डॉ. भारती
(सहायक आचार्य )
हिंदी केवल एक भाषा नहीं है। यह भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं, जनभावनाओं और सामाजिक संवाद को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है। हिंदी के विकास की यात्रा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, संविधान निर्माण और स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक व्यवस्था से गहराई से जुड़ी है। प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाकर हम हिंदी के संवैधानिक महत्व और इसके व्यापक प्रयोग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं।
14 सितंबर 1949 : ऐतिहासिक निर्णय
भारतीय संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। संविधान के अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी निर्धारित की गई। साथ ही संक्रमणकालीन व्यवस्था के रूप में अंग्रेजी के प्रयोग को भी स्वीकार किया गया। यही निर्णय आगे चलकर 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाए जाने का आधार बना।
राजभाषा का आशय उस भाषा से है, जिसे शासन, प्रशासन और संघ के आधिकारिक कार्यों के लिए संवैधानिक एवं कानूनी रूप से निर्धारित किया गया हो। यह समझना आवश्यक है कि राजभाषा और राष्ट्रभाषा एक-दूसरे के समानार्थी संवैधानिक शब्द नहीं हैं। भारतीय संविधान हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता देता है।
संविधान और हिंदी का संबंध
भारतीय संविधान के भाग-17 में राजभाषा से संबंधित विस्तृत प्रावधान किए गए हैं। अनुच्छेद 120 संसद में भाषा के प्रयोग, अनुच्छेद 210 राज्य विधानमंडलों में भाषा के प्रयोग तथा अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ एवं राज्यों की भाषाओं, हिंदी के विकास तथा भाषाई हितों से संबंधित प्रावधान हैं। अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है। अनुच्छेद 351 हिंदी के विकास की दिशा निर्धारित करता है। इसके अंतर्गत हिंदी की शब्द-संपदा को समृद्ध करने तथा अन्य भारतीय भाषाओं की अभिव्यक्तियों और शब्द-संपदा को आत्मसात करते हुए हिंदी को विकसित करने की भावना दिखाई देती है।
राजभाषा के विकास की संस्थागत यात्रा
1955 में बी. जी. खेर की अध्यक्षता में राजभाषा आयोग का गठन किया गया। इसके बाद भाषा संबंधी प्रश्नों पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विमर्श हुआ। 1959 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हिंदी और अंग्रेजी के प्रश्न पर आश्वासन दिया कि गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों की आशंकाओं का ध्यान रखा जाएगा। इसी क्रम का परिणाम आगे चलकर राजभाषा अधिनियम, 1963 और उसके 1967 के संशोधन में दिखाई दिया।
26 जनवरी 1965 से हिंदी के संबंध में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक चरण शुरू होना था, लेकिन भाषा को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में चिंताएँ और आंदोलन सामने आए। परिणामस्वरूप अंग्रेजी का प्रयोग समाप्त नहीं हुआ और हिंदी के साथ उसका प्रयोग जारी रहा। इस व्यवस्था ने भाषाई विविधता और प्रशासनिक आवश्यकता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया।
राजभाषा विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका
संघ के सरकारी कार्यों में हिंदी के प्रगतिशील प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए गृह मंत्रालय के अंतर्गत राजभाषा विभाग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राजभाषा विभाग की स्थापना स्वतंत्र विभाग के रूप में 26 जून 1975 को हुई। विभाग हिंदी के सरकारी प्रयोग को बढ़ाने के साथ राजभाषा संबंधी संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों के अनुपालन का कार्य करता है।
