मोदी सरकार ने 2020 में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी एफसीआरए 2010 में संशोधन करके गैर-सरकारी संगठनों के लिए नियमों को अधिक सख्त और पारदर्शी बनाया। एनजीओ के एफसीआरए प्रमाण पत्र की वैधता की जांच और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए नवीनीकरण नियमों को कड़ा किया गया। अब 2026 में सरकार ने इस कानून में संशोधन का विधेयक पेश किया। संसद में विरोध होने पर विधेयक संयुक्त संसदीय समिति की समीक्षा के लिए भेजा गया, ताकि शीतकालीन सत्र में इसे पेश किया जा सके। नए प्रस्तावित कानून के अनुसार, पंजीकरण रद्द होने पर एनजीओ की बची संपत्ति और फंड के प्रबंधन के लिए 'नामित प्राधिकारी' का प्रावधान है। साथ ही एनजीओ को अपने सोशल मीडिया खातों और गतिविधियों के भौगोलिक दायरे की जानकारी देना अनिवार्य किया गया। इसका उद्देश्य विदेशी फंड के दुरुपयोग को रोकना और डिजिटल निगरानी को मजबूत करना है।
इस सप्ताह 18 सितंबर को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी एफसीआरए संशोधन विधेयक पर विचार कर रही 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति की पहली बैठक हुई। समिति के अध्यक्ष के रूप में संजय जायसवाल, केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन की बैठक में उपस्थिति और समिति को शीतकालीन सत्र से पहले रिपोर्ट देने की संभावना है। गृह मंत्रालय द्वारा एफसीआरए को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर प्रस्तुत किए जाने का दावा भी है।
बताया जाता है कि भारत में विदेशी चंदा लेने वाले एनजीओ की संख्या लगभग 29,000 से घटकर 14,000 रह गई है। गृह मंत्रालय की प्रस्तुति में विदेशी योगदान 17,832 करोड़ से बढ़कर 22,974 करोड़ होने का दावा किया गया है।
देश में गैर-सरकारी संगठनों यानी एनजीओ की भूमिका महत्वपूर्ण है। ये संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, आदिवासी विकास, महिला सशक्तीकरण, बाल कल्याण, पर्यावरण, गरीबी उन्मूलन और मानवाधिकार जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं। दूसरी ओर, जब इन्हीं संस्थाओं को विदेशों से बड़ी मात्रा में धन मिलता है और वे सरकार की नीतियों, बड़ी विकास-परियोजनाओं या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रश्नों पर सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तो विदेशी धन के स्रोत, उद्देश्य, उपयोग और निगरानी पर सवाल उठते हैं।
कुछ मामलों में वार्षिक रिटर्न न देना, कुछ में नवीनीकरण के लिए आवेदन न करना और कुछ में कथित उल्लंघन शामिल थे। 2017 में लगभग 11,319 एनजीओ के पंजीकरण समाप्त होने की बात सामने आई।
2026 में लगभग 14,449 सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण होने का दावा किया गया। 2010 के बाद एफसीआरए पंजीकृत संगठनों की संख्या में बड़ी कमी आई। यदि 17,832 करोड़ से 22,974 करोड़ की तुलना आधिकारिक गृह मंत्रालय के आंकड़ों से प्रमाणित होती है, तो इससे यह संकेत मिलता है कि कम संख्या में संगठन अपेक्षाकृत अधिक विदेशी धन प्राप्त कर रहे हैं। विदेशी अनुदान से चलने वाले अनेक संगठन अस्पताल, स्कूल, राहत कार्य, ग्रामीण विकास, विकलांगता सहायता, महिला एवं बाल कल्याण तथा आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं।
