मीडिया और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल

मीडिया और न्यायपालिका पर आंसू बहाने से पहले आईना देखने की जरूरत

कपिल सिब्बल ने हाल ही में मीडिया और न्यायपालिका पर उठाए गंभीर सवाल। उनका मानना है कि दोनों संस्थाओं पर आधुनिक दबावों के साथ-साथ पुराने दबावों की जांच भी जरूरी है।

By : नरेंद्र कुमार
मीडिया और न्यायपालिका पर आंसू बहाने से पहले आईना देखने की जरूरत

आज मीडिया और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाना जरूरी है। सत्ता से सवाल करना पत्रकारिता का धर्म है और न्यायपालिका की जवाबदेही लोकतंत्र की जरूरत। लेकिन यह आईना दोनों तरफ होना चाहिए। अगर आज के दबावों पर आंसू बहाने हैं तो पुराने दबावों की फाइलें भी खोलनी होंगी। लोकतंत्र की संस्थाओं की कमजोरी पर चिंता करते समय यह भी देखना होगा कि उन्हें कमजोर करने में अतीत की सत्ताओं, राजनीतिक दलों, प्रभावशाली वकीलों, मीडिया मालिकों और स्वयं संस्थाओं की भूमिका क्या रही है।

वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने पिछले दिनों प्रेम भाटिया मेमोरियल लेक्चर में 'लोकतंत्र के दो सबसे मजबूत स्तंभ प्रेस और न्यायपालिका हमें क्यों निराश कर चुके हैं' जैसे विषय पर कई गंभीर सवाल उठाए। कपिल सिब्बल कांग्रेस के समर्थन से सांसद और कानून, मानव संसाधन (शिक्षा), संचार, आईटी तथा अर्थ साइंस जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के केंद्रीय मंत्री रहे हैं। 'जमीनी सियासत' गड़बड़ होने से दिल्ली में पहले सुषमा स्वराज और फिर डॉक्टर हर्षवर्धन से चुनाव हार गए। लेकिन कानूनवेत्ता होने के कारण कानून और राजनीति के दांव-पेंच के जरिये कांग्रेस ही नहीं, लालू यादव, झारखंड मुक्ति मोर्चा, समाजवादी पार्टी आदि के समर्थन से राज्यसभा के सदस्य बने हुए हैं। वकील होने के कारण भ्रष्टाचार या अन्य गंभीर मामलों में नरसिंह राव से लेकर लालू यादव तक कई नेताओं की ओर से अदालतों में पैरवी करते रहे हैं। मीडिया के लिए भी उन्होंने एक न्यूज चैनल शुरू किया या करवाया, लेकिन पता नहीं किस दबाव में कुछ ही महीनों में सबको निकालकर उसे बंद कर दिया गया। इस दृष्टि से उन्हें राजनीतिक ताकत, मीडिया और न्यायपालिका पर आधिकारिक रूप से बोलने का हक जरूर है।

सिब्बल साहब ने अपने भाषण में कहा कि प्रेस का मुख्य काम सत्ता से कड़े सवाल पूछना और उसे जवाबदेह बनाना है, लेकिन आज मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इस जिम्मेदारी से पीछे हट चुका है। मीडिया घरानों के व्यावसायिक हित और सरकारी विज्ञापनों पर निर्भरता ने उनकी स्वतंत्रता को प्रभावित किया है। जब वित्तीय लाभ मुख्य उद्देश्य बन जाता है तो निष्पक्ष पत्रकारिता की बलि चढ़ जाती है। इसी तरह न्यायपालिका को लेकर भी जनता का भरोसा कम हो रहा है। उन्होंने इन दोनों संस्थाओं के पतन के पीछे आपस में जुड़े कारकों को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि पद, प्रतिष्ठा या सुरक्षा के प्रलोभन में लोग अपने पेशेवर सिद्धांतों से समझौता कर लेते हैं।

मेरे जैसे पत्रकार इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिंह राव, मनमोहन सिंह के सत्ता काल से सत्ता, न्याय व्यवस्था और मीडिया के उतार-चढ़ाव को करीब से देखते रहे हैं। इसलिए सिब्बल साहब की भाषण कला की तारीफ के साथ स्वतंत्रता के अधिकार का उपयोग करते हुए यह सवाल भी उठाना चाहेंगे कि पहले सत्ता से मीडिया और न्यायपालिका पर दबाव के ऐतिहासिक तथ्यों की फाइलों को कैसे दबाया या भुलाया जा सकता है?

इन दिनों जस्टिस यशवंत वर्मा के बंगले में लाखों नोटों की बोरियों के जलने के गंभीर आरोपों के सही ठहराए जाने के बाद भी उन्हें हटाने का मुद्दा चर्चा में है। इसलिए भारतीय न्यायपालिका की जवाबदेही के इतिहास में जस्टिस वी. रामास्वामी का मामला याद आता है। यह ऐसा अध्याय है, जिसमें न्यायाधीश पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों की जांच हुई और संसद उन्हें पद से नहीं हटा सकी। रामास्वामी पर सरकारी धन और सरकारी सुविधाओं के कथित दुरुपयोग से जुड़े 14 आरोपों की जांच हुई थी। तीन सदस्यीय जांच समिति ने अधिकांश गंभीर आरोपों को सिद्ध माना।

इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की लगभग छह घंटे की कानूनी दलील, कांग्रेस सांसदों का मतदान से अलग रहना और तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव की राजनीतिक भूमिका आज भी संसद, न्यायपालिका और मीडिया के पुराने पन्नों में दर्ज है। संसद की प्रेस गैलरी में बैठकर 1993 में मैंने भी जज को बचाने के लिए सिब्बल की दलीलें सुनी थीं। कपिल सिब्बल के राजनीतिक जीवन की शुरुआत भी उसी दौर में हुई थी।

रामास्वामी मामले के बाद सिब्बल केवल एक चर्चित वकील नहीं रहे। बाद में वे पी.वी. नरसिंह राव के कानूनी बचाव दल में भी शामिल हुए। झारखंड मुक्ति मोर्चा सांसद रिश्वत कांड में आरोप था कि 1993 में नरसिंह राव सरकार को बचाने के लिए कुछ सांसदों को कथित रूप से रिश्वत दी गई थी। मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ तक गया। उपलब्ध कानूनी स्रोतों में पी.पी. राव, डी.डी. ठाकुर और कपिल सिब्बल को अपीलकर्ताओं के वकीलों में दर्ज किया गया है। इस मामले में आर.के. आनंद का नाम भी प्रमुख वकील के रूप में सामने आता है। बाद में आर.के. आनंद भी झामुमो के समर्थन से राज्यसभा पहुंचे।

यही नहीं, कपिल सिब्बल ने नरसिंह राव और चंद्रास्वामी से जुड़े लखूभाई पाठक धोखाधड़ी मामले में भी पैरवी की। आरोप था कि 1983 में तत्कालीन विदेश मंत्री पी.वी. नरसिंह राव, चंद्रास्वामी और उनके सहयोगी 'मामाजी' ने ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मूल के व्यवसायी लखूभाई पाठक से कथित रूप से एक लाख डॉलर की धोखाधड़ी की। सीबीआई का आरोप था कि भारत में न्यूजप्रिंट पेपर पल्प का ठेका दिलाने का वादा किया गया था। अदालत से राव के बरी होने के बाद उनका सिब्बल को गले लगाना भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना। ऐसे मामलों में सिब्बल के राजनीतिक और कानूनी रिश्तों के प्रभाव को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

सिब्बल साहब ने अपने भाषण में मीडिया मालिकों और पत्रकारों पर इस समय भारी दबाव तथा विदेशी पूर्वाग्रही रिपोर्टों का भी हवाला दिया है। यहां भी वे अतीत के काले पन्ने भूल गए या भुलाने की कोशिश कर रहे हैं। मैं भाजपा या उसके समर्थकों की तरह केवल आपातकाल की बात नहीं कर रहा। स्वतंत्र भारत में प्रेस की आर्थिक स्वतंत्रता से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा सरकार द्वारा 1960 में जारी वह आदेश था, जिसमें अखबार की कीमत और पृष्ठों की संख्या के बीच संबंध नियंत्रित किया गया। 1962 में एक अन्य आदेश के तहत सरकार कागज के आयात, कोटा, पृष्ठ संख्या और उपयोग को नियंत्रित करती थी। फिर 1972-73 की कठोर न्यूजप्रिंट नीति में बड़े प्रतिबंध लगाए गए और बड़े प्रकाशक अदालत पहुंचे।

इंडियन एक्सप्रेस ही नहीं, अनेक प्रादेशिक अखबारों पर कांग्रेस सरकारों और नेताओं के विज्ञापन रोकने तथा आर्थिक मामलों में कार्रवाई के दबाव के रिकॉर्ड हैं। बिहार में जगन्नाथ मिश्रा द्वारा लाया गया प्रेस कानून और राजीव गांधी सरकार में प्रस्तावित मानहानि कानून प्रेस पर खतरे के रूप में देखे गए। लालू यादव के शासन में चारा कांड की खबरें छापने पर 1990 में पटना में प्रेस पर सीधा हमला हुआ। तब मैं उसी अखबार का संपादक था और पहली खबर भी मैंने लिखी थी। हमले के बाद भी हमने लिखना बंद नहीं किया। उत्तर प्रदेश में समाजवादी मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के राज में अखबारों पर 'हल्ला बोल' के तहत हुए हमलों के तथ्य भी कैसे भुलाए जा सकते हैं?

आज मीडिया और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाना जरूरी है। सत्ता से सवाल करना पत्रकारिता का धर्म है और न्यायपालिका की जवाबदेही लोकतंत्र की जरूरत। लेकिन यह आईना दोनों तरफ होना चाहिए। अगर आज के दबावों पर आंसू बहाने हैं तो पुराने दबावों की फाइलें भी खोलनी होंगी। लोकतंत्र की संस्थाओं की कमजोरी पर चिंता करते समय यह भी देखना होगा कि उन्हें कमजोर करने में अतीत की सत्ताओं, राजनीतिक दलों, प्रभावशाली वकीलों, मीडिया मालिकों और स्वयं संस्थाओं की भूमिका क्या रही है। इतिहास को सुविधानुसार याद करना भी लोकतंत्र के लिए उतना ही खतरनाक है जितना इतिहास को मिटा देना। इसलिए सिब्बल साहब के सवालों से असहमति जरूरी नहीं, लेकिन उनसे एक और सवाल पूछना भी उतना ही जरूरी है—मीडिया और न्यायपालिका पर आंसू बहाने से पहले क्या हम सबको अपने-अपने पुराने आईने में भी एक बार देख लेने की जरूरत नहीं है?

आलोक मेहता

(लेखक पद्मश्री सम्मानित वरिष्ठ संपादक हैं)

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