ओमप्रकाश श्रीवास्तव
पूर्व लेख में हम देख चुके हैं कि यज्ञ का अर्थ 'अग्नि में आहुति डालकर किए जाने वाले हवन' के अलावा 'निष्काम भाव से कर्तव्य पालन करना' भी है। जो विद्वान यज्ञ का अर्थ अग्नि में आहुति देने से लेते हैं, वे सरल व्याख्या करते हैं कि आहुति धूम्र के माध्यम से सूर्य मंडल में जाती है और मेघ बनती है। इसी मेघ से वर्षा होती है। यज्ञ के धूम्र से वर्षा होना तार्किक दृष्टि से स्वीकार नहीं होता। यदि ऐसा होता, तो यज्ञ न करने वाली विदेशी धरती पर वर्षा कैसे होती? परंतु जब भाव के स्तर पर विचार करें, तो हम पाते हैं कि प्रकृति जड़ है और अपने नियम से धूप-छाँव, वर्षा-सूखा तथा ठंड-गर्मी सब देती है। परंतु इस जड़ के भीतर हर क्रिया का नियामक देव है। गीता में भगवान ने कहा है कि सृष्टि को संचालित करने वाली समस्त शक्तियाँ, जिन्हें हम देव कहते हैं, परमात्मा के ही अंश हैं। इन देवों को यज्ञ द्वारा आहुति देकर, उनकी स्तुति करके उन्हें प्रसन्न कर हम उनकी कृपा प्राप्त करते हैं। उनकी प्रसन्नता से प्राकृतिक क्रियाएँ भी हमारे अनुकूल हो जाती हैं। वर्षा के देवता इंद्र यज्ञ से प्रसन्न होकर यथोचित वर्षा में सहयोग देते हैं। यही यज्ञ से वर्षा होने का तात्पर्य है।
जब हम बाह्य प्रकृति, जिसमें जंगल, नदियाँ, पर्वत, पशु-पक्षी और मनुष्य सभी शामिल हैं, के साथ यज्ञ-भावना से रहते हैं और उनका संरक्षण करते हैं, तब वातावरण संतुलित रहता है तथा मौसम चक्र सुव्यवस्थित होता है। वातावरण के प्रति यह यज्ञ-भावना ही उपयुक्त वर्षा के लिए आवश्यक होती है। जब सभी मनुष्य अपने कर्तव्य कर्मों का पालन करेंगे, तो देवता भी अपने कर्तव्य कर्मों का पालन करने के लिए बाध्य हो जाते हैं। पर्जन्य का शाब्दिक अर्थ वर्षा है, परंतु जब इसके भाव को लेते हैं, तो ज्ञात होता है कि वह 'अनुकूल परिस्थितियाँ' हैं, जिनमें पृथ्वी के तत्त्वों का पोषण योग्य अन्न में रूपांतरण होता है। ऐसी परिस्थितियाँ लोगों के निःस्वार्थ सेवा-भाव से किए गए कार्यों से ही संभव हैं।
यज्ञ करना कर्म है, परंतु हर कर्म यज्ञ नहीं है। जो कर्तव्य कर्म निष्काम भाव से, परहित के लिए किए जाते हैं, वही यज्ञ बनते हैं। यदि निष्काम भाव से शिक्षक विद्यार्थियों को पढ़ाए, डॉक्टर रोगियों की चिकित्सा करे, कृषक खेती करे, व्यापारी व्यापार करे और सैनिक युद्ध करे, तो पढ़ाना, चिकित्सा, कृषि, व्यापार तथा युद्ध आदि कर्म यज्ञ हो जाएँगे। दूसरे शब्दों में, मनुष्य अपने कर्म करने के अहंकार और कर्मफल की आसक्ति को स्वाहा कर दे, तो वह कर्म भी यज्ञ बन जाएगा। हम हर क्षण कर्म तो करते ही हैं, बस उन कर्मों का स्वरूप बदलकर उन्हें यज्ञ बना देना है। यही कर्म से यज्ञ की उत्पत्ति का तात्पर्य है।
इन श्लोकों में कर्म का उद्गम ब्रह्म बताया गया है। गीता में ही कई स्थानों पर ब्रह्म शब्द का प्रयोग वेद, ब्रह्मा और प्रकृति—तीनों के पर्याय के रूप में किया गया है। इसलिए पहली व्याख्या यह है कि यज्ञ भी कर्म है और कर्म (कर्तव्य कर्म तथा यज्ञ करने की विधि, दोनों ही) का विधान वेदों और वेदानुकूल शास्त्रों में किया गया है। वेद केवल ग्रंथ नहीं हैं। यदि उन्हें केवल ग्रंथ मानें, तो जहाँ वेदाध्ययन नहीं होता, वहाँ कर्म नहीं होते क्या? वास्तव में वेद का अर्थ है 'ज्ञान'। वेद ब्रह्मा को प्राप्त हुए हैं, इसलिए यज्ञ को कर्म से और कर्म को ब्रह्मा अथवा वेद से उत्पन्न माना गया है। यदि ब्रह्म का अर्थ प्रकृति लें, तो भी संगति बैठ जाती है, क्योंकि सभी कर्म प्रकृति के स्वभाव अर्थात् सत्त्व, रज और तम नामक तीन गुणों से उत्पन्न होते हैं। शरीर भी प्रकृति का अंग है। प्रकृति निरंतर क्रियाशील रहती है, इसलिए शरीर से भी निरंतर कर्म होते रहते हैं। मनुष्य के पास बुद्धि-विवेक है, अतः उसके पास यह स्वतंत्रता है कि वह चाहे तो अपने कर्मों को यज्ञ में परिवर्तित कर सके और चाहे तो नहीं भी।
