अनुराग तागड़े, इंदौर। भारत की संत परंपरा केवल अतीत की स्मृतियों का संग्रह नहीं है। यह ऐसी जीवंत धारा है, जो समय की अनेक करवटों के बावजूद समाज के भीतर बहती रहती है। संत ज्ञानेश्वर महाराज इसी अखंड परंपरा के ऐसे प्रकाशस्तंभ हैं, जिनकी ज्योति सात शताब्दियां बीत जाने के बाद भी उतनी ही उज्ज्वल दिखाई देती है। उनका जीवन भले ही मात्र 21 वर्षों का रहा। लेकिन उनकी विचार-यात्रा इतनी विराट थी कि आज भी महाराष्ट्र की धरती उन्हें केवल संत नहीं, ‘माऊली’ मां के आत्मीय संबोधन से पुकारती है।
लोकभाषा में गीत का दर्शन
करीब 1275 ईस्वी के आसपास जन्मे ज्ञानेश्वर ने अत्यंत कम आयु में भारतीय दर्शन को लोकजीवन से जोड़ने का कार्य किया, वह अपने समय से बहुत आगे था। भगवद्गीता के गहन दर्शन को मराठी लोकभाषा में सहज काव्यात्मक रूप देने वाली ‘ज्ञानेश्वरी’ ने ज्ञान को केवल विद्वानों की सीमा में रहने नहीं दिया। लगभग नौ हजार ओवियों में व्यक्त यह कृति दर्शन, अध्यात्म और लोकानुभव के बीच ऐसा सेतु बनी, जिसकी प्रासंगिकता आज भी समाप्त नहीं हुई।
संत ज्ञानेश्वर की 750वीं जन्मजयंती के उपलक्ष्य में महाराष्ट्र में वर्षों से विभिन्न सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और शैक्षिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। महाराष्ट्र के राजभवन ने 2024 में 750वीं जयंती समारोह का बोधचिह्न जारी किया था। 2025 में राज्य के विद्यालयों में ‘पसायदान’ के सामूहिक पाठ जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। 2026 में भी इस स्मृति को केंद्र में रखकर अनेक आयोजन जारी हैं। यानी सात सौ पचास वर्ष पुरानी संत-वाणी को आज के समाज में फिर से सुनाने का प्रयास निरंतर चल रहा है।
ज्ञानेश्वर की सबसे बड़ी शक्ति यह थी कि उन्होंने ज्ञान को जीवन से अलग नहीं माना। उनके लिए दर्शन कोई कठिन शास्त्रीय विमर्श नहीं था, जो केवल मठों, आश्रमों या विद्वानों की चर्चाओं तक सीमित रहे। वह खेत में काम करने वाले किसान का भी प्रश्न था, यात्रा करते वारकरी का भी, गृहस्थ के जीवन का भी और उस युवा मन का भी जो अपने अस्तित्व का अर्थ तलाश रहा हो। यही कारण है कि ज्ञानेश्वरी आज भी केवल पढ़ी नहीं जाती, जी जाती है।आज मनुष्य के पास सूचना के साधन पहले से कहीं अधिक हैं।
एक मोबाइल फोन में पूरी दुनिया समा गई है। कुछ क्षणों में कोई भी तथ्य हमारे सामने आ सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारी सहायता कर सकती है, मशीनें हमारी गणना कर सकती हैं, डिजिटल तकनीक हमारी स्मरणशक्ति का विस्तार कर सकती है। लेकिन एक मूल प्रश्न अब भी मनुष्य के सामने खड़ा है क्या अधिक सूचना हमें अधिक विवेकी भी बना रही है? ज्ञानेश्वर का उत्तर शायद इसी अंतर को समझने में सहायता देता है। सूचना बाहर से आती है, ज्ञान भीतर को प्रकाशित करता है और विवेक यह तय करता है कि उस ज्ञान का उपयोग किस दिशा में किया जाए।यही बात आज की युवा पीढ़ी पर भी लागू होती है। आज का युवा अभूतपूर्व अवसरों के बीच खड़ा है। उसके पास वैश्विक शिक्षा, डिजिटल मंच, उद्यमिता, तकनीक और अपनी प्रतिभा को दुनिया तक पहुंचाने के अनगिनत अवसर हैं। लेकिन इसी के साथ तुलना, प्रतिस्पर्धा, त्वरित सफलता का दबाव, सामाजिक स्वीकृति की बेचैनी और डिजिटल जीवन की लगातार भागदौड़ भी है। दुनिया से जुड़ते-जुड़ते कई बार युवा स्वयं से दूर होता जा रहा है।
