Sawan Kajari

Sawan Kajari: अब नहीं सुनाई पड़ता झूला पड़ा लौंग के डलियां, सब सखियां झूलन जईहैं नाय

सावन का नाम आते ही कभी गांवों की तस्वीर बदल जाती थी। आम, नीम और बरगद के पेड़ों की मजबूत डालियों पर रस्सी के झूले पड़ते थे। झूले पर बैठकर युवतियां और महिलाएं सावन के कजरी गीत गातीं, सहेलियों के साथ...

By : विकास जैन
Sawan Kajari: अब नहीं सुनाई पड़ता झूला पड़ा लौंग के डलियां, सब सखियां झूलन जईहैं नाय

Sawan Kajari: अब नहीं सुनाई पड़ता झूला पड़ा लौंग के डलियां, सब सखियां झूलन जईहैं नाय

माता प्रसाद वर्मा, श्रावस्ती: सावन का नाम आते ही कभी गांवों की तस्वीर बदल जाती थी। आम, नीम और बरगद के पेड़ों की मजबूत डालियों पर रस्सी के झूले पड़ते थे। झूले पर बैठकर युवतियां और महिलाएं सावन के कजरी गीत गातीं, सहेलियों के साथ हंसी-मजाक करतीं और घंटों सावन की मस्ती में डूबी रहती थीं। बच्चे भी झूले के लिए अपनी बारी का इंतजार करते थे। गांव की चौपाल से लेकर घरों के आंगन तक सावन की रौनक दिखाई देती थी। आज वही झूले गांवों से धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं।

अब नहीं सुनाई देती कजरी की राग 

सावन और कजरी का रिश्ता सदियों पुराना है। बारिश की बूंदों के बीच जब महिलाओं की टोली कजरी गाती थी तो पूरा गांव लोक संस्कृति की मिठास में डूब जाता था। गीतों में मायके की याद, साजन का इंतजार, प्रेम और विरह की भावनाएं साफ झलकती थीं। पहले शाम होते ही गांव की महिलाएं एक जगह जुटती थीं और देर तक कजरी गाती थीं। अब मोबाइल, टीवी और बदलती जीवन शैली के बीच कजरी की वह सामूहिक परंपरा लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गई है। लोकगीत अब घर-घर की आवाज नहीं, बल्कि मंचों और कार्यक्रमों तक सीमित होते जा रहे हैं।

अब हाथों में मेंहदी रचाने को नहीं जुटती सखियों की टोली

सावन में मेंहदी लगाना कभी महिलाओं और युवतियों के लिए खास उत्सव हुआ करता था। सखियां एक-दूसरे के हाथों में मेंहदी लगाती थीं। किसी की हथेली पर फूल बनते तो किसी के हाथों में बेल-पत्तियों की डिजाइन सजती थी। मेंहदी के बहाने घंटों बातचीत, हंसी-मजाक और गीतों का दौर चलता था। अब बाजार में तैयार मेंहदी और आधुनिक डिजाइन तो आसानी से मिल जाती हैं, लेकिन सखियों की टोली में बैठकर हाथों में मेंहदी रचाने की वह आत्मीयता कम होती जा रही है। सावन आता है, मगर पहले जैसी मेंहदी की रंगत हाथों पर नजर नहीं आती।

मोबाइल और बदलती जीवनशैली ने बदला सावन

समय के साथ गांवों की जीवनशैली भी तेजी से बदली है। मनोरंजन के नए साधनों ने पुराने तौर-तरीकों की जगह ले ली है। पहले खाली समय पेड़ के नीचे झूला झूलने और गीत गाने में बीतता था, अब वही समय मोबाइल की स्क्रीन पर बीत रहा है। सोशल मीडिया पर सावन की रील और वीडियो जरूर दिखाई देते हैं, लेकिन गांव की वास्तविक गलियों और पेड़ सूने हीं दिखाई देते हैं। इसके साथ ही पुराने पेड़ों की कमी ने भी इस परंपरा को प्रभावित किया है। पेड़ घटे तो झूले भी कम हो गए।

लौटाना होगा सावन का पुराना रंग

बुजुर्ग आज भी अपने बचपन के सावन को याद कर भावुक हो जाते हैं। उनका कहना है कि पहले सावन केवल बारिश का महीना नहीं था। बल्कि मिलन, गीत, झूले और रिश्तों की मिठास का पर्व था। जरूरत है कि आधुनिकता के साथ आगे बढ़ते हुए हम अपनी लोक परंपराओं को भी बचाएं। गांवों में सावन झूला उत्सव, कजरी गायन और मेंहदी कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। अधिक से अधिक पेड़ लगाए जाएं और उन पर पारंपरिक झूले डाले जाएं, ताकि नई पीढ़ी भी इस संस्कृति को महसूस कर सके।

सावन की असली खूबसूरती सिर्फ बादलों और बारिश में नहीं, बल्कि उन रिश्तों में थी जो झूले की एक रस्सी से जुड़ जाते थे। जरूरत है कि पेड़ों पर फिर झूले पड़ें, हाथों में फिर मेंहदी रचे और गांव की गलियों में फिर कजरी की आवाज गूंजे। तभी सावन अपने पुराने रंग में लौटेगा।