अनुराग तागड़े, इंदौर। मध्य प्रदेश को नदियों, जलाशयों और वर्षा की प्राकृतिक संपदा प्राप्त है। नर्मदा, चंबल, बेतवा, ताप्ती, सोन और केन जैसी नदियाँ प्रदेश के भूगोल, कृषि और जनजीवन को आकार देती हैं। इसके बावजूद राज्य के कुछ क्षेत्रों में भूजल पर बढ़ता दबाव, शहरों की बढ़ती जल-माँग और खेती की सिंचाई आवश्यकताएँ एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर रही हैं क्या प्राकृतिक जल-संपदा की प्रचुरता अपने आप जल-सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है? उत्तर स्पष्ट है नहीं। पानी की उपलब्धता और उसकी सुरक्षित, न्यायपूर्ण तथा टिकाऊ आपूर्ति के बीच प्रभावी प्रबंधन की निर्णायक भूमिका होती है।
मध्य प्रदेश के सामने चुनौती केवल नए जलस्रोत विकसित करने की नहीं, बल्कि उपलब्ध पानी का विवेकपूर्ण उपयोग करने, वर्षाजल का अधिकतम संरक्षण करने और भूजल के दोहन को उसकी पुनर्भरण क्षमता के अनुरूप बनाने की है। इसके लिए नदी आधारित आपूर्ति को स्थानीय जलस्रोतों के संरक्षण, कृषि में जल-दक्षता, शहरी पुनर्चक्रण और स्पष्ट प्रशासनिक जवाबदेही के साथ जोड़ना होगा। प्रदेश को अब ऐसा जल-सुरक्षा मॉडल चाहिए, जिसमें योजनाओं की सफलता निर्माण कार्यों और बजट खर्च से नहीं, बल्कि सुरक्षित हुए जलस्रोतों और भरोसेमंद पेयजल आपूर्ति से मापी जाए।
भूजल के आँकड़े दे रहे हैं चेतावनी
केंद्रीय भूजल बोर्ड के गतिशील भूजल संसाधन आकलन 2025 के अनुसार, देश में वार्षिक भूजल पुनर्भरण लगभग 448.52 अरब घन मीटर और निष्कर्षण योग्य संसाधन 407.75 अरब घन मीटर आँके गए। वार्षिक भूजल निष्कर्षण लगभग 247.22 अरब घन मीटर रहा, जो निष्कर्षण योग्य संसाधनों का 60.63 प्रतिशत है। देश की 6,762 आकलन इकाइयों में से 730 अतिदोहित श्रेणी में थीं।राष्ट्रीय औसत से पूरे देश की स्थिति नहीं समझी जा सकती, क्योंकि भूजल का पुनर्भरण और दोहन भौगोलिक रूप से असमान है। किसी क्षेत्र में पर्याप्त जल उपलब्ध हो सकता है, जबकि दूसरे क्षेत्र में लगातार दोहन जलस्तर को नीचे धकेल रहा हो। मध्य प्रदेश के लिए भी जिला और विकासखंड स्तर पर वास्तविक स्थिति का आकलन आवश्यक है।केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2025 के आकलन के अनुसार, आगर मालवा जिले में भूजल निष्कर्षण का चरण 2023 के 89.94 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 92.79 प्रतिशत हो गया। भोपाल में भी यह 78.30 प्रतिशत से बढ़कर 81.78 प्रतिशत दर्ज किया गया। ये आँकड़े स्थानीय स्तर पर नियमित निगरानी, जल-बजट और वैज्ञानिक नियोजन की आवश्यकता रेखांकित करते हैं।
नर्मदा: जीवनरेखा, लेकिन अकेला समाधान नहीं
नर्मदा मध्य प्रदेश की जीवनरेखाओं में से एक है। पेयजल, सिंचाई और विभिन्न विकास आवश्यकताओं की पूर्ति में इसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है। लेकिन किसी नदी से पानी उपलब्ध होने का अर्थ यह नहीं कि उस पर निर्भर प्रत्येक क्षेत्र की जल-सुरक्षा सुनिश्चित हो गई। पानी को दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँचाने के लिए बुनियादी ढाँचा, ऊर्जा, रखरखाव और वितरण व्यवस्था चाहिए। नदी पर बढ़ती माँग के साथ पर्यावरणीय प्रवाह और पारिस्थितिकी की रक्षा भी आवश्यक है।इसलिए नर्मदा आधारित जलापूर्ति को स्थानीय जलस्रोतों के संरक्षण का विकल्प नहीं बनाया जाना चाहिए। यदि किसी शहर को नदी से पानी मिलता है, तो भी उसे अपने तालाबों, वर्षाजल संचयन, भूजल पुनर्भरण और सीवेज शोधन की जिम्मेदारी निभानी होगी। इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के साथ खेतों में नमी संरक्षण और स्थानीय जलग्रहण क्षेत्रों के पुनर्जीवन को प्राथमिकता देनी होगी।
