उज्जैन। मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में सावन के तीसरे सोमवार और नाग पंचमी के अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। इसी दौरान महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर में भी दर्शन के लिए बड़ी संख्या में भक्त पहुंचे है। मंदिर परिसर में भीड़ बढ़ने के कारण कुछ समय के लिए दबाव जैसी स्थिति बनने की खबर सामने आई। कुछ श्रद्धालुओं के बीच तबीयत बिगड़ने और बेहोश होने की बातें भी सामने आईं। हालांकि, महाकालेश्वर मंदिर समिति ने सोशल मीडिया पर चल रही भगदड़ और लोगों के गंभीर रूप से प्रभावित होने की जानकारी को असत्य बताया है।
हालांकि इनके बीच एक बार फिर नागचंद्रेश्वर मंदिर चर्चा में आ गया है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि मंदिर के कपाट पूरे साल बंद रहते हैं और केवल नाग पंचमी के दिन 24 घंटे के लिए श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोले जाते हैं। आखिर इसके पीछे क्या मान्यता है। और इस मंदिर को इतना विशेष क्यों माना जाता है? आइए जानते हैं।
नागचंद्रेश्वर मंदिर कहां स्थित है?
नागचंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन स्थित प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर की तीसरी मंजिल पर विराजमान है। यहां भगवान शिव के नागचंद्रेश्वर स्वरूप की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं में इस स्थान को नागराज तक्षक से जुड़ा हुआ माना गया है। मंदिर की खास बात यह है कि इसके कपाट साल में सिर्फ एक बार नाग पंचमी के अवसर पर खोले जाते हैं। कपाट खुलने के बाद श्रद्धालु करीब 24 घंटे तक भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन कर सकते हैं। इसके बाद विशेष पूजा और महाआरती के पश्चात मंदिर के कपाट फिर से बंद कर दिए जाते हैं।
क्यों साल में सिर्फ एक बार खुलते हैं कपाट?
नागचंद्रेश्वर मंदिर के साल में केवल एक बार खुलने के पीछे एक प्रचलित पौराणिक कथा बताई जाती है। मान्यता के अनुसार नागराज तक्षक ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अमरता का वरदान दिया। वरदान मिलने के बाद नागराज तक्षक ने महादेव से इच्छा जताई कि वे हमेशा भगवान शिव के सानिध्य में रहना चाहते हैं। उन्होंने महाकाल वन में रहने की अनुमति मांगी। भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।
इतना ही नहीं कहा जाता है कि भगवान शिव ने तक्षक नाग को यह आशीर्वाद भी दिया कि उनकी साधना और एकांत में किसी प्रकार का विघ्न न पड़े। इसी मान्यता के कारण नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट साल में केवल एक दिन, नाग पंचमी पर खोले जाते हैं। बाकी समय मंदिर बंद रहता है और नागराज तक्षक के एकांत की परंपरा कायम रखी जाती है।
क्या है त्रिकाल पूजा का विधान
नागचंद्रेश्वर मंदिर में त्रिकाल पूजा नागपंचमी के दिन मंदिर के कपाट खुलने के बाद यहाँ विशेष त्रिकाल पूजा का विधान है। त्रिकाल पूजा का अर्थ दिन के तीन अलग-अलग समय पर विशेष पूजन से है। इस दौरान अलग-अलग परंपराओं के अनुसार पूजा संपन्न की जाती है।
पहली पूजा रात 12 बजे की
नाग पंचमी की मध्य रात्रि 12 बजे मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। इसके बाद महानिर्वाणी अखाड़े के संतों की ओर से प्रथम पूजा की जाती है। यह पूजा मंदिर के कपाट खुलने के साथ होने वाली प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल है।
दूसरी पूजा दोपहर 12 बजे
दोपहर 12 बजे दूसरी पूजा संपन्न होती है। इस पूजा में शासकीय प्रशासन की ओर से अधिकारी शामिल होते हैं और निर्धारित विधि-विधान के अनुसार भगवान नागचंद्रेश्वर का पूजन किया जाता है।
तीसरी पूजा शाम 7:30 बजे
शाम करीब 7:30 बजे भगवान महाकाल की संध्या आरती के बाद तीसरी पूजा की जाती है। यह पूजा महाकाल मंदिर समिति की ओर से मंदिर के पुरोहित और पुजारी संपन्न कराते हैं।
रात 12 बजे होती है महाआरती
नाग पंचमी के 24 घंटे के दर्शन क्रम के समाप्त होने से पहले रात 12 बजे विशेष महाआरती की जाती है। महाआरती के बाद नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट फिर से बंद कर दिए जाते हैं। इसके बाद श्रद्धालुओं को अगले नाग पंचमी पर्व तक मंदिर के कपाट खुलने का इंतजार करना पड़ता है।
काल सर्प दोष से जुड़ी मान्यता?
नागचंद्रेश्वर मंदिर को लेकर श्रद्धालुओं में कई धार्मिक मान्यताए प्रचलित हैं। माना जाता है कि भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने से व्यक्ति को सर्प दोष से मुक्ति मिलती है। इसी वजह से नाग पंचमी के दिन यहां दर्शन करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं।
नाग पंचमी पर क्यों उमड़ती है इतनी भीड़?
नाग पंचमी के दिन नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट केवल 24 घंटे के लिए खुलते हैं। साल में सिर्फ एक अवसर मिलने के कारण देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। इसके अलावा इसी समय उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भी सावन के कारण बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए आते हैं। इतना ही नहीं कपाट खुलने की परंपरा भी बेहद खास है। मध्य रात्रि 12 बजे महानिर्वाणी अखाड़े के संतों द्वारा विधि-विधान के साथ मंदिर के पट खोले जाते हैं। शैव परंपरा के अनुसार नारियल बांधकर पूजन किया जाता है। इसके बाद 'जय श्री महाकाल' और भगवान नागचंद्रेश्वर के जयघोष के बीच आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन शुरू होते हैं।
सदियों पुरानी परंपरा और आस्था
नागचंद्रेश्वर मंदिर सिर्फ अपनी अनूठी पूजा पद्धति के कारण ही खास नहीं है, बल्कि साल में केवल 24 घंटे खुलने की परंपरा भी इसे देश के विशिष्ट धार्मिक स्थलों में शामिल करती है। नाग पंचमी के दिन यहां भगवान शिव और नागराज तक्षक के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नागराज तक्षक का यह स्थान साधना और एकांत से जुड़ा है। इसी विश्वास के कारण साल के बाकी दिनों में मंदिर के कपाट बंद रखने की परंपरा आज भी निभाई जाती है। नाग पंचमी पर कपाट खुलने के साथ यहां विशेष पूजा, आरती और दर्शन का सिलसिला शुरू होता है और अगले दिन फिर मंदिर एक वर्ष के लिए बंद हो जाता है। उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर इसी अनोखी परंपरा, पौराणिक मान्यताओं और भगवान शिव से जुड़े धार्मिक महत्व के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है।