घर में लौटते ही सवाल होता था-‘दिन कैसा रहा?’ अब सवाल पूछने से पहले लोग फोन की स्क्रीन देखते हैं। कभी चाय की मेज पर विचार टकराते थे, अब उसी मेज पर चार लोग बैठे होते हैं और चारों की आंखें चार अलग-अलग स्क्रीन पर टिकी होती हैं। कभी दोस्त मिलने के लिए समय निकालते थे, अब ऑनलाइन होना ही मिलने का विकल्प मान लिया गया है। यह केवल जीवनशैली में आया बदलाव नहीं है; यह हमारे सामाजिक व्यवहार में हो रहा एक गहरा परिवर्तन है।
स्मार्टफोन ने संचार को आसान बनाने का दावा किया था, लेकिन विडंबना यह है कि उसी स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल के साथ आमने-सामने का संवाद सिकुड़ता जा रहा है। हमारे पास बात करने के लिए पहले से अधिक माध्यम हैं, लेकिन बात करने का समय कम है। संपर्कों की सूची लंबी होती जा रही है, मगर आत्मीय रिश्तों का दायरा कहीं-कहीं छोटा पड़ता जा रहा है।
अमेरिका के मिशिगन और एरिजोना विश्वविद्यालयों से जुड़े शोधकर्ताओं के अध्ययन ने इसी बदलती तस्वीर पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अध्ययन के अनुसार, 2005 से 2019 के बीच लोगों की रोजमर्रा की बोलचाल में औसतन 28 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। 2007 के एक अध्ययन में एक व्यक्ति प्रतिदिन औसतन 15,959 शब्द बोलता था, जबकि बाद के आंकड़ों में यह संख्या घटकर करीब 12,792 शब्द रह गई। शब्दों की यह कमी महज आंकड़ा नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि हमारी सामाजिक जिंदगी में बातचीत की जगह धीरे-धीरे डिजिटल प्रतिक्रिया ले रही है।
इस सवाल का जवाब समाज को गंभीरता से तलाशना होगा।
किसी व्यक्ति के चेहरे पर आई उदासी देखकर पूछना-‘क्या हुआ?’ और उसके स्टेटस पर एक उदास इमोजी भेज देना, दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। आवाज में छिपी चिंता, आंखों में दिखाई देने वाली बेचैनी और कुछ पल की चुप्पी-ये वे भाषाएं हैं, जिन्हें कोई स्क्रीन पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकती।इस संकट का सबसे बड़ा असर युवाओं पर दिखाई दे रहा है। अध्ययन के अनुसार, 25 वर्ष से कम उम्र के युवाओं में बातचीत में गिरावट अधिक तेज रही। यही वह पीढ़ी है, जिसके हाथ में तकनीक सबसे अधिक है और जिसके पास संवाद के अवसर भी सबसे अधिक होने चाहिए थे। लेकिन विडंबना देखिए, ऑनलाइन दुनिया में हजारों लोगों से जुड़ा युवा कई बार अपने ही घर में बैठे व्यक्ति से बातचीत करने में असहज महसूस करता है।
कारण साफ है। स्मार्टफोन अब केवल फोन नहीं रह गया। वह मनोरंजन का साधन है, समाचार का स्रोत है, काम की जगह है, दोस्ती का माध्यम है और खाली समय का सबसे आसान साथी भी। रील्स, शॉर्ट वीडियो, ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया लगातार हमारा ध्यान मांगते हैं। हर कुछ मिनट में आने वाला नोटिफिकेशन दिमाग को फिर स्क्रीन की ओर खींच लेता है।
समस्या यहीं से गंभीर होती है।
