अनिता चौधरी.स्वदेश
राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार 2026 के लिए जब मैं गुजरात के केवड़िया (अब एकता नगर) पहुंचती हूं तो यहाँ के बदले स्वरूप को देखकर मेरी आँखें ठिठक जाती हैं. यह बदलाव केवल इमारतों का नहीं, बल्कि आर्थिक समावेश और दूरदर्शी सोच का जीवंत उदाहरण नजर आता है.

मुझे केवड़िया की वे पुरानी और टूटी सड़कें एवं कच्चे मकान याद आते हैं, जहाँ कभी पहुँचना भी दूभर था। कभी नर्मदा का यह किनारा नकारात्मक राजनीति और विस्थापन के गलत विमर्श में उलझा हुआ था, लेकिन आज यहां परिदृश्य बदला हुआ है. कहते है ना, जहाँ सोच बड़ी होती है, वहाँ तस्वीर अपने आप बदलने लगती है. केवड़िया इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है.

आज जब मैं देखती हूं तो नजर आता है कि नर्मदा की धारा और पहाड़ वही हैं, सरदार सरोवर बांध भी उसी मजबूती से खड़ा है, लेकिन इसके मुहाने पर बसा यह शहर अब देश का सबसे चर्चित पर्यटन केंद्र बन चुका है. इस परिवर्तन का विशाल प्रतीक है सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’. वैसे तो साल 2014 के बाद से ही देश की सोच बदलने लगी थी लेकिन 2018 में इस प्रतिमा के लोकार्पण के बाद से तो ऐसा लगता है कि केवड़िया ही बदलते भारत की पहचान का प्रतिनिधित्व करता हुआ दिखाई दे रहा है.

करीब 56 वर्ग किलोमीटर में फैले 90 गाँवों तक आज विकास की बयार पहुँच चुकी है. यहाँ जंगल सफारी, आरोग्य वन, वैली ऑफ फ्लॉवर्स, एकता क्रूज और हरित रेलवे स्टेशन जैसे अनगिनत आकर्षण के केंद्र विकसित हो चुके हैं. सबसे सुखद पहलू स्थानीय जनजातीय समुदाय, विशेषकर महिलाओं का सशक्तिकरण होना है. जिन्हें कभी विकास के विरोध में सड़कों पर उतारा जाता था, आज वही आदिवासी महिलाएँ पिंक ई-रिक्शा, हस्तशिल्प और फूड सेंटर्स के ज़रिए आत्मनिर्भर बनकर इस समावेशी विकास की रीढ़ बन रही हैं.

इसी बदली हुई पहचान का एक ऐतिहासिक अध्याय 22 सितंबर 2026 को लिखा जा रहा है. 1954 से शुरू हुए ‘राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार’ के 72वें संस्करण का आयोजन दिल्ली से बाहर पहली बार एकता नगर में हो रहा है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू यहाँ भारतीय सिनेमा की विविधता और उत्कृष्ट योगदान को सम्मानित करेंगी.

यह सब देखने के बाद मैं कह सकती हूं कि जिस शहर की पहचान ही ‘एकता’ हो, वहाँ देशभर के भाषाई और सांस्कृतिक सिनेमा का संगम होते देखना एक अलग ही अनुभव प्रदान करता है. एक तरफ नर्मदा का प्रवाह, सामने सरदार पटेल की विराट प्रतिमा और उसी आँगन में भारतीय सिनेमा का महाकुंभ, केवड़िया का यह सफर केवल एक शहर का विकास नहीं, बल्कि नए और तेजी से विकसित होते भारत के सामर्थ्य की गाथा भी कहता है।

(लेखिका स्वदेश दिल्ली में वरिष्ठ विशेष प्रतिनिधि हैं)