समस्या तब पैदा होती है जब धन के वास्तविक स्रोत को छिपाया जाए, धन का उपयोग घोषित उद्देश्य के बजाय किसी अन्य उद्देश्य में हो; एनजीओ विदेशी संस्था के राजनीतिक या रणनीतिक एजेंडे का माध्यम बन जाए; विदेशी धन का उपयोग हिंसक या गैर-कानूनी गतिविधियों के लिए हो; धन का इस्तेमाल कानून-विरुद्ध धार्मिक गतिविधियों में हो; या संगठन घोषित सामाजिक कार्य की आड़ में प्रतिबंधित गतिविधियों में शामिल हो।
एफसीआरए मूल रूप से 1976 में बनाया गया था। इसका उद्देश्य विदेशी योगदान और विदेशी आतिथ्य को नियंत्रित करना था, ताकि विदेशी धन भारतीय राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन को अनुचित रूप से प्रभावित न करे। 2010 में नया एफसीआरए कानून लागू हुआ। इसके तहत विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले पात्र संगठनों को पंजीकरण, नवीनीकरण, बैंकिंग, लेखांकन और वार्षिक रिपोर्टिंग से जुड़े नियमों का पालन करना पड़ता है। 2020 में कानून में महत्वपूर्ण बदलाव हुए। इनमें विदेशी योगदान के लिए निर्दिष्ट बैंक खाते की व्यवस्था, प्रशासनिक खर्च पर सीमा और विदेशी योगदान के हस्तांतरण पर प्रतिबंध शामिल थे। सरकार का तर्क रहा है कि विदेश से आने वाले धन का स्रोत और उपयोग स्पष्ट होना चाहिए। सरकार के अनुसार, उद्देश्य इन संगठनों को समाप्त करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन भारतीय कानूनों के अनुरूप खर्च हो। सरकार की ओर से आरोप लगाया गया कि कुछ विदेशी-वित्तपोषित गतिविधियां भारत के आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
18 सितंबर 2026 को गृह मंत्रालय द्वारा संयुक्त संसदीय समिति के सामने कुडनकुलम परमाणु संयंत्र और सरदार सरोवर बांध से जुड़े विरोधों का उल्लेख हुआ। सरकार की चिंता यह हो सकती है कि यदि विदेशी धन प्राप्त करने वाला संगठन भारत की ऊर्जा या इंफ्रास्ट्रक्चर को प्रभावित करने के उद्देश्य से अभियान चलाता है, तो उसकी फंडिंग और गतिविधियों की जांच की जाए। यदि जांच में प्रमाणित हो कि कोई संस्था विदेशी धन छिपाकर प्रतिबंधित गतिविधि में लगी है, हिंसा को वित्त दे रही है, विदेशी राजनीतिक हस्तक्षेप का माध्यम बन रही है या एफसीआरए के उद्देश्य के विरुद्ध धन का उपयोग कर रही है, तो सरकार के पास कानून के अनुसार कार्रवाई का आधार हो सकता है। बहस का एक हिस्सा धार्मिक संस्थाओं से संबंधित है। धार्मिक संगठन भी अन्य संगठनों की तरह एफसीआरए के वित्तीय और प्रशासनिक नियमों के अधीन हैं। विदेशी धन और धार्मिक गतिविधियों के बीच संबंध होने मात्र से उल्लंघन सिद्ध नहीं होता।
संसद में महत्वपूर्ण कानूनी परिवर्तन से सामाजिक क्षेत्र में स्वच्छता और स्वयंसेवी का चोला पहनकर राष्ट्र-विरोधी गतिविधियां चलाने वाले कुछ संगठनों पर नियंत्रण को लेकर हंगामा होता है। गरीबों, विकास और मानव अधिकार के नाम पर विदेशी मुद्रा में करोड़ों रुपये लेकर आलीशान बंगलों, कारों, होटलों में ऐश करने और सम्मेलन, संगोष्ठी के बहाने विदेशों की सैर करने वालों को अब अपना धंधा बंद करना पड़ रहा है। सचमुच समाज की सेवा के लिए समर्पित संस्थाओं को अधिक गरिमा और विश्वसनीयता से काम करने की सुविधा होगी। माओवादियों और आतंकवादी समूहों को संदिग्ध एनजीओ से पर्दे के पीछे मिलने वाली मदद पर अंकुश लग सकेगा।
