इस सप्ताह फ्रांस, इटली, अल्बानिया, स्पेन, पुर्तगाल, बेल्जियम, ग्रीस, ऑस्ट्रिया और जर्मनी में गंभीर सरकारी संकट देखने को मिले, जब प्रदर्शनकारियों ने अपने-अपने प्रशासन के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन किए, जिससे चिंताएँ बढ़ गईं। जबकि इन देशों ने रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान यूक्रेन के समर्थन से उत्पन्न आर्थिक तनाव का स्पष्ट रूप से अनुभव किया है, सबूत बताते हैं कि संगठित प्रोटेस्ट टूलकिट अप्रत्यक्ष माध्यमों से इन देशों में सत्तारूढ़ सरकारों को कमजोर करने और संभावित रूप से उन्हें हटाने के लिए काफी तीव्रता से काम कर रहे हैं। कई मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि ये विरोध आंदोलन केवल जनता के गुस्से की सहज अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि संगठित प्रोटेस्ट टूलकिट, विदेशी फंडिंग, डिजिटल समन्वय और रेड-ग्रीन गठबंधन के वैचारिक नेटवर्क के परिणाम हैं। फ्रांस, भारत, इटली और कई अन्य देशों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन देखे गए हैं, जिनमें चुनी हुई सरकारों के खिलाफ स्थानीय शिकायतों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
प्रोटेस्ट टूलकिट: प्रोटेस्ट टूलकिट जनमत तैयार करने और सड़कों पर लोगों को जुटाने के लिए तैयार किए गए तरीकों का एक पैकेज है। इसमें सोशल मीडिया टेम्प्लेट, हैशटैग, नारे, पोस्टर, कानूनी हेल्पलाइन, क्राउडफंडिंग लिंक, मीडिया टॉकिंग पॉइंट्स, विरोध कैलेंडर और पुलिस से निपटने के लिए मार्गदर्शन शामिल हैं। इस तरह के टूलकिट लोकतांत्रिक संस्थानों के खिलाफ एक नैरेटिव बनाने में मदद करते हैं, सामूहिक कार्रवाई की लागत को कम करते हैं और किसी स्थानीय घटना को राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय अभियान में बदल देते हैं। ये टूलकिट लोगों को हिंसा और झूठी कथाएँ फैलाने के लिए भी प्रोत्साहित करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि ये टूलकिट लक्ष्य बदलने का एक पैटर्न प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण के लिए, भारत में प्रदर्शनकारियों ने शुरू में परीक्षा-पत्र लीक होने के संबंध में प्रदर्शन किए, लेकिन बाद में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद उन्होंने अपना गोलपोस्ट ही बदल लिया और दूसरे मुद्दों को लेकर हिंसक प्रदर्शन करने लगे। इसी तरह, फ्रांस में प्रदर्शनों की शुरुआत शैक्षिक बुनियादी ढाँचे में सुधार की माँगों से हुई, लेकिन बाद में वे बदले हुए उद्देश्यों के साथ एक हिंसक आंदोलन में बदल गए। फ्रांस के परिप्रेक्ष्य में यह भी समझना आवश्यक है कि वहाँ बीते वर्षों में इस्लामी प्रवासियों की वजह से बड़ा जनसांख्यिकीय बदलाव हुआ है। इस्लाम वहाँ का दूसरा सबसे बड़ा धर्म बन गया है और कई इस्लामी संगठन शरिया शासन की माँग करते हैं।
विदेशी वित्तपोषण और प्रभाव: कई मीडिया और शोध रिपोर्टों से पता चलता है कि विभिन्न समूहों, मीडिया प्लेटफॉर्मों, गैर-सरकारी संगठनों, छात्र निकायों और कानूनी नेटवर्कों में विदेशी वित्तपोषण का प्रवाह हो रहा है। ये समूह व्यवधान पैदा करने और सरकार को गिराने के स्पष्ट एजेंडे के साथ विरोध प्रदर्शनों में भाग ले रहे हैं। इस तरह का वित्तपोषण राजनीतिक नैरेटिव को आकार देता है या उन समूहों का समर्थन करता है, जो सुधार के बजाय टकराव का रास्ता अपनाते हैं। दानदाताओं और अंतरराष्ट्रीय कार्यकर्ताओं का इकोसिस्टम लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं का उपयोग लोकतांत्रिक संस्थानों को भीतर से कमजोर करने के लिए करता है। विदेशी वित्तपोषित मीडिया आउटलेट, कार्यकर्ता गठबंधन और ऑनलाइन नेटवर्क सरकार-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं।
