डॉ. वंदना गाँधी
अपनी परंपराओं से जुड़ी समृद्ध विरासत का महत्व हमें तब समझ में आता है जब वह हमारे जीवन से धीरे-धीरे कम होने लगती है। भाषा के विषय में भी यही बात लागू होती है। जब अपनी भाषा हमारे घर, बातचीत, विचार और व्यवहार में सहज रूप से मौजूद रहती है, तब हम उसके महत्व पर अलग से विचार नहीं करते। धीरे-धीरे जब अपनी भाषा के स्थान पर दूसरी भाषाओं के शब्द, वाक्य और व्यवहार आने लगते हैं तब आभास होता है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, हमारे अनुभवों और स्मृतियों से जुड़ी हुई पहचान भी है। इस विरासत को सहेजना आवश्यक होने के साथ ही समाज का उत्तरदायित्व भी है।
हिंदी दिवस से आगे बढ़कर हिंदी का अभ्यास
हिंदी के साथ भी आज ऐसा ही प्रश्न खड़ा दिखाई दे रहा है। प्रति वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस आता है। विद्यालयों और कार्यालयों में कार्यक्रम होते हैं। प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं, हिंदी की महत्ता पर चर्चाएँ होती हैं और हम हिंदी के प्रति अपने सम्मान को व्यक्त करते हैं। यह सब आवश्यक है लेकिन क्या हिंदी का महत्व केवल एक दिन के आयोजन तक सीमित रहना चाहिए? अब हिंदी दिवस को एक दिन मनाने से आगे बढ़कर हिंदी के साथ अपने दैनिक व्यवहार को देखने की जरूरत है। किसी भाषा की वास्तविक शक्ति उसके उत्सव में नहीं, उसके निरंतर प्रयोग में दिखाई देती है।
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती। उसमें हमारे विचार, संवेदनाएँ, स्मृतियाँ और जीवन के अनुभव बसे होते हैं। जिस भाषा में व्यक्ति अपने मन की बात सहजता से कह पाता है, वही भाषा उसके भीतर सबसे गहरे उतरती है। इसलिए अपनी भाषा के प्रति आत्मविश्वास केवल भाषाई प्रश्न नहीं बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास का भी प्रश्न है।
दुनिया के कई देशों ने अपनी भाषा के प्रति इसी आत्मविश्वास को बनाए रखा है। फ्रांस इसका एक उदाहरण है। आधुनिक और वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा होते हुए भी फ्रांसीसी भाषा वहाँ सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। शिक्षा, प्रशासन, व्यापार, सार्वजनिक सूचना और विज्ञापन जैसे क्षेत्रों में फ्रेंच का व्यापक प्रयोग होता है। वैश्विक संवाद के लिए अंग्रेजी सीखना वहाँ बाधा नहीं है लेकिन अंग्रेजी जानना अपनी भाषा से दूरी का कारण भी नहीं बनता है।
जापान में भी यही संतुलन दिखाई देता है। कार्यालयों, बाजारों, परिवहन, मीडिया और प्रशासन में जापानी भाषा दैनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ने के लिए अंग्रेजी और अन्य भाषाएँ सीखी जाती हैं लेकिन इसके लिए जापानी को पीछे नहीं किया जाता।
दक्षिण कोरिया ने भी अपनी भाषा और लिपि को आधुनिक विकास के साथ जोड़े रखा है। शिक्षा, प्रशासन, मीडिया और सामाजिक जीवन में कोरियाई भाषा आज भी केंद्रीय भूमिका निभाती है। आइसलैंड जैसे छोटे देश में भी अंग्रेजी का व्यापक ज्ञान होने के बावजूद अपनी मातृभाषा को बचाने और विकसित करने पर निरंतर ध्यान दिया जाता है।
इन देशों के उदाहरणों का अर्थ यह नहीं कि भारत को उनकी नकल करनी चाहिए। भारत की अपनी विशिष्टता है। हमारी भाषाई विविधता ही हमारी शक्ति है। हिंदी के साथ तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, असमिया, ओड़िया और अनेक भारतीय भाषाएँ हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। प्रत्येक भाषा अपने साथ एक समृद्ध साहित्य, इतिहास और जीवन-दृष्टि लेकर चलती है।
अपनी भाषा के प्रति आत्मविश्वास जरूरी
इसलिए प्रश्न किसी एक भाषा को दूसरी भाषा के विरुद्ध खड़ा करने का नहीं है। प्रश्न केवल इतना है कि क्या दूसरी भाषाएँ सीखते समय अपनी भाषा के प्रति हमारा आत्मविश्वास भी उतना ही मजबूत रह सकता है?
