इंदौरः बालिकाओं की सुरक्षा और शिक्षा के लिए सरकार और समाज के स्तर पर तो अनेक प्रयास-प्रकल्प चल रहे हंै, लेकिन अहिल्या नगरी इंदौर में तीन दशक से दिव्यांग बालिकाओं के लिए सुरक्षा-शिक्षा और भविष्य सुधार का यज्ञ चल रहा है। जो बालिकाएं बोल नहीं सकतीं, सुन नहीं सकतीं, उनके सामुदायिक विकास से लेकर शिक्षा, उच्च शिक्षा, रोजगार और विवाह संस्कार तक का दायित्व निर्वाह 'पुरोहितÓ की भूमिका में दंपति मोनिका-ज्ञानेंद्र पुरोहित कर रहे हंै। इस सेवा अनुष्ठान में डेढ़ हजार से अधिक दिव्यांग बालिकाओं का जीवन संवारा गया है।

जब हर तरह से सक्षम बेटियां अनेक तरह के असुरक्षा कारकों से घिरी रहती हैं, तब विचार किया जा सकता है कि उन बालिकाओं की स्थिति क्या होगी? जो दिव्यांग ही नहीं, दिव्यांगता भी ऐसी कि बोल भी नहीं सकतीं, सुन भी नहीं सकतीं, यहां तक कि उनमें से कुछ तो देख भी नहीं सकतीं, वे अपनी पीड़ा आस-पड़ोस तो दूर, अनेक बार परिवार में भी अभिव्यक्त करने में कैसे समर्थ होती होंगी। ऐसी ही असंख्य दिव्यांग बालिकाओं के लिए सुरक्षा का भरोसा बनकर अहिल्या नगरी इंदौर में 30 वर्ष पूर्व 'आनंद सर्विस सोसायटीÓ नाम से एक संस्था का उदय हुआ, जिसकी वर्तमान संचालक मोनिका-ज्ञानेंद्र पुरोहित हैं। यह संस्था सिर्फ दिव्यांग बालिकाओं के लिए कार्य करती है, जबकि धार में मांडव के पास धामनोद मार्ग पर ऐसे ही दिव्यांग बालकों का भी सुधार व सुरक्षा यज्ञ चल रहा है।
120 से अधिक बालिकाएं और 16 से अधिक दिव्यांग शिक्षक
आनंद सर्विस सोसायटी में वर्तमान में 120 से अधिक दिव्यांग बालिकाएं हंै, जिसमें पहली से 12वीं तक की बालिकाएं अध्ययनरत हैं। उच्च शिक्षा, जिसमें बीए, बीएड करने वाली दिव्यांग बालिकाओं की संख्या 8 से अधिक है। इन सभी बालिकाओं को 16 दिव्यांग शिक्षक उन्हीं की भाषा 'इशारोंÓ (साइन लैंग्वेज) में शिक्षित-दीक्षित करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि यहां पर धार, झाबुआ, आलीराजपुर, बड़वानी, खंडवा, खरगोन, रीवा, सतना, सीधी, पन्ना, होशंगाबाद की दिव्यांग बालिकाएं भी आवासीय परिसर में अध्ययन करती हैं। यहां पर कार्यरत 50 प्रतिशत से अधिक स्टॉफ ऐसा है जो स्वयं भी बोल और सुन नहीं पाते, लेकिन वे इस भविष्य सुधार प्रकल्प को बड़ी तन्मयता और प्रामाणिकता के साथ पूर्ण कर रहे हैं।
गांव-गांव करते हैं संपर्क
आनंद सर्विस सोसायटी की संचालिका मोनिका पुरोहित बताती हैं कि गर्मियों में हम गांव के सरपंच और मुखियाओं तक संपर्क करते हंै और संस्था किस तरह से दिव्यांग बालिकाओं के लिए प्रयास कर रही है, उसकी जानकारी देकर ऐसी दिव्यांग बालिकाओं को जोड़ते हैं। अनेक बार इसी तरह से परिवार, रिश्तेदार द्वारा उपेक्षित ऐसी बालिकाओं तक पहुंचा जाता है।
सरकारी अनुदान नहीं लेते
मोनिका बताती हैं कि संस्था को किसी भी तरह का सरकारी अनुदान प्राप्त नहीं होता है। जनसहयोग एवं सीएसआर फंड से जो कुछ सहयोग, सामग्री, भोजन एवं खाने-पीने की वस्तुएं मिलती हैं वे स्वीकार होती हैं। अनेक बार जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगांठ बालिकाओं के बीच मनाने यहां लोग आते हैं। इसमें बड़ी संख्या में युवा दंपति ही होते हैं।
प्रत्येक जिले में व्यक्ति तैनात
कहां पर ऐसी दिव्यांग बालिकाएं हैं, इसकी जानकारी के लिए संस्था ने प्रत्येक जिले में एक दिव्यांग कार्यकर्ता तैनात कर रखा है। कोई मामला थाने में आए या किसी विभाग के संज्ञान में, तुरंत वह कार्यकर्ता वहां पर संपर्क करने के बाद संस्था को सूचित करता है और उस असहाय बालिका के लिए संस्था आ जाती है।

यहां से जाकर भी संपर्क बना हुआ
यहां से शिक्षा प्राप्त करने के बाद अनेक बालिकाएं सरकारी व निजी सेवाओं में कार्यरत हैं। जो घर-परिवार तक सीमित रहना चाहती हैं, उनका माता-पिता और परिवार की सहमति से विवाह भी करवाया जाता है। ऐसी अनेक बालिकाएं हैं, जो अपना परिवार बसने के बाद संस्था के संपर्क में रहती हैं, यहां आकर मिलती-जुलती हैं।
इन्हें मिला नया मुकाम
- तिहरी दिव्यांग गुरमीत कौर वासु देख-सुन और बोल नहीं सकती थीं। 5वीं में यहां प्रवेश लिया। 12वीं 58 प्रतिशत के साथ उत्तीर्ण की। गुरमीत ने कमिश्नर टैक्स ग्रुप डी की नौकरी की आर्हता प्राप्त कर ली।
-दिव्यांग बुलबुल पांजरे आनंद सर्विस सोसायटी से पढ़-लिखकर देश की पहली मूक बधिर नर्स बनी हैं, जिनकी वर्तमान में पोस्टिंग हमीदिया अस्पताल भोपाल में है।
- अब तो मध्यप्रदेश में सरकारी नौकरी में दिव्यांगों के भर्ती के आदेश भी हो चुके हैं। ऐसे में यहां की दिव्यांग बालिकाएं और सफलताएं अर्जित करेंगी।
संस्था संचालक के प्रयास
- मोनिका के पति ज्ञानेंद्र ने मूक-बधिर के लिए राष्ट्रगान का पहली बार ट्रांसलेशन (साइन लैंग्वेज) करवाकर प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी से मान्यता दिलवाने का सार्थक प्रयास किया था।
- संस्था संचालक मोनिका पुरोहित को वर्ष 2016 में देश की 100 सबसे प्रभावी महिलाओं में शामिल होने पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सम्मानित किया।
- मोनिका-ज्ञानेंद्र पुरोहित ने वर्ष 2020 में केबीसी के मंच पर कर्मवीर कार्यक्रम के तहत संस्था के लिए 25 लाख की राशि जीती थी। 11 लाख अमिताभ बच्चन ने उसमें योगदान दिया था।
- पाकिस्तान से आई गीता को महाराष्ट्र में परिवार से मिलाने में भी संस्था की भूमिका रही।