फ्रांस: लाल-हरित गठबंधन का शिकार: फ्रांस इस बात का एक प्रमुख उदाहरण प्रस्तुत करता है कि कैसे स्थानीय असंतोष देशव्यापी अशांति में बदल सकता है। शिक्षा और कल्याण को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों को ट्रेड यूनियनों, वामपंथी संगठनों, अराजकतावादी हलकों और इस्लामवादी या फिलिस्तीन-समर्थक नेटवर्कों ने तेज किया। वामपंथियों (लाल) और इस्लामवादियों (हरे) के इन समूहों ने एक गठबंधन (लाल-हरित गठबंधन) बनाया, क्योंकि वे फ्रांसीसी राज्य, लोकतंत्र, पूँजीवाद और पश्चिमी विदेश नीति के प्रति साझा शत्रुता रखते हैं। उनकी रणनीति बार-बार होने वाले हिंसक प्रदर्शनों, नाकेबंदी, पुलिस के साथ झड़पों, अंतरराष्ट्रीय मीडिया कवरेज और इस नैरेटिव के माध्यम से सरकार पर लगातार दबाव बनाने की है कि सरकार की वैधता समाप्त हो गई है। जब शहरों में विरोध प्रदर्शन दोबारा होते हैं और हिंसा या संपत्ति के विनाश से जुड़ जाते हैं, तो शासन में जनता का विश्वास कम हो जाता है। इससे शासन परिवर्तन हो सकता है, जो प्रदर्शनकारियों का अंतिम लक्ष्य है।
भारत: नैरेटिव युद्ध: भारत में विदेशी वित्तपोषित प्रोटेस्ट टूलकिट छात्रों और किसान आंदोलनों, नागरिकता संबंधी विरोध प्रदर्शनों, सांप्रदायिक हिंसा और सरकारी नीतियों के खिलाफ अभियानों पर ध्यान केंद्रित करते हुए देखे जा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय संगठन, प्रवासी कार्यकर्ता, विदेशी वित्तपोषित एनजीओ और वामपंथी-उदारवादी मीडिया नेटवर्क स्थानीय मुद्दों को बढ़ाते हैं और भारत को तानाशाही या बहुसंख्यकवादी देश के रूप में चित्रित करते हैं। उनका उद्देश्य स्पष्ट है। लगातार चुनावी हार का सामना करने के बाद वे सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए सरकार-विरोधी बयानबाजी को स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं।
हालाँकि, भारत में और बाहर रहने वाले अधिकांश भारतीयों का मानना है कि नरेंद्र मोदी के शासन में पिछले दशक के दौरान देश ने अच्छी प्रगति की है। यह प्रगति ठोस रूप से दिखाई दे रही है और इसलिए प्रदर्शनकारियों का जोश कम होता दिख रहा है। साथ ही, एक विशाल आबादी वाला लोकतांत्रिक राष्ट्र होने के नाते, भारत में संख्या के लिहाज से सरकार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी लहर पैदा करना आसान नहीं है। इसीलिए सरकार भारत में विरोध प्रदर्शनों की रणनीति को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करती दिख रही है।
इटली और व्यापक यूरोपीय पैटर्न: इटली में, फ्रांस की तरह, वैचारिक विरोध, मजबूत यूनियनों, अराजकतावादी नेटवर्कों, प्रवासन और विदेश नीति को लेकर तीव्र ध्रुवीकरण की एक लंबी परंपरा है। कट्टर वामपंथी और इस्लामी राजनीतिक धाराओं के बीच लाल-हरित गठबंधन को सरकार-विरोधी प्रदर्शनों में सक्रिय रूप से और हिंसक ढंग से भाग लेते देखा जा सकता है। व्यापक रूप से यूरोप में विरोध प्रदर्शनों को एक प्रकार के विषम राजनीतिक युद्ध के रूप में इस्तेमाल करने का एक पैटर्न देखा जा सकता है। चुनावी जीत की तलाश करने के बजाय, कुछ कट्टरपंथी नेटवर्क शासन को लकवाग्रस्त करने, राज्य से अति-प्रतिक्रिया करवाने, समाजों को विभाजित करने और लोकतांत्रिक संस्थानों को दमनकारी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं।
विरोध और विध्वंस में अंतर करना: हालाँकि, हर विरोध को शासन परिवर्तन के लिए विदेशी-प्रायोजित प्रयास नहीं कहा जा सकता। लोकतांत्रिक राजनीति नागरिकों को सरकारों के खिलाफ सभा करने, आलोचना करने, हड़ताल करने और अभियान चलाने का अधिकार प्रदान करती है। वैध असंतोष को विद्रोह से अलग करने वाली बात आलोचना नहीं, बल्कि इरादे और इस्तेमाल की गई विधियाँ हैं। इनमें हिंसा के लिए उकसाना, अवैध माध्यमों से वित्तपोषण, शत्रुतापूर्ण विदेशी अभिनेताओं के साथ समन्वय, जानबूझकर गलत सूचना देना या असंवैधानिक साधनों के जरिए संवैधानिक सत्ता को उखाड़ फेंकने का प्रयास करना शामिल है।
प्रोटेस्ट टूलकिट और विदेशी फंडिंग फ्रांस, भारत, इटली और अन्य लोकतंत्रों में राजनीतिक अशांति को बढ़ावा दे रहे हैं। वे स्थानीय शिकायतों को वैश्विक नैरेटिव से जोड़ रहे हैं, निरंतर लामबंदी के लिए संसाधन उपलब्ध करा रहे हैं और सरकारों तथा लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर करने के लिए दबाव बना रहे हैं। असली चुनौती राज्य को गुप्त हस्तक्षेप और राजनीतिक हिंसा से बचाने के साथ-साथ उन नागरिक स्वतंत्रताओं को संरक्षित रखना है, जो लोकतांत्रिक आत्म-सुधार को संभव बनाती हैं। मुझे उम्मीद है कि लोग इसे समझेंगे और इस चुनौती का समाधान शांति और समझदारी से निकालेंगे।

प्रो. अंशु जोशी
(लेखिका जेएनयू में प्राध्यापक हैं।)