दक्षिण अफ्रीका की नवी पिल्लै को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है। उनके पुरखे भारत के तमिलनाडु प्रांत से दक्षिण अफ्रीका जाकर बसे थे। उनसे पहले, उन्हीं की तरह की पृष्ठभूमि वाले लेखक वी.एस. नायपॉल को 2001 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था। नायपॉल से नवी पिल्लै तक की यात्रा बताती है कि इतिहास की सबसे कठिन परिस्थितियाँ भी किसी समुदाय की संभावनाओं को खत्म नहीं कर सकतीं।
भारत से हजारों किलोमीटर दूर गए गिरमिटिया मजदूरों की कहानी आज एक नए मुकाम पर पहुँची है। उनके पुरखों ने दूसरे देशों में खेतों और गन्ने के बागानों में काम किया। उन्हें अपमान सहना पड़ा। उनकी मेहनत का पूरा फल भी उन्हें नहीं मिला। लेकिन उनकी अगली पीढ़ियों ने दुनिया में अपनी पहचान बनाई। आज उनके वंशज साहित्य, कानून, राजनीति और शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।पिल्लै को यह सम्मान शांति, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने के प्रयासों के लिए मिला है। उनका जन्म भारतीय तमिल मूल के एक परिवार में हुआ था। उनके परिवार का इतिहास भारत से दक्षिण अफ्रीका पहुँचे गिरमिटिया मजदूरों से जुड़ा है। उनकी उपलब्धि केवल एक व्यक्ति की सफलता नहीं है। यह उस लंबे संघर्ष की पहचान भी है, जिसमें कई पीढ़ियों ने हिस्सा लिया।
पिल्लै की उपलब्धि वी.एस. नायपॉल की याद दिलाती है। नायपॉल को 2001 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था। उनका जन्म त्रिनिदाद में हुआ था। उनके पूर्वज भी भारत से गिरमिटिया मजदूर बनकर कैरेबियाई क्षेत्र में पहुँचे थे। इस तरह दोनों की पारिवारिक पृष्ठभूमि में एक ऐतिहासिक समानता है। दोनों की जड़ें उस भारत में हैं, जहाँ से उनके पुरखे औपनिवेशिक व्यवस्था के दौर में विदेश गए थे।इतिहास की कठिन विरासत गिरमिटिया शब्द अंग्रेजी के 'एग्रीमेंट' से बना है। ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय मजदूरों को एक अनुबंध के तहत दूसरे देशों में भेजा जाता था। बहुत से लोगों को यह नहीं मालूम था कि विदेश में उनका जीवन कैसा होगा। वे मॉरीशस, फिजी, दक्षिण अफ्रीका, गुयाना, सूरीनाम और त्रिनिदाद जैसे देशों में पहुँचे।इन मजदूरों का जीवन कठिन था। काम के घंटे लंबे थे। मजदूरी कम थी। रहने की स्थितियाँ खराब थीं। नस्ल और सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव भी होता था। कई लोगों के लिए भारत लौटना मुश्किल था। धीरे-धीरे उन्होंने वहीं अपना घर बसा लिया। उनकी संतानों ने नए समाजों में जीवन शुरू किया।
इन परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि उन्हें अपनी पहचान भी बचानी थी और नए समाज में जगह भी बनानी थी। भाषा बदली। रहन-सहन बदला। कई परंपराएँ बदलीं। लेकिन पुरखों की स्मृतियाँ बनी रहीं। यही स्मृतियाँ गिरमिटिया समुदायों के इतिहास को खास बनाती हैं।नायपॉल की साहित्यिक यात्रा इस इतिहास का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने अपने लेखन में प्रवास, विस्थापन और पहचान के सवाल उठाए। वे अपनी जड़ों को समझना चाहते थे। साथ ही, वे उस समाज में अपनी जगह भी तलाशते थे, जहाँ उनका जन्म हुआ था।
पिल्लै की लड़ाई:नवी पिल्लै ने साहित्य के बजाय कानून और मानवाधिकार के क्षेत्र में काम किया। उनका जन्म 1941 में डरबन में हुआ। डरबन के बारे में कहा जाता है कि भारत के बाहर शायद ही किसी अन्य शहर में इतने भारतवंशी रहते हों।पिल्लै ने कानून की पढ़ाई की। उन्होंने रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं के अधिकारों की रक्षा की। बाद में वह दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय में नियुक्त होने वाली पहली गैर-श्वेत महिला बनीं। उन्होंने रवांडा के अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद वह संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त बनीं।
संघर्ष से सम्मान तक:गिरमिटिया भारतीयों की उपलब्धियों को केवल कुछ महान व्यक्तियों की सफलता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इनके पीछे उन पूरे समुदायों का संघर्ष है, जिन्होंने कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा को महत्त्व दिया, अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई और आने वाली पीढ़ियों के लिए नए अवसर बनाए।मॉरीशस में भारतीय मूल के लोगों ने राजनीति और प्रशासन में महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया। फिजी में उन्होंने शिक्षा, कारोबार और सार्वजनिक जीवन में अपनी पहचान स्थापित की।सियासत की दुनिया में गिरमिटिया परिवारों ने बहुत पहले ही अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी थी। इस लिहाज से गुयाना के पूर्व राष्ट्रपति छेदी जगन, त्रिनिदाद और टोबैगो के पूर्व प्रधानमंत्री बासदेव पांडे तथा मॉरीशस के प्रमुख भारतवंशी नेता और पूर्व राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ के नाम खासतौर पर लिए जा सकते हैं।छेदी जगन (1918-1997) गुयाना के पहले हिंदू और भारतीय मूल के प्रमुख नेताओं में से एक थे। उनके माता-पिता उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से अनुबंधित मजदूरों के रूप में ब्रिटिश गयाना पहुँचे थे।
अगर बात बासदेव पांडे (1933-2024) की करें, तो वे त्रिनिदाद और टोबैगो के पहले भारतीय मूल के और पहले हिंदू प्रधानमंत्री थे। वे ट्रेड यूनियनिस्ट, वकील और राजनेता थे। 1995 में यूनाइटेड नेशनल कांग्रेस के नेतृत्व में वे प्रधानमंत्री बने और 2001 तक इस पद पर रहे। पांडे ने इंडो-त्रिनिदादियन समुदाय को मुख्यधारा की राजनीति में लाकर इतिहास रचा। उन्हें 'सिल्वर फॉक्स' के नाम से जाना जाता था।
अनिरुद्ध जगन्नाथ (1930-2021) मॉरीशस के सबसे प्रभावशाली भारतवंशी नेताओं में से एक थे। उनका जन्म भोजपुरी बोलने वाले एक हिंदू परिवार में हुआ था, जिसके पूर्वज 19वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से मॉरीशस पहुँचे थे। वे वकील थे और छह बार प्रधानमंत्री रहे। उन्होंने 2003 से 2012 तक राष्ट्रपति के रूप में भी कार्य किया।दरअसल, भारत को भी गिरमिटिया भारतीयों के इतिहास को गंभीरता से समझने की जरूरत है। यह इतिहास केवल मजबूरी में विदेश गए मजदूरों की कहानी नहीं है। यह मानवीय साहस, शिक्षा, सामाजिक परिवर्तन और पीढ़ियों के संघर्ष की कहानी है।इन भारतीय मूल के लोगों ने राजनीति, कारोबार, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में अपनी जगह बनाई। उनकी यात्रा यह भी बताती है कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों को बचाए रखते हुए नए समाजों का हिस्सा बना जा सकता है।

विवेक शुक्ला
(लेखक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के पूर्व सलाहकार हैं।)