प्रदेश के लिए एक महत्त्वपूर्ण कदम नर्मदा सहित प्रमुख नदी घाटियों और स्थानीय भूजल संसाधनों की समन्वित योजना तैयार करना है। इसमें पेयजल की आवश्यकता, सिंचाई, औद्योगिक उपयोग, उपलब्ध संसाधन और पर्यावरणीय जरूरतों का आकलन किया जाए। इससे यह निर्धारित करने में मदद मिलेगी कि कहाँ अतिरिक्त आपूर्ति आवश्यक है और कहाँ उपलब्ध जल का अधिक दक्ष उपयोग संभव है।
मालवा के लिए अलग जल-रणनीति
मालवा की जल-चुनौतियाँ मध्य प्रदेश की जल नीति के केंद्र में होनी चाहिए। इंदौर, उज्जैन, देवास, धार और आगर मालवा जैसे क्षेत्रों में कृषि, उद्योग, शहरी विस्तार और घरेलू खपत की आवश्यकताएँ अलग-अलग हैं। इन क्षेत्रों की भूगर्भीय संरचना और भूजल की स्थिति भी समान नहीं है। इसलिए एक जैसी नीति सभी जिलों पर लागू करना पर्याप्त नहीं होगा।इंदौर जैसे तेजी से विकसित होते शहर के लिए विश्वसनीय जलापूर्ति के साथ वितरण में होने वाले नुकसान को कम करना आवश्यक है। उज्जैन और देवास जैसे शहरी तथा औद्योगिक केंद्रों में भी भविष्य की जल-माँग, स्थानीय जलस्रोतों और उपचारित जल के उपयोग का संयुक्त आकलन किया जाना चाहिए।
मालवा के लिए तीन कदम निर्णायक हो सकते हैं।
पहला: जल-संकटग्रस्त विकासखंडों का सार्वजनिक जल-बजट तैयार किया जाए। इसमें वर्षा, भूजल स्तर, सिंचाई, पेयजल की माँग और पुनर्भरण की संभावनाएँ शामिल हों।
दूसरा: स्थानीय तालाबों, कुओं, बावड़ियों और जलग्रहण क्षेत्रों का वैज्ञानिक पुनर्जीवन किया जाए। केवल संरचनाएँ बनाना पर्याप्त नहीं होगा; उनके जलागम क्षेत्र सुरक्षित रखने, अतिक्रमण रोकने और नियमित रखरखाव की व्यवस्था भी जरूरी है।
तीसरा: भूजल के अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप वैज्ञानिक नियमन लागू किया जाए। नए नलकूपों और अतिरिक्त निष्कर्षण के संबंध में निर्णय जलभृत की स्थिति के आधार पर हों। इसका उद्देश्य किसानों की आजीविका बाधित करना नहीं, बल्कि भूजल को दीर्घकाल तक उपलब्ध बनाए रखना है।
खेती में पानी बचाने के साथ किसान की आय भी सुरक्षित हो
मध्य प्रदेश की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए जल संरक्षण की कोई भी नीति किसानों की आर्थिक सुरक्षा को केंद्र में रखे बिना सफल नहीं हो सकती। कम जल-माँग वाली फसलों को प्रोत्साहित करने के लिए केवल सलाह पर्याप्त नहीं है। बाजार, खरीद, प्रसंस्करण और बीमा की व्यवस्थाएँ भी उसके अनुरूप होनी चाहिए।जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में दालों, तिलहनों और मोटे अनाज की खेती को स्थानीय मिट्टी, जलवायु और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार बढ़ावा दिया जा सकता है। ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, खेतों में नमी संरक्षण तथा सिंचाई के उचित समय-निर्धारण से भी जल-दक्षता बढ़ाई जा सकती है।इसके लिए कृषि विभाग और जल संसाधन विभाग संयुक्त रूप से उन क्षेत्रों की पहचान करें जहाँ फसल विविधीकरण से भूजल पर दबाव घटाने की संभावना है। किसानों को तकनीकी सहायता, वित्तीय प्रोत्साहन और विपणन सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ। जल संरक्षण को किसान के लिए आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि दीर्घकालिक लाभ का माध्यम बनाना होगा।