ज्ञानेश्वर का चिंतन उसे बाहर की यात्रा के साथ भीतर की यात्रा का भी स्मरण कराता है।
उनकी दृष्टि संसार से पलायन की नहीं, संसार के बीच आत्मबोध की है। कर्म से भागना नहीं, कर्म को समझना है। सफलता को अस्वीकार करना नहीं, उसे अहंकार से मुक्त करना है। ज्ञान को संग्रहित करना नहीं, उसे आचरण में उतारना है। यही गीता का संदेश ज्ञानेश्वर की वाणी में लोकभाषा का स्पर्श पाकर करोड़ों लोगों तक पहुंचा।ज्ञानेश्वर की दृष्टि का सबसे सुंदर विस्तार ‘पसायदान’ में दिखाई देता है। ज्ञानेश्वरी के अंत में उनकी प्रार्थना केवल व्यक्तिगत मुक्ति की नहीं है। वहां समष्टि का मंगल है, सद्भाव की कामना है, मनुष्यता के कल्याण का भाव है। यही ‘माऊली’ का सबसे बड़ा परिचय है जिसने अपने अल्प जीवन में भी अपनी चिंता से अधिक संसार की चिंता की।
आज जब समाज में असहमति कई बार कटुता में बदल जाती है, जब सफलता का अर्थ केवल व्यक्तिगत उपलब्धि मान लिया जाता है और जब व्यक्ति की दुनिया ‘मैं’ के चारों ओर सीमित होती जा रही है, तब पसायदान की लोकमंगल दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक लगती है। ज्ञान का अंतिम पड़ाव यदि करुणा और सेवा तक नहीं पहुंचता, तो वह अधूरा है ज्ञानेश्वर की परंपरा हमें यही स्मरण कराती है।ज्ञानेश्वर की प्रासंगिकता किसी पुस्तकालय तक सीमित नहीं है। वह आळंदी से पंढरपुर तक चलती वारी में दिखाई देती है। महाराष्ट्र पर्यटन विभाग के अनुसार आषाढ़ी एकादशी के अवसर पर आळंदी से संत ज्ञानेश्वर की पालखी निकलती है और हजारों वारकरी उसके साथ पंढरपुर की ओर यात्रा करते हैं। अभंग, टाळ, मृदंग और सामूहिक पदयात्रा से निर्मित यह परंपरा बताती है कि कोई विचार तब सबसे अधिक जीवित रहता है, जब वह समाज की जीवनशैली में उतर जाता है।
इसी निरंतरता का आधुनिक उदाहरण मुंबई में सामने आया। ‘ज्ञानरंग : माऊलींच्या ओव्यांचा उत्सव’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने ‘ज्ञानरंग : ज्ञानेश्वरी’ मोबाइल ऐप का लोकार्पण किया। उन्होंने कहा कि ज्ञानेश्वरी हमें दुनिया को देखने और जीवन को समझने का ज्ञान देती है। उनके अनुसार समय और परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन इस ज्ञान का मूल तत्व और उससे निर्मित संस्कृति बनी रहती है। उन्होंने ज्ञानेश्वरी को अतीत, वर्तमान और भविष्य के लिए दिशादर्शक बताते हुए उसकी कम से कम एक ओवी को अपने जीवन में अनुभव करने का आग्रह भी किया।यह प्रसंग अपने आप में बहुत अर्थपूर्ण है।