भारत की परंपरा इस विषय में हमें बहुत कुछ सिखाती है। प्राचीन भारत में संस्कृत ज्ञान, दर्शन, साहित्य और आध्यात्मिक चिंतन की महत्वपूर्ण भाषा रही। वहीं प्राकृत जैसी भाषाओं ने व्यापक जनसमुदाय तक संवाद पहुँचाने का काम किया। सम्राट अशोक के अभिलेखों में पालि-प्राकृत के प्रयोग का एक उद्देश्य यह भी था कि शासन का संदेश सामान्य लोगों तक पहुँच सके। इसके साथ ही तमिल, कन्नड़, तेलुगु और अन्य भारतीय भाषाओं ने अपनी समृद्ध साहित्यिक और अभिलेखीय परंपराएँ विकसित कीं।
भारत में न तो भाषाई संकीर्णता रही है और न ही अपनी भाषा को लेकर हीनभावना। हमारी परंपरा तो अनेक भाषाओं को साथ लेकर चलने की रही है लेकिन आत्मविश्वास के साथ। आज आवश्यकता इसी आत्मविश्वास को अपने दैनिक जीवन में वापस लाने की है।
अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा को सीखना बिल्कुल गलत नहीं है। दूसरी भाषाएँ हमारे ज्ञान और अवसरों का विस्तार करती हैं। समस्या तब शुरू होती है जब किसी दूसरी भाषा का ज्ञान अपनी भाषा के प्रति हीनभावना का कारण बनने लगे। जब हमें हिंदी बोलते हुए अनावश्यक संकोच हो और अंग्रेजी के कुछ शब्द बोलना आधुनिकता का प्रमाण लगने लगे, तब हमें अपने भाषाई व्यवहार पर विचार करना चाहिए।
हिंदी को मजबूत करने के लिए हमेशा बड़े अभियान या बड़े संकल्प की आवश्यकता नहीं है। शुरुआत बहुत छोटे स्तर से हो सकती है। घर में बच्चों से हिंदी में सहज बातचीत हो। जहाँ संभव हो, कार्यालयीन व्यवहार में हिंदी का प्रयोग किया जाए। अपने संदेश और शुभकामनाएँ हिंदी में लिखने में संकोच न हो। सार्वजनिक जीवन में हिंदी बोलते समय यह भावना न हो कि हमें अपनी भाषा के लिए कोई सफाई देनी है।
भाषा तभी जीवित रहती है जब वह बोली जाती है, लिखी जाती है और व्यवहार में आती है।इसलिए हिंदी दिवस हमारे लिए केवल हिंदी के सम्मान का अवसर न होकर आत्ममंथन का अवसर भी हो सकता है। हमें यह देखने की जरूरत है कि हिंदी हमारे जीवन में वास्तव में कितनी सहज है। क्या हम उसे केवल कार्यक्रमों, पोस्टरों और भाषणों तक सीमित रखते हैं, या अपने घर, कार्यालय, बाजार और आपसी संवाद में भी उसका स्वाभाविक प्रयोग करते हैं?
हमें यह संकल्प लेने की आवश्यकता नहीं कि हर परिस्थिति में केवल हिंदी ही बोलेंगे। भारत जैसे बहुभाषी देश में ऐसा आग्रह न आवश्यक है और न ही व्यावहारिक। आवश्यकता केवल इतनी है कि जहाँ हिंदी स्वाभाविक रूप से हमारी भाषा हो, वहाँ उसे बोलने में हमें संकोच न हो क्योंकि भाषा किसी पर थोपी नहीं जाती, वह व्यवहार से जीवित रहती है।
जब हिंदी केवल 14 सितंबर का विषय न रहकर हमारे घर की बातचीत, कार्यालय के व्यवहार, सामाजिक संवाद और विचारों की सहज भाषा बनेगी, तब हिंदी दिवस केवल एक आयोजन नहीं रहेगा। वह हमारे उस निरंतर अभ्यास का उत्सव होगा, जिसके माध्यम से कोई भाषा वास्तव में जीवित रहती है। यही
हिंदी दिवस से हिंदी अभ्यास तक अपनी हिंदी के प्रति आत्मीयता और आत्मविश्वास प्रकट करने की यात्रा है।

(लेखिका समाजशास्त्री, शिक्षाविद, कथाकार एवं मध्यप्रदेश की राज्य सूचना आयुक्त हैं)