श्रीनिवास त्रिपाठी, बाराबंकी: बाराबंकी सदर विधानसभा सीट पर 2027 के चुनाव की आहट के साथ सियासी सरगर्मी तेज होने लगी है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती कोई नया चेहरा तलाशने की नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी के लगातार तीन चुनावों से चले आ रहे वर्चस्व को तोड़ने की है। 2012, 2017 और 2022 में जीत दर्ज कर चुके सपा के धर्मराज सिंह यादव उर्फ सुरेश यादव इस सीट पर मजबूत राजनीतिक दावेदार के रूप में खड़े हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने भाजपा को करारी शिकस्त दी थी। सुरेश यादव को 1,25,500 वोट मिले, जबकि भाजपा की डॉ. रामकुमारी मौर्य 90,450 मतों पर सिमट गईं।

विवेक वर्मा की चर्चा क्यों?
बसपा के डॉ. विवेक सिंह वर्मा को 42,506 वोट मिले 35,050 मतों का अंतर भाजपा के लिए महज हार नहीं, बल्कि अपनी चुनावी रणनीति पर पुनर्विचार करने का संकेत था। हालांकि 2022 में बसपा बाराबंकी में हाशिए पर रही। ऐसे में डा. विवेक वर्मा ने मजबूत चुनाव लड़कर यह सिद्ध कर दिया कि पार्टी का आधार वोट बैंक अगर उनके पक्ष में होता तो चुनाव उनके पक्ष में हो सकता था यह चर्चा चुनाव के सालों बाद तक मतदाताओं के जेहन से निकल न सकी अब जब कि पिछले लगभग साढ़े चार साल से डॉ. विवेक वर्मा भाजपा की सदस्यता लेकर लगातार पार्टी का काम निष्ठा से करते हुए विधानसभा के बूथ स्तर तक अपनी पहुंच बना कर मजबूत भाजपा प्रत्याशी के रूप अपनी आमद संगठन से लेकर पार्टी तक बना चुके हैं ऐसे में उनके नाम पर चर्चा स्वाभाविक हो चली है।

सदर सीट से दावेदारों की लाइन!
यूं तो सदर सीट से आधा दर्जन से अधिक भाजपा से टिकटार्थी सदर विधानसभा से अपने भाग्य की आजमाइश में मैदान में हैं। बाराबंकी नवाबगंज सदर की राजनीति में यादव, मुस्लिम, कुर्मी, रावत और दलित मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।सपा को अपने पारंपरिक सामाजिक आधार का लाभ मिलता रहा है, जबकि भाजपा के सामने विभिन्न वर्गों को एकजुट करने की चुनौती है। हालांकि, जातिवार मतदाताओं के प्रमाणित आधिकारिक आंकड़ों के अभाव में किसी समुदाय के निर्णायक प्रभाव का दावा करना उचित नहीं होगा।

भाजपा में चेहरे से ज्यादा रणनीति का सवाल
भाजपा के संभावित प्रत्याशियों को लेकर चर्चाएं भले तेज हों, लेकिन टिकट का आधिकारिक ऐलान होने तक किसी नाम को पक्का उम्मीदवार मानना जल्दबाजी होगी। पार्टी के सामने पुराने चेहरे पर भरोसा जताने, नए दावेदार को मौका देने और स्थानीय संगठन को मजबूत करने जैसे विकल्प हैं।

बसपा की सक्रियता भी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की क्षमता रखती है। ऐसे में भाजपा के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है। क्या वह प्रत्याशी और रणनीति बदलकर सपा का गढ़ भेद पाएगी, या 2027 में भी सदर सीट पर सपा का दबदबा कायम रहेगा?