परब्रह्म विश्व में दो रूपों में व्यक्त होता है—अक्षर और क्षर। परब्रह्म की निर्गुण, शांत और सम स्थिति को उसका अक्षर तत्त्व कहते हैं। दूसरी ओर, परब्रह्म की वह स्थिति, जिसमें वह अपने आपको प्रकृति के गुणों और क्रियाओं के रूप में व्यक्त करता है, क्षर (प्रकृतिस्थ पुरुष) कहलाती है। इस प्रकार प्रकृति के समस्त कर्मों का आधार प्रकृतिस्थ पुरुष है। वह अक्षर तत्त्व ज्ञान का स्रोत ही नहीं, अपितु स्वयं ज्ञानस्वरूप है। अक्षर तत्त्व (अक्षर पुरुष) से निःश्वास-प्रश्वास के रूप में (जैसे श्वास-प्रश्वास स्वतः चलती है, उसके लिए बुद्धि का प्रयोग नहीं करना पड़ता, उसी प्रकार बुद्धि से परे अस्तित्व से स्वतः) वेद प्रकट हुए हैं, जो उसने स्वयं ब्रह्मा को दिए हैं। इसीलिए वेद अपौरुषेय हैं, अर्थात् किसी ने उन्हें बनाया नहीं है। यही अक्षर से वेद की उत्पत्ति का तात्पर्य है।
परमात्मा कण-कण में विराजमान है, परंतु वह विभूतियों में विशेष रूप से दृष्टव्य होता है। हर कर्म के पीछे परमात्मा की शक्ति है। यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है, अतः उसमें परमात्मा की प्रतिष्ठा स्पष्टतः दृष्टव्य है। इस प्रकार परमात्मा के यज्ञ में प्रतिष्ठित होने की व्याख्या की जाती है। जहाँ निष्काम भाव से कर्तव्य कर्म होते हैं, अर्थात् यज्ञ होता है, वहाँ परमात्मा का निवास होता है। मानव योनि में हमें यह अवसर मिला है कि हम अपने कर्तव्य कर्मों को यज्ञ-भाव से संचालित कर, यज्ञचक्र का अंग बनकर, परमात्मा से जुड़कर अपना उद्धार कर सकते हैं। यहाँ अर्जुन के लिए भगवान का संकेत है कि वह प्राप्त धर्मयुद्ध को अपने क्षत्रिय स्वभाव के अनुसार यज्ञ-भाव से लड़े। यदि वह युद्ध नहीं करेगा, तो सृष्टि-चक्र के संचालन में बाधक बनेगा। इस प्रकार सृष्टि का कार्य-कारण चक्र परमात्मा ने ही प्रवृत्त किया है। जो मनुष्य इसका पालन नहीं करता, उसके लिए भगवान अत्यंत कठोर शब्दों में कहते हैं "इस प्रकार चलाए हुए चक्र का जो इस लोक में अनुसरण नहीं करता, वह पापजीवी, इन्द्रियों के सुख में पड़ा हुआ, व्यर्थ ही जीता है।" (गीता 3.16)
जैसे मशीन में सभी पुर्जों का अपना-अपना महत्व होता है। यदि एक भी पुर्जा खराब हो जाए, तो पूरी मशीन प्रभावित हो जाती है। इसी प्रकार सृष्टि में अनेक यज्ञ-चक्र चल रहे हैं। सृष्टि यज्ञ-चक्रों की विराट श्रृंखला है। व्यष्टि और सृष्टि एक-दूसरे पर आश्रित हैं। इनमें परस्पर विनिमय का नैसर्गिक विधान है, जिसके मूल में प्रकृति है। प्रकृति के समस्त कर्मों का वास्तविक स्वरूप यज्ञ है और इसका अधीश्वर तथा भोक्ता सर्वव्यापी ब्रह्म या परमात्मा है।
जो व्यक्ति केवल अपने स्वार्थ के लिए, अपनी इन्द्रियों की तुष्टि के लिए ही कर्म करता है, वह इन्द्रियाराम है। वह समाज, प्रकृति आदि के बारे में सोचता भी नहीं। वह अन्याय करके, लोगों का शोषण करके, जंगलों को नष्ट करके केवल अपनी सुख-सुविधाओं की पूर्ति करना चाहता है। वह यज्ञ-परंपरा को तोड़कर इस सृष्टि-चक्र में अवरोध उत्पन्न करता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं का उद्धार तो कर ही नहीं सकता, बल्कि दूसरों के मार्ग में भी अवरोध बनता है। भगवान कहते हैं कि ऐसे पापी व्यक्ति का जीवन ही व्यर्थ है।