शहरों का जल लेखा-परीक्षण अनिवार्य हो
शहरीकरण के साथ पेयजल की माँग बढ़ रही है। दूसरी ओर, पाइपलाइन में रिसाव, अपर्याप्त सीवेज शोधन और उपचारित जल के सीमित पुनः उपयोग से मीठे पानी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 2021 के आकलन में शहरी भारत में प्रतिदिन लगभग 72,368 मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होने का अनुमान था। यह ऐतिहासिक आँकड़ा है, वर्तमान स्थिति का प्रत्यक्ष माप नहीं, लेकिन शहरी जल प्रबंधन की चुनौती का पैमाना स्पष्ट करता है।मध्य प्रदेश के प्रमुख नगर निकायों को प्रत्येक वर्ष सार्वजनिक जल लेखा-परीक्षण प्रस्तुत करना चाहिए। इसमें स्रोत से प्राप्त पानी, उपभोक्ताओं तक पहुँची मात्रा, वितरण में रिसाव, सीवेज शोधन और उपचारित जल के पुनः उपयोग का विवरण हो। पाइपलाइन के रिसाव की पहचान और मरम्मत के लिए समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित किए जाएँ।उपचारित सीवेज का निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप उपयोग उद्यानों, निर्माण कार्यों और उपयुक्त औद्योगिक गतिविधियों में बढ़ाया जा सकता है। इससे मीठे पानी की माँग घटेगी और अपशिष्ट जल का बेहतर उपयोग संभव होगा। नए बड़े आवासीय और औद्योगिक परिसरों में जल-मापन, वर्षाजल संचयन तथा जहाँ व्यावहारिक हो, उपचारित जल के पुनः उपयोग की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।साथ ही, शहरों के तालाबों, आर्द्रभूमियों और प्राकृतिक जल-निकासी मार्गों को अतिक्रमण से बचाना होगा। जलाशयों का सौंदर्यीकरण तभी सार्थक है, जब उनके प्राकृतिक आगम क्षेत्र सुरक्षित हों और वे जल प्रबंधन में प्रभावी भूमिका निभाते रहें।
पहले 100 दिन से पाँच वर्ष तक की कार्ययोजना
जल-सुरक्षा को प्रभावी बनाने के लिए मध्य प्रदेश में समयबद्ध कार्ययोजना लागू की जानी चाहिए। यह प्रस्तावित कार्ययोजना है, न कि सरकार द्वारा घोषित कार्यक्रम-
पहले 100 दिन: जल-संकट का वास्तविक मानचित्र। जल संसाधन विभाग, भूजल संबंधी एजेंसियाँ, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग और जिला प्रशासन मिलकर प्राथमिकता वाले जिलों, विकासखंडों और शहरी क्षेत्रों की पहचान करें। भूजल स्तर, पेयजल उपलब्धता, जल गुणवत्ता और सिंचाई की माँग का आधारभूत आकलन किया जाए। प्रत्येक जिले में नोडल अधिकारी नामित हो और उपलब्ध आँकड़े सार्वजनिक किए जाएँ।
छह महीने के भीतर: स्थानीय जल-बजट और परियोजनाएँ। जिला कलेक्टरों के समन्वय में ग्राम पंचायतें, जनपद पंचायतें और नगर निकाय अपने क्षेत्र का जल-बजट तैयार करें। पुराने तालाबों, बावड़ियों, कुओं और जलग्रहण क्षेत्रों की सूची बनाई जाए। प्रत्येक प्राथमिकता वाले क्षेत्र के लिए कार्यों की लागत, जिम्मेदार संस्था और समयसीमा निर्धारित हो।
एक वर्ष के भीतर: खेत और शहर में मापने योग्य सुधार। कृषि विभाग जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में फसल विविधीकरण और सिंचाई दक्षता के कार्यक्रम लागू करे। नगरीय प्रशासन विभाग प्रमुख शहरों में जल लेखा-परीक्षण, रिसाव नियंत्रण और सीवेज पुनः उपयोग की कार्ययोजना तैयार करे। वर्षाजल संचयन की संरचनाओं का रखरखाव सुनिश्चित किया जाए।
