भोपाल:राष्ट्रीय संस्थान छात्र संवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि नई पीढ़ी का प्रश्न पूछना भारतीय परंपरा का हिस्सा है। युवाओं के प्रश्नों को सुनने, समझने और संवाद के माध्यम से उत्तर देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि किसी युवा को उसके बाहरी स्वरूप या विचारों के आधार पर देखने के बजाय उसके भीतर की संवेदना और सकारात्मक शक्ति को समझना चाहिए।समाज सेवा न्यास द्वारा आयोजित संवाद में लगभग 250 विद्यार्थी एवं प्राध्यापक शामिल हुए। कार्यक्रम में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले के साथ मध्यभारत प्रांत संघचालक अशोक पांडेय तथा भोपाल विभाग संघचालक सोमकांत उमालकर मंचस्थ रहे।
तकनीक साधन बने, नियंत्रण मानव के हाथ में रहे
डिजिटल युग में संघ के कार्यों और तकनीक के उपयोग से जुड़े प्रश्न पर होसबाले ने कहा कि मूल विचार और मूल्य स्थायी होते हैं, लेकिन समय के साथ उपलब्ध साधनों का उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाए, लेकिन वहां क्या और किस उद्देश्य से प्रसारित किया जा रहा है, यह व्यक्ति के संस्कार और विवेक पर निर्भर करता है।
तकनीक मानवता, राष्ट्र, पर्यावरण और इतिहास के लिए लाभकारी होनी चाहिए तथा मनुष्य तकनीक का गुलाम बनने के बजाय उसे अपने नियंत्रण में रखें। उन्होंने तकनीक के लोकतंत्रीकरण की आवश्यकता बताते हुए कहा कि इसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए। साथ ही तकनीक पर मानवीय नियंत्रण बनाए रखना जरूरी है। यदि यह नियंत्रण समाप्त हो गया तो तकनीक व्यक्ति के लिए साधन रहने के बजाय उसे नियंत्रित करने वाली शक्ति बन सकती है।डिजिटल युग में संघ के कार्यों में बदलाव को लेकर उन्होंने कहा कि मूल विचार और मूल्य अपरिवर्तित रहते हुए तकनीक का उपयोग किया जाना चाहिए। तकनीक मानवता, राष्ट्र, पर्यावरण और इतिहास के लिए लाभकारी होनी चाहिए।
सोशल मीडिया के 'इको चैंबर' के दौर में युवाओं से संवाद जरूरी
सोशल मीडिया और वैचारिक 'इको चैंबर' के दौर में युवाओं से जुड़ने के प्रश्न पर होसबाले ने कहा कि आज पीढ़ियों को 'जेन जी' और 'जेन अल्फा' जैसे नामों से परिभाषित किया जाता है, जबकि स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को 'युवा भारत' कहा था। उन्होंने कहा कि नरेंद्र के रूप में स्वामी विवेकानंद ने भी प्रश्न किए थे और नचिकेता का प्रश्न करना भारतीय परंपरा में प्रसिद्ध है।
प्रश्न करने वाले युवाओं से संवाद होना चाहिए
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी सत्ता, समाज या किसी संस्था से प्रश्न करती है तो उसे गलत नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने स्वयंसेवकों से कहा कि युवाओं के प्रश्नों को सुनना और संवाद में जुड़ना चाहिए। केवल प्रश्न पूछने के कारण किसी को अस्वीकार करने के बजाय उसकी बात समझने का प्रयास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि युवाओं के बाहरी रूप को देखने के बजाय उनके भीतर की संवेदना को देखना चाहिए।
राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद मानसिक स्वतंत्रता भी जरूरी
भारत को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करने के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि देश राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो चुका है, लेकिन 'डिकोलोनाइजेशन ऑफ माइंड' की प्रक्रिया अभी जारी है। भारतीय सभ्यता के मूल्यों, दृष्टि और शब्दावली पर अधिक शोध की आवश्यकता बताते हुए उन्होंने 'धर्म' की अवधारणा का उदाहरण दिया।
उनके अनुसार भारतीय दृष्टि को समझने के लिए इतिहास, पुरातत्व, भाषाविज्ञान और सामाजिक विज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों में अध्ययन आवश्यक है। विद्यार्थियों के बीच वैचारिक वातावरण बदलने के उपाय पर उन्होंने स्वाध्याय मंडल, ग्रुप डिस्कशन और राष्ट्रहित से जुड़ी रचनात्मक गतिविधियां शुरू करने का सुझाव दिया।
उन्होंने बेंगलुरु के विद्यार्थियों के नमो भारती कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए कहा कि छोटी-छोटी गतिविधियों के माध्यम से भी सकारात्मक वातावरण बनाया जा सकता है।कार्यक्रम में विद्यार्थियों और सरकार्यवाह के बीच हुए संवाद में युवा, शिक्षा, संस्कृति, राष्ट्रबोध, तकनीक, भ्रष्टाचार, सामाजिक समरसता और नागरिक दायित्व जैसे विषय प्रमुख रहे। कार्यक्रम का समापन 'वंदे मातरम' के सामूहिक उद्घोष के साथ हुआ।