नई दिल्ली। रूस और यूक्रेन के बीच पांचवें साल में पहुंच चुका युद्ध अब सिर्फ मोर्चे तक सीमित नहीं है। ऊर्जा ढांचे, बंदरगाहों और काला सागर में वाणिज्यिक जहाजों पर बढ़ते हमलों के बीच भारत ने दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए तीन हिस्सों वाली सीजफायर पहल सामने रखी है। यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने इसे भारत की ओर से आया सबसे व्यापक प्रस्ताव बताया है।
इस पहल की खास बात यह है कि इसमें केवल लड़ाई रोकने की बात नहीं है। भारत का प्रस्ताव ऊर्जा और अन्य महत्वपूर्ण ढांचे पर हमले रोकने, काला सागर के रास्ते अनाज और ऊर्जा की आवाजाही जारी रखने तथा व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर केंद्रित है। भारत के विदेश मंत्रालय ने 8 अक्टूबर को भी कहा कि रूस और यूक्रेन दोनों से इस प्रस्ताव को लेकर बातचीत जारी है।

भारत के प्रस्ताव में आखिर क्या है?
भारत की पूरी योजना सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक इसका ढांचा तीन प्रमुख हिस्सों पर आधारित है। पहला, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और दूसरे अहम बुनियादी ढांचे पर हमले रोकना। दूसरा, काला सागर के बंदरगाहों से अनाज और ऊर्जा की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करना। तीसरा, वाणिज्यिक जहाजों और उनके चालक दल को हमलों से बचाना।
दरअसल, यही वह हिस्सा है जो भारत की पहल को दूसरे प्रस्तावों से अलग बनाता है। तुर्किये और मिस्र की पहल मुख्य रूप से काला सागर में जहाजों की आवाजाही और अनाज निर्यात को सुरक्षित रखने पर केंद्रित बताई गई है, जबकि अमेरिका का प्रस्ताव ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रोकने पर जोर देता है। भारत ने इन मुद्दों को एक व्यापक पैकेज में जोड़ने की कोशिश की है।
भारत के लिए यह मुद्दा सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है। काला सागर में व्यापारिक जहाजों पर हमलों से भारतीय नाविक भी प्रभावित हुए हैं। विदेश मंत्रालय ने हालिया हमलों पर चिंता जताते हुए कहा है कि ऐसे हमले वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा और भारतीय समुद्री समुदाय की जान को खतरे में डालते हैं।
यूक्रेन ने भारत के प्रस्ताव को क्यों बताया सबसे व्यापक?
यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने अक्टूबर की शुरुआत में कहा था कि कीव को भारत, तुर्किये, मिस्र और अमेरिका से चार अलग-अलग सीजफायर प्रस्ताव मिले हैं। उनके मुताबिक भारत का प्रस्ताव सबसे व्यापक है।
कीव का रुख हालांकि पूरी तरह आसान नहीं है। यूक्रेन ऊर्जा क्षेत्र और काला सागर में एक साथ युद्धविराम चाहता है। सिबिहा ने संकेत दिया कि केवल एक क्षेत्र में हमले रोकने से बात नहीं बनेगी। बंदरगाहों और ऊर्जा ढांचे को भी किसी संभावित समझौते में शामिल करना होगा।
यूक्रेन ने यह भी कहा है कि वह अलग-अलग तरह के युद्धविराम विकल्पों पर विचार करने को तैयार है। इसमें मौजूदा मोर्चे पर व्यापक युद्धविराम का विकल्प भी शामिल है। लेकिन इसके लिए रूस की सहमति सबसे अहम होगी।
रूस का रुख क्या है और आगे क्या होगा?
यहीं से असली चुनौती शुरू होती है। भारत की पहल को लेकर रूस की तरफ से फिलहाल सकारात्मक संकेत जरूर मिले हैं। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विचारों को स्वीकार्य समाधान खोजने की दिशा में अच्छा बताया है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मॉस्को ने भारत के पूरे प्रस्ताव को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया है।
यही सवाल अब उठ रहा है कि क्या भारत का Russia-Ukraine ceasefire proposal वास्तव में जमीन पर लागू हो सकता है? इसका जवाब अभी सीधा नहीं है। युद्ध के दौरान दोनों पक्षों के बीच भरोसा बेहद कमजोर है और ऊर्जा ढांचे तथा काला सागर में हमले लगातार जारी हैं।
तुर्किये के पास इस मामले में कुछ पुराना अनुभव जरूर है। 2022 में संयुक्त राष्ट्र के साथ उसकी मध्यस्थता से ब्लैक सी ग्रेन इनिशिएटिव हुआ था, जिसने कुछ समय के लिए यूक्रेनी अनाज को वैश्विक बाजारों तक पहुंचने में मदद की थी। तुर्किये अब भी काला सागर में नौवहन सुरक्षा और अनाज की आवाजाही को लेकर नए समझौते की कोशिश कर रहा है।
भारत के लिए भी इस पहल का महत्व बढ़ गया है। काला सागर में व्यापारिक जहाजों पर हमलों का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा, खाद्य आपूर्ति और शिपिंग लागत पर पड़ सकता है। ऐसे में अगर सीमित स्तर पर भी ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा को लेकर कोई सहमति बनती है, तो उसका असर रूस और यूक्रेन से बाहर भी दिखाई दे सकता है।