जब स्क्रीन हमारा समय ही नहीं, हमारा ध्यान भी नियंत्रित करने लगे, तब तकनीक सुविधा नहीं, आदत बन जाती है। सोशल मीडिया का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि वह हमें ‘जुड़े रहने’ का एहसास देता है, जबकि कई बार वास्तविक जीवन में दूरी बढ़ा देता है। हमारे पास सैकड़ों मित्र हो सकते हैं, लेकिन संकट की घड़ी में पास बैठकर सुनने वाला कोई नहीं।इस आभासी सक्रियता का संबंध अकेलेपन से भी जुड़ता है। लगातार सोशल मीडिया देखने से व्यक्ति दूसरों के जीवन से अपनी तुलना करने लगता है। उसे लगता है कि बाकी सभी लोग उससे अधिक खुश, सफल और संतुष्ट हैं। धीरे-धीरे वास्तविक जीवन से असंतोष और आभासी दुनिया पर निर्भरता बढ़ सकती है। दूसरी ओर, लंबे समय तक अकेलापन और सामाजिक अलगाव मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं।
शारीरिक स्वास्थ्य भी इससे अछूता नहीं है। घंटों स्क्रीन पर टिके रहने का अर्थ अक्सर कम शारीरिक गतिविधि, देर रात तक जागना और नींद की दिनचर्या बिगाड़ना होता है। यानी जिस उपकरण को हमने अपनी जिंदगी को सुविधाजनक बनाने के लिए अपनाया था, उसका अनियंत्रित इस्तेमाल शरीर और मन दोनों के लिए बोझ बन सकता है।परिवार इस बदलाव का सबसे बड़ा गवाह है। एक कमरे में बैठे लोग साथ जरूर हैं, लेकिन एक-दूसरे के साथ नहीं। भोजन की मेज पर बातचीत की जगह स्क्रीन ने ले ली है। बच्चों को फोन से दूर रहने की सलाह देने वाले माता-पिता खुद हर कुछ मिनट में स्क्रीन जांचते हैं। ऐसे में बच्चों को दिया गया उपदेश कितना असर करेगा?
इसलिए समाधान स्मार्टफोन छोड़ देना नहीं है। समाधान है- स्मार्टफोन को उसकी सीमा बताना। घर में ‘नो-फोन’ समय तय किया जा सकता है। भोजन के दौरान फोन अलग रखा जा सकता है। परिवार रोज कुछ समय बिना स्क्रीन के बातचीत में बिताए। दोस्तों से कभी-कभी चैट की जगह आमने-सामने मुलाकात हो। बच्चों को डिजिटल अनुशासन सिखाने से पहले बड़ों को उसका उदाहरण बनना होगा।
हमें यह भी समझना होगा कि संवाद केवल शब्दों का लेन-देन नहीं है। संवाद रिश्तों की सांस है। उसमें आवाज की गर्माहट है, आंखों का भरोसा है, चेहरे के भाव हैं, बीच-बीच की चुप्पी है और वह मानवीय स्पर्श है, जो किसी टूटे हुए व्यक्ति को यह भरोसा देता है कि वह अकेला नहीं है।
स्मार्टफोन बुरा नहीं है। सोशल मीडिया भी अपने आप में दुश्मन नहीं है। असली खतरा तब पैदा होता है, जब साधन साध्य बन जाए और तकनीक जीवन को संचालित करने लगे। आज जरूरत फोन फेंकने की नहीं, फोन को उसकी जगह वापस देने की है। हमें यह तय करना होगा कि तकनीक हमारे रिश्तों को मजबूत करेगी या रिश्तों की जगह लेगी।क्योंकि अगर बातचीत की जगह नोटिफिकेशन, मुलाकात की जगह वीडियो कॉल और संवेदना की जगह इमोजी लेते गए, तो एक दिन हमारे पास संपर्कों की लंबी सूची होगी, मगर बात करने के लिए अपना कोई नहीं।
समाज केवल नेटवर्क से नहीं बनता, रिश्तों से बनता है। और रिश्ते ‘ऑनलाइन’ नहीं, संवाद से जीवित रहते हैं। इसलिए अगली बार जब घर में कोई आपके सामने बैठा हो, तो स्क्रीन पर नहीं, उसकी आंखों में देखिए। संभव है, जिस संवाद की तलाश हम सोशल मीडिया पर कर रहे हैं, वह हमारे बिल्कुल पास बैठा हो।

प्रो. डॉ. राकेश शर्मा
(लेखक स्वदेश के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख हैं।)