राजभाषा नियम, 1976 के माध्यम से केंद्रीय सरकारी कार्यालयों में हिंदी और अंग्रेजी के प्रयोग, पत्राचार, आवेदन और प्रशासनिक दस्तावेजों से संबंधित नियम निर्धारित किए गए।
हिंदी और राष्ट्रनिर्माण
हिंदी के महत्व को केवल संवैधानिक व्यवस्था तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक नेताओं और चिंतकों ने हिंदी को भारतीय जनमानस के व्यापक संवाद का माध्यम माना। महात्मा गांधी हिंदी को जनसामान्य से जोड़ने वाली भाषा के रूप में देखते थे। महर्षि दयानंद सरस्वती, केशवचंद्र सेन और राजा राममोहन राय जैसे चिंतकों ने भी भारतीय एकता के संदर्भ में हिंदी की व्यापक संप्रेषण क्षमता को रेखांकित किया।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस, डॉ. भीमराव आंबेडकर, डॉ. जाकिर हुसैन और साहित्यकार सुमित्रानंदन पंत ने भी शिक्षा, ज्ञान, संवाद और राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में भारतीय भाषाओं और हिंदी की भूमिका को महत्वपूर्ण माना।
हिंदी और भारतीय भाषाई विविधता
भारत की विशेषता उसकी भाषाई विविधता है। संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाएँ शामिल हैं। हिंदी का विकास अन्य भारतीय भाषाओं के विरोध में नहीं, बल्कि भारत की बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक विरासत के सम्मान के साथ होना चाहिए। हिंदी की शक्ति उसकी ग्रहणशीलता और विभिन्न भारतीय भाषाओं से संवाद स्थापित करने की क्षमता में भी निहित है।
डिजिटल युग में हिंदी
आज हिंदी का संसार कागज और कलम तक सीमित नहीं है। समाचार-पत्र, रेडियो, टेलीविजन, मोबाइल, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म हिंदी के व्यापक प्रसार के माध्यम बन चुके हैं। कंप्यूटर और डिजिटल तकनीक ने हिंदी लेखन को नई गति दी है। रेमिंग्टन, इनस्क्रिप्ट और फोनोटिक जैसी पद्धतियों के साथ यूनिकोड तकनीक ने हिंदी को कंप्यूटर, स्मार्टफोन और इंटरनेट पर लिखना-पढ़ना पहले की तुलना में अधिक सहज बनाया है।
आज विद्यार्थी ऑनलाइन हिंदी सामग्री पढ़ रहे हैं, शोधार्थी डिजिटल संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं और देश-विदेश में हिंदी के माध्यम से ज्ञान एवं सूचनाओं का आदान-प्रदान हो रहा है।
हिंदी दिवस : संकल्प का दिन
हिंदी दिवस के अवसर पर विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भाषण, निबंध, कविता-पाठ, वाद-विवाद, प्रश्नोत्तरी और संगोष्ठी जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनका उद्देश्य केवल एक दिन हिंदी का उत्सव मनाना नहीं, बल्कि दैनिक जीवन, शिक्षा, प्रशासन, अनुसंधान और तकनीकी क्षेत्र में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाना होना चाहिए। हिंदी को आगे बढ़ाने का अर्थ अन्य भाषाओं को पीछे करना नहीं है। भारत की वास्तविक शक्ति उसकी बहुभाषिकता में एकता है। हिंदी इस विविधता के बीच संवाद का एक सशक्त माध्यम बन सकती है।
आज आवश्यकता है कि हिंदी को केवल भावनाओं की भाषा न मानकर ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन, शोध और रोजगार की भाषा के रूप में भी विकसित किया जाए। जब नई पीढ़ी हिंदी में ज्ञान का सृजन करेगी, तकनीक हिंदी को सहज बनाएगी और समाज हिंदी में संवाद को सम्मान देगा, तभी हिंदी का विकास व्यापक अर्थ प्राप्त करेगा।
हिंदी हमारी संवेदना है, हिंदी हमारा संवाद है, हिंदी हमारी अभिव्यक्ति है। आइए, हिंदी दिवस पर संकल्प लें कि हिंदी को अपनाएँगे, समृद्ध करेंगे और भारतीय भाषाओं की विविधता का सम्मान करते हुए इसे ज्ञान एवं जनसंचार की सशक्त भाषा बनाएँगे।
“हिंदी का सम्मान, भारतीय भाषाओं का सम्मान;
भाषाई विविधता में एकता—यही भारत की पहचान।
डॉ. भारती
सहायक आचार्य
मानविकी एवं समाज विज्ञान विभाग
आई.ई. सी. विश्वविद्यालय, हिमाचल प्रदेश सोलन