अमन शुक्ला,सतना: देवा हो देवा गणपति देवा तुमसे बढ़कर कौन स्वामी तुमसे बढ़कर कौन... इस सत्य की भक्ति से अभिभूत हैं जिले के शिवेंद्र सिंह गौरी नंदन की अटूट भक्ति में लीन रहने वाले परिवहन विभाग में सहायक ग्रेड 2 पर पदस्थ थे, जो कि 2 वर्ष पहले सेवा निवृत्त हुए हैं। जब वे सरकारी कर्मचारी थे उसके बावजूद प्रथम पूज्य गणेश के प्रति उनकी अपार श्रद्धा का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि वह अपनी नौकरी के साथ-साथ पूरे साल यानी 365 दिन गणेश प्रतिमा गढ़ने का काम निरंतर करते रहते थे। हालाकि सेवा निवृत्त होने के बाद अब वह पूरा दिन गणेश प्रतिमा को गढ़ने में समय देते हैं।
बचपन से परिवार में गणेश पूजा का कल्चर
शिवेंद्र सिंह की माने तो वह बचपन से ही परिवार में गणेश पूजा को देखते थे। इसके बाद रिद्धि सिद्ध के दाता की भक्ति में वह ऐसा रमे कि आज तक वह उनसे बाहर आने के बारे में सपने में भी नहीं सोच पाये। प्रतिदिन पूजा-अर्चना करने के साथ-साथ वह अपने हाथों से प्रतिमा गढ़ने का कार्य भी निर्बाध गति से करते चले आ रहे हैं।
बाजार में नहीं करते विक्रय
शिवेंद्र सिंह परिहार का मानना है कि ऐसा करने से उन्हें तनाव से मुक्ति तो मिलती है, इसके साथ मन को भी अपार शांति मिलती है। गजानन के प्रति उनकी आस्था और भक्ति का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अभी तक वह करीब 82गणेश प्रतिमाएं गढ़ चुके हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह इन प्रतिमाओं को बाजार में बेचते नहीं है।
मिट्टी की नहीं, लकड़ियों के गजानन
शिवेंद्र गणेश प्रतिमाएं मिट्टी की नहीं बनाते, उनका तरीका बिल्कुल अलग है। वह खाली समय में पेड़ों की लकड़ियों से गणेश जी की अद्भुत प्रतिमाएं बनाते हैं। वैसे तो हर इंसान के अंदर कोई ना कोई शौक या कला जरूर होती है। अगर यह कला भक्ति के साथ जुड़ जाए तो उसका भाव ही बदल जाता है। उनका मानना है कि मानसिक तनाव और विभिन्न प्रकार की बाधाओं को दूर करने के लिए उनका शौक ही सबसे बेहतर माध्यम है।
कैसे हुई आस्था एवं शौक की शुरुआत
उन्होने बताया कि वर्ष 2005 में उन्हें कार्यों का भार और परिवारिक तनाव बहुत था, ऐसे में वह भगवान गणेश को याद कर उनसे प्रार्थना करते थे। एक दिन उन्हें किसी कार्यक्रम में जाते समय गाड़ी के आगे लगे गणेश जी के स्टीकर को देखकर विचार आया कि हम इसे बना सकते हैं। उन्होंने लौटकर घर में रखे औजार पेंचकश, रेतमार, कागज, चाकू और कुछ नुकीली चीजों से उस स्टिकर के आकार की गणेश प्रतिमा को बनाना शुरु कर दिया। एक बार नहीं कई बार या यूं कहें लगातार वह प्रयास करते रहे। वह तब तक लगे रहे जब तक गणेश प्रतिमा को सही आकार नहीं मिला। उनका यह जूनून शौक और फिर आस्था में बदल गया। वह अपने घर पर ही विभिन्न प्रकार के औजारों से आम, नीम, कदम, चंदन, सफेद मदार सहित अन्य पेड़ों की लकड़ियों से करीब 82 से अधिक प्रतिमाएं अभी तक बना चुके हैं।
घर के चारों कोनो में गजानन
वह मूर्तियों को बेचने का काम नहीं करते, अपने घर के चारों कोने में गणेश प्रतिमाओं को सजा कर रखा है। जब उनका मन कहता है तो वह अपनी प्रतिमाएं को इच्छानुसार लोगो को दान में दे देते हैं। वह अभी तक सबसे बड़ी सात फीट की गणेश प्रतिमा बना चुके है।
इनका कहना है...
परिवहन विभाग से सेवा निवृत्त शिवेन्द्र सिंह परिहार का कहना है कि समाज में लोगों को यह संदेश देना चाहता हूं कि व्यक्ति को अपने अंदर की कला को पहचानकर उससे रूबरू जरूर होना चाहिए। ताकि व्यक्ति अपने कार्य को शौक के जैसे पूरा कर तनाव मुक्त रह सके। अब तक मै लकड़ियों की लगभग 82 प्रतिमाओं को बनाने का कार्य कर चुका हूं।