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रांची/डेस्क: हर साल आषाढ़ की द्वितीय तिथि को भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है. यह परम्परा सदियों पुरानी है, जो हिन्दुओं के पवित्र धाम पूरी से समस्त विश्व में संचालित है. इस वर्ष विदेशी संस्कृति के अनुयायी इस्कॉन की ओर से हिन्दू परंपरा के विरुद्ध अपने हिसाब से पंचमी तिथि को रथ यात्रा निकाली जा रही है. परंपरा के विरुद्ध कार्य करने पर कई हिंदू संगठन के लोग इसका विरोध कर रहे हैं.
न्यास समिति के उपाध्यक्ष सह प्रथम सेवक ठाकुर सुधांशु नाथ साहदेव ने इस्कॉन द्वारा निकाली जा रही इस रथ यात्रा पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा इस्कॉन की और से हिन्दू परंपरा के विरुद्ध अपने हिसाब से पंचमी तिथि को रथ यात्रा निकाली जा रही है. यहां तक की परंपरा के अनुसार रथ का निर्माण भी नहीं कराया गया है. केवल एक गाड़ी को रथ का नाम दिया जा रहा है और इसी गाड़ी में भगवान के स्वरुप को बैठा कर रथ यात्रा निकाली जाएगी. इतना ही नहीं रथ का समापन एक आपार्टमेंट के बाहर होगा, जो कि काफी विचित्र है.
रांची की पारंपरिक रथ यात्रा
सुधांशु नाथ साहदेव ने कहा कि झारखंड की राजधानी रांची में भी रथ यात्रा की परंपरा नागवंशी साम्राज्य के द्वारा शुरू की गयी थी. सर्वप्रथम वर्ष 1691 में नागवंशी राजा ठाकुर एनीनाथ साहदेव ने पूरी के तर्ज पर रांची के जगन्नाथपुर में एक पहाड़ी के ऊपर अपने कुल देवता भगवान जगन्नाथ का एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था. पूरी में समुद्र है जो रांची में संभव नहीं है इसलिए उन्होंने मंदिर के दक्षिण की और समुद्र के स्थान पर विशाल तालाब का निर्माण भी करवाया था, ताकि मंदिर में भक्तों को पूरी जैसी अनुभूति मिले.
जिस तरह आदि शंकराचार्य के समय से आशाढ़ की द्वितीय तिथि को रथ यात्रा निकाली जाती है, उसी प्रकार ठाकुर साहब एवं उनके साम्राज्य के नागरिकों द्वारा 1691 से ही भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को रथ में बैठा कर मौसीबाड़ी श्रद्धा पूर्वक ले जाया जाता है. उसके बाद 9 दिनों के वहां के प्रवास के बाद भगवान पुन: अपने स्थान पर रथ में बैठकर वापस आते हैं. सारी परंपराओं का निर्वहन ठीक वैसे ही होता है जैसे पुरी में होता है.