नई दिल्ली। एक इंग्लिश अखबार की खबर के बाद से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार वाला मुद्दा गरमा गया है। सीईसी के साथ ही चुनाव आयोग एक बार फिर विपक्ष के निशाने पर हैं। इसी बीच दिलचस्प सवाल उठ रहा है कि जिस कानून पर आज विपक्ष सवाल उठा रहा है। उसे संसद में पास होते वक्त विपक्ष कहां था।
ताजा विवाद की शुरुआत कहां से हुई
एक निजी अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियाँ दर्ज कराईं। रिपोर्ट के अनुसार उनकी जानकारी के बिना आयोग ने नाम पर फैसले लिए गए। इस पर विपक्ष नेता राहुल गांधी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इसे वोट चोरी और संविधान पर हलमा बताया। कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष अब ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा मांग रहा है। चुनाव आयोग ने आरोपों को खारिज कर दिया है। आयोग का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में अलग-अलग राय होना फैसले की प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है।
जानिए 2023 का कानून क्यों बना विवाद की जड़
पूरा मामला दिसंबर 2023 में बने कानून से जुड़ा है। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने फैसला दिया था कि जब तक संसद कानून न बनाए, तब तक सीईसी और चुनाव आयुक्तों को एक समिति चुनेगी। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश होंगे। इसके बाद केंद्र सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त विधेयक 2023 लेकर आई। नए कानून में सीजेआई को समिति से हटा दिया गया। उनकी जगह प्रधानमंत्री के नामित एक कैबिनेट मंत्री को रखा गया। नतीजा यह हुआ कि समिति में सरकार का बहुमत 2-1 का हो गया। विपक्ष तभी से आयोग की स्वायत्तता पर सवाल उठा रहा है।
21 दिसंबर 2023 को लोकसभा में क्या हुआ था
अब सवाल यह है कि अगर विपक्षा इस कानून के इतने खिलाफ था। तब 21 दिसंबर 2023 को लोकसभा में उनका जोरदार विरोध क्यों नहीं दिखा। दरअसल, 13 दिसंबर 2023 को लोकसभा में सुरक्षा चूक हुई थी। इसके बाद विपक्ष गृह मंत्री के बयान और चर्चा की मांग पर अड़ गया। हंगामा बढ़ा तो सांसदों के निलंबन का सिलसिला शुरू हो गया। जिस दिन यह बिल सदन में आया। उस दिन लोकसभा के 100 विपक्षी सांसद निलंबित हो चुके थे। दोनों सदनों को मिलाकर कुल 146 सांसद बाहर थे। विपक्षी बेंच लगभग खाली थीं। सिर्फ 1 घंटे 40 मिनट चली बहस में एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी अकेले विपक्षी सांसद थे। उन्होंने बिल के खिलाफ अपनी बात रखी।
क्या रहे थे विपक्ष नेता राहुल गांधी
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि राहुल गांधी उस वक्त निलंबित नहीं थे और सदन में मौजूद थे। लेकिन तब पूरे विपक्ष का फोकस सुरक्षा चूक और साथी सांसदों के निलंबन के विरोध पर था। भारी हंगामे के बीच राहुल गांधी इस बिल की बहस में हिस्सा नहीं ले पाए। वे अपनी आपत्ति भी दर्ज नहीं करा सके।