन का खतरा टलने का नाम नहीं ले रहा। वन विभाग बाघिन को पकड़ने के लिए लगातार अभियान चलाने का दावा कर रहा है, लेकिन नतीजा अब तक ढाक के तीन पात है। जंगल और खेतों के आसपास घूम रही बाघिन वन विभाग के बिछाए जाल को बार-बार मात दे रही है। सवाल उठ रहा है कि आखिर वन विभाग का शिकंजा इतना कमजोर क्यों है कि आदमखोर बाघिन उसमें फंस ही नहीं पा रही?
बाघिन को पकड़ने के लिए वन विभाग ने कई जगह शिकार बांधकर पिंजरे और जाल लगाए हैं। लेकिन बाघिन इन इंतजामों को भी चकमा दे रही है। कहीं पड़वा उसका निवाला बन रहा है तो कहीं बकरी को मारकर वह निकल जा रही है। यानी शिकार तो बाघिन तक पहुंच रहा है, लेकिन बाघिन शिकंजे तक नहीं पहुंच रही। वह चारा खाकर भी जाल में नहीं फंस रही और वन विभाग की पूरी कवायद पर सवाल छोड़ जा रही है।
छह सप्ताह से अभियान, फिर भी हाथ खाली
कमल किशोर की मौत के बाद से ग्रामीणों को उम्मीद थी कि वन विभाग जल्द ही बाघिन को पकड़कर इलाके को भय से मुक्त करेगा। करीब छह सप्ताह गुजर गए, लेकिन अभियान किसी निर्णायक मुकाम तक नहीं पहुंच सका। पांच किलोमीटर के दायरे में कांबिंग, ड्रोन से निगरानी और ट्रैप कैमरों के सहारे तलाश जारी है। टीम उसके पदचिह्नों के आधार पर संभावित ठिकाने तलाश रही है, मगर बाघिन हर बार एक कदम आगे निकल जा रही है।
बाघिन की दहशत ने ग्रामीणों का जनजीवन प्रभावित कर दिया है। किसान अकेले खेतों में जाने से बच रहे हैं। कई ग्रामीण समूह बनाकर ही खेतों की ओर निकलने को मजबूर हैं। अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा की चिंता सता रही है। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक बाघिन पकड़ी नहीं जाती, तब तक बच्चों को स्कूल भेजना भी जोखिम से खाली नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब वन विभाग को बाघिन की मौजूदगी और उसकी गतिविधियों के संकेत लगातार मिल रहे हैं, जब उसके लिए पड़वा और बकरियां बांधी जा रही हैं, कैमरे और ड्रोन लगाए जा रहे हैं और कई टीमें कांबिंग कर रही हैं, तो फिर बाघिन पकड़ से बाहर क्यों है? बाघिन शिकार कर रही है, वन विभाग के जाल को परख रही है और हर बार निकल जा रही है—लेकिन शिकंजा कसने वाले हाथ अब तक खाली हैं।
लोकेशन मिलते ही पकड़ने का दावा
मिश्रिख रेंज के वन प्रभारी सिकंदर सिंह के अनुसार बाघिन को पकड़ने के लिए टीम लगातार उसके पगचिह्नों के आधार पर कांबिंग कर रही है। ड्रोन और ट्रैप कैमरों से भी निगरानी की जा रही है। उन्होंने बताया कि बाघिन की लोकेशन मिलते ही उसे पकड़ने का प्रयास किया जाएगा।
ग्रामीणों का कहना है कि छह सप्ताह का लंबा समय किसी अभियान के लिए कम नहीं होता। इसके बावजूद यदि आदमखोर बाघिन खुले क्षेत्र में घूम रही है और लोग खेतों तथा बच्चों को लेकर भयभीत हैं तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। कमल किशोर की मौत के बाद भी यदि खतरा बरकरार है तो सवाल सिर्फ बाघिन के खुले घूमने का नहीं, बल्कि उसे पकड़ने की रणनीति की प्रभावशीलता का भी है। ग्रामीण अब कांबिंग, कैमरों और आश्वासनों से आगे बढ़कर बाघिन की गिरफ्तारी चाहते हैं। जब तक बाघिन पिंजरे में नहीं आती, तब तक क्षेत्र में दहशत का साया बने रहने की आशंका है।