यह मुद्दा नया नहीं है। कई लोगों को गलतफहमी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ही पूर्वाग्रही है। मनमोहन सिंह सरकार के गृहमंत्री ने भी 2010 में संसद में माना था कि 'विदेशी फंड लेने वाले अनेक एनजीओ न तो बाहर से आने वाली धनराशि का पूरा विवरण देते हैं और न ही कोई हिसाब देते हैं। स्थिति इतनी अजीब रही कि विदेशी मुद्रा में इन संगठनों के पास बीस हजार करोड़ रुपये का फंड आया और उन्होंने दस हजार करोड़ कहां खर्च किए, इसकी कोई जानकारी किसी को नहीं दी।'
इस स्वीकारोक्ति के बावजूद सरकार ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इसलिए एनजीओ के पास विदेशी फंड की धनराशि बढ़ती रही। गैर-सरकारी स्वयंसेवी संगठनों को प्रारंभिक वर्षों में सरकार ने उदारतापूर्वक विदेशी अनुदान लेने दिया। 1976 में विदेशी मुद्रा लेने वाले संगठनों को सौ प्रतिशत प्रशासनिक खर्च दिखाने की सुविधा मिली। बड़ी संख्या में ऐसे एनजीओ के हिसाब-किताब और गतिविधियों की जानकारियां मिलने के बाद सरकार ने प्रशासनिक खर्च की सीमा पचास प्रतिशत कर दी। फिर भी प्रभावशाली लोगों के नाम साथ में जोड़कर कई संस्थाएं मौज-मस्ती के साथ धन का दुरुपयोग करती रहीं।
आप कल्पना नहीं कर सकते कि देश के 26 राज्यों में करीब 31 लाख एनजीओ रहे हैं। सरकार ने संसद में भी माना था कि पिछले दशकों में एनजीओ को लगभग दो लाख करोड़ रुपये उनसे मिले। गृह मंत्रालय के पास भी कुछ राज्यों से यह रिपोर्ट मिली कि कुछ संगठनों ने धर्म परिवर्तन, नक्सली आंदोलनों, जाति-धर्म या समस्याओं के नाम पर लोगों को भड़काने के लिए विदेशी चंदे का इस्तेमाल किया।इस पृष्ठभूमि में मोदी सरकार ने बाकायदा महीनों तक विभिन्न दलों की संसदीय समिति में विचार-विमर्श के बाद विदेशी अभिदाय विनियमन 2010 में संशोधन कर विधेयक को संसद के इस स्तर में बहस के साथ पारित करवा लिया और एनजीओ की सीमाएं तय कर दीं। इसमें कोई शक नहीं कि सैकड़ों स्वयंसेवी संगठन ईमानदारी से काम कर रहे हैं। उन्हें इस कानून से अधिक लाभ होगा। देश-विदेश में उनकी साख भी बढ़ेगी। अन्यथा भारत में एनजीओ की छवि निरंतर बिगड़ रही थी।
केंद्र सरकार ने करीब बीस हजार फर्जी किस्म के एनजीओ का पंजीकरण रद्द किया। अब तक कई संस्थाएं करोड़ों की धनराशि मंगाने के बाद दुकान की तरह संस्था बंद कर देती थीं और उसकी जानकारी भी सरकार को नहीं देती थीं। नया कानून बनने से अब उन्हें पंजीकरण रद्द करने के लिए बाकायदा सरकार को सूचित करना है। इसके तब तक के कामकाज की पूरी रिपोर्ट राज्य सरकार के अधिकारी देंगे, तब उसे बंद किए जाने का अधिकृत प्रमाण पत्र दिया जाएगा।
इसी तरह नियमानुसार सरकारी अधिकारी किसी एनजीओ में नहीं रह सकते हैं, लेकिन चतुर अधिकारी किसी परिजन के नाम पर संस्था चलाकर अपने प्रभाव से करोड़ों रुपये का विदेशी चंदा मंगवाते थे। नए कानून के लागू होने के बाद उनकी ऐसी गतिविधि पकड़े जाने पर दंडित होना पड़ेगा। अब अधिकारी ही नहीं, 'पब्लिक सर्वेंट' की श्रेणी वाले लोगों पर भी यह नियम लागू हो गया।एक और तिकड़म कुछ एनजीओ करते रहे। वे चंदा एक संस्था के नाम से मंगाते और कुछ समय में उसे दूसरी संस्था में ट्रांसफर कर देते थे।2010 में लगभग 29,700 संगठनों के पास एफसीआरए पंजीकरण होने का आंकड़ा एक रिपोर्ट में दिया गया था। 2017 तक सरकार ने संसद में बड़ी संख्या में एफसीआरए पंजीकरण रद्द किए जाने की जानकारी दी थी। हालांकि, रद्दीकरण के कारण अलग-अलग थे।

आलोक मेहता
(लेखक पद्मश्री सम्मानित वरिष्ठ संपादक हैं)