सात सौ पचास वर्ष पहले ज्ञानेश्वर ने अपने समय की लोकभाषा को माध्यम बनाया था। आज उनकी वाणी नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए मोबाइल ऐप जैसी आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। अर्थात साधन बदल गया है, माध्यम बदल गया है, लेकिन प्रश्न वही है ज्ञान को जीवन तक कैसे पहुंचाया जाए?कृत्रिम बुद्धिमत्ता और विज्ञान के तीव्र विकास के बीच यह प्रश्न और गहरा हो जाता है। मशीनें आज बहुत कुछ कर सकती हैं, लेकिन मनुष्य को यह तय करना ही होगा कि वह उस शक्ति का उपयोग किसलिए करेगा। विज्ञान शक्ति देता है, तकनीक गति देती है, लेकिन दिशा कौन देगा? यहां भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता सामने आती है। डॉ. भागवत ने भी अपने हालिया संबोधन में आधुनिक विज्ञान और भारतीय ज्ञान परंपरा के बीच संवाद की आवश्यकता पर बल दिया तथा ज्ञानेश्वरी की शिक्षाओं को जीवन में उतारने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की बात कही।ज्ञानेश्वर को इसलिए केवल मध्यकालीन संत कहकर देखना उनके महत्व को सीमित करना होगा। वे एक युवा संत थे, जिन्होंने असाधारण बौद्धिक ऊर्जा, आध्यात्मिक गहराई और सृजनात्मक प्रतिभा के साथ अपने समय को संबोधित किया। आज की युवा पीढ़ी उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण संदेश देख सकती है आयु छोटी हो सकती है, लेकिन विचार छोटे नहीं होने चाहिए; साधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन दृष्टि सीमित नहीं होनी चाहिए।750वीं जयंती का वास्तविक अर्थ भी शायद यही है कि हम ज्ञानेश्वर को केवल स्मरण न करें, उन्हें पढ़ें; केवल उद्धृत न करें, उन्हें समझें; केवल उनकी तस्वीर के सामने दीप न जलाएं, उनके विचारों की लौ अपने जीवन में जलाएं।सात सौ पचास वर्ष बाद भी आळंदी की धरती से उठती ‘माऊली’ की पुकार इसलिए सुनाई देती है, क्योंकि उन्होंने मनुष्य के भीतर के उन प्रश्नों को छुआ था, जो किसी युग के साथ समाप्त नहीं होते। जीवन क्या है? ज्ञान किसलिए है? सफलता के बाद भी मनुष्य क्यों अधूरा महसूस करता है? और अंततः, हमारी साधना का अर्थ केवल हमारा अपना उत्थान है या किसी दूसरे के जीवन में भी प्रकाश पहुंचाना?शायद आज के समय में ज्ञानेश्वर की सबसे बड़ी प्रासंगिकता इसी आखिरी प्रश्न में छिपी है।हमने दुनिया को समझने के लिए असंख्य साधन बना लिए हैं, लेकिन स्वयं को समझने की यात्रा अभी बाकी है।माऊली की वाणी आज भी हमें उसी यात्रा पर बुलाती है।सात शताब्दियां बीत गईं, पर उनकी आवाज पुरानी नहीं हुई। वह आज भी वारी के कदमों में है, अभंग की धुन में है, ज्ञानेश्वरी की ओवी में है और अब एक मोबाइल स्क्रीन पर भी है। माध्यम बदलते रहे, पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन संदेश वही रहा ज्ञान अहंकार न बने, ज्ञान करुणा बने; सफलता केवल अपने लिए न हो, वह समाज के लिए भी सार्थक बने; और जीवन केवल उपलब्धियों का हिसाब न हो, वह लोकमंगल की एक सुंदर यात्रा बने।शायद इसी में ‘माऊली’ की अमरता है।
उनका जीवन केवल इक्कीस वर्षों का था, लेकिन उनकी ज्योति ने सात सौ पचास वर्षों की यात्रा तय कर ली है और आज भी वह हमारे भीतर वही प्रश्न जगा रही है : दुनिया जीतने से पहले, क्या हमने अपने भीतर के मनुष्य को जीत लिया है?