तीन से पाँच वर्ष: परिणाम आधारित जल-सुरक्षा। प्रदेश के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में भूजल की प्रवृत्ति, सुरक्षित पेयजल आपूर्ति, जल गुणवत्ता और उपचारित जल के पुनः उपयोग की नियमित समीक्षा हो। जहाँ योजनाएँ सफल हों, वहाँ उनके विस्तार की व्यवस्था की जाए। जहाँ लक्ष्य पूरे न हों, वहाँ कारणों की समीक्षा कर सुधारात्मक कदम उठाए जाएँ।
जिम्मेदारी स्पष्ट हो, जवाबदेही सार्वजनिक
इस कार्ययोजना में जल संसाधन विभाग की जिम्मेदारी नदी घाटियों, जलाशयों और सिंचाई व्यवस्था के समन्वय की होनी चाहिए। भूजल संबंधी एजेंसियाँ जलभृतों की निगरानी और वैज्ञानिक सलाह दें। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ग्रामीण पेयजल आपूर्ति और जल गुणवत्ता पर ध्यान दे। कृषि एवं उद्यानिकी विभाग जल-संवेदनशील खेती को बढ़ावा दें। नगरीय प्रशासन विभाग और नगर निकाय शहरी जलापूर्ति, रिसाव नियंत्रण, सीवेज शोधन तथा तालाबों के संरक्षण के लिए उत्तरदायी हों। जिला प्रशासन और पंचायतें स्थानीय योजनाओं का समन्वय तथा निगरानी करें।हर वर्ष प्रदेश की जल-सुरक्षा प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। इसमें केवल खर्च हुई राशि, स्वीकृत परियोजनाओं और निर्मित संरचनाओं का विवरण न हो, बल्कि यह भी बताया जाए कि भूजल की स्थिति कहाँ सुधरी, कितने क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध हुआ, जल गुणवत्ता में क्या बदलाव आया और कौन-से लक्ष्य पूरे नहीं हुए।केंद्र सरकार की अटल भूजल योजना ने सहभागी भूजल प्रबंधन और ग्राम पंचायत स्तर की जल-सुरक्षा योजनाओं को महत्त्व दिया है। मध्य प्रदेश भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप इसी प्रकार की सहभागी व्यवस्था को मजबूत कर सकता है। हालाँकि, सामुदायिक भागीदारी का अर्थ सरकारी जिम्मेदारी से पीछे हटना नहीं है। सरकार को वित्त, तकनीकी सहायता, नियमन और बुनियादी पेयजल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी निभानी होगी।
जल संरक्षण नहीं, जल-सुरक्षा का संकल्प
मध्य प्रदेश के पास नदियों, जलाशयों और पारंपरिक जल संरचनाओं का महत्त्वपूर्ण आधार है। चुनौती इस संपदा को सुरक्षित रखते हुए बढ़ती आबादी, कृषि और उद्योग की जरूरतों में संतुलन स्थापित करने की है। नर्मदा प्रदेश की जीवनरेखा है, लेकिन दीर्घकालीन जल-सुरक्षा स्थानीय जलचक्र को मजबूत बनाए बिना संभव नहीं है।प्रदेश को अब ऐसा मॉडल विकसित करना होगा जिसमें नदी से मिलने वाला पानी, धरती के भीतर का जल, वर्षा की प्रत्येक बूँद और शहरों से निकलने वाला शोधित जल एक समन्वित व्यवस्था का हिस्सा बनें। जल-सुरक्षा को केवल सरकारी योजना या मौसमी अभियान तक सीमित रखने के बजाय विकास नीति का स्थायी आधार बनाया जाए।
मध्य प्रदेश की असली जल-समृद्धि नदियों की संख्या या जलाशयों की क्षमता से ही नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि उसके गाँवों में कुएँ कितने टिकाऊ हैं, खेतों में पानी कितनी दक्षता से उपयोग होता है और शहरों में नागरिकों को कितना भरोसेमंद पेयजल मिलता है। जल संरक्षण का मूल्यांकन नारों, बजट और निर्माण कार्यों से नहीं, सुरक्षित हुए जलस्रोतों, किसानों की टिकाऊ आजीविका और भविष्य की पीढ़ियों के लिए बचाए गए पानी से होना चाहिए। यही प्रदेश के नए जल-सामाजिक अनुबंध की असली कसौटी है।