आज हम सामाजिक समरसता की बात करते हैं। हम चाहते हैं कि विभिन्न समुदाय, परंपराएँ और सांस्कृतिक समूह अपनी पहचान के साथ एक-दूसरे का सम्मान करते हुए आगे बढ़ें। लेकिन समरसता केवल आधुनिक विचार नहीं है। भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं, जहाँ अलग-अलग राजपरंपराओं और सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों के बीच संबंध बने और वैवाहिक रिश्तों ने नई कड़ियाँ जोड़ीं। रानी दुर्गावती का जीवन इसी ऐतिहासिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
रानी दुर्गावती को हम प्रायः गढ़-मंडला की वीर महारानी के रूप में याद करते हैं। लेकिन उनकी पहचान का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनका मायका कलिंजर और चंदेल राजपरंपरा भी है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण उन्हें चंदेल वंश से जोड़ते हैं और उनके जन्मस्थान को कलिंजर से संबद्ध करते हैं। चंदेलों का इतिहास बुंदेलखंड, महोबा और कलिंजर से गहराई से जुड़ा रहा है। अनेक ऐतिहासिक परंपराएँ चंदेलों को राजपूत वंश-परंपरा से भी संबद्ध करती हैं।यहीं से रानी दुर्गावती की कहानी को देखने का एक अलग दृष्टिकोण सामने आता है वह केवल गढ़-मंडला की महारानी नहीं थीं, उससे पहले वह कलिंजर की बेटी थीं। उनका विवाह गढ़-कटंगा के राजकुमार दलपत शाह से हुआ। गढ़-कटंगा/गढ़-मंडला की तत्कालीन शासकीय परंपरा गोंड राजपरंपरा से जुड़ी थी, जो आज के जनजातीय इतिहास में गोंड समाज की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विरासत है।
इस विवाह ने दो राजपरंपराओं को एक पारिवारिक संबंध में जोड़ा। इसे केवल राजनीतिक संबंध के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह एक बेटी की यात्रा भी थी चंदेलों की बेटी गढ़-मंडला गई और गढ़-मंडला की महारानी बनी। वह अपने मायके की स्मृतियों और संस्कारों के साथ नए परिवार की परंपराओं का भी हिस्सा बनीं। इस प्रकार उनके जीवन में दो अलग ऐतिहासिक परंपराएँ एक साथ दिखाई देती हैं।यही प्रसंग आज के सामाजिक समरसता के विमर्श में विशेष अर्थ रखता है। समरसता का अर्थ अपनी पहचान मिटाना नहीं, बल्कि अपनी पहचान के साथ दूसरे की परंपरा का सम्मान करते हुए साझा विरासत का निर्माण करना है, जिसमें मातृशक्ति ही वह धुरी हैं, जो दो परिवारों की विरासत और संस्कारों को साथ लेकर चलती हैं।
रानी दुर्गावती का जीवन इस विचार को ऐतिहासिक संदर्भ देता है। उन्हें केवल 'चंदेल' या केवल 'गोंड' की पहचान में सीमित करना उनके व्यापक जीवन को अधूरा कर सकता है। उनकी जन्मभूमि कलिंजर से जुड़ी थी और उनकी कर्मभूमि गढ़-मंडला बनी। वह चंदेलों की बेटी थीं और गढ़-मंडला की महारानी।
पति दलपत शाह के निधन के बाद उन्होंने अपने अल्पवयस्क पुत्र वीर नारायण की ओर से राज्य की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने शासन किया और राज्य की सुरक्षा का दायित्व उठाया। उनमें कुशल नेतृत्व क्षमता, शौर्य, पराक्रम और अदम्य साहस के साथ युद्ध-कुशलता का गुण निःसंदेह अपने मायके से विरासत में मिला। अंततः 1564 में मुगल सेना के विरुद्ध नर्रई के युद्ध में वीरतापूर्वक संघर्ष करते हुए 24 जून को बलिदान दिया।उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मायका और ससुराल उनके व्यक्तित्व में प्रतिस्पर्धी पहचान नहीं बने, बल्कि जीवन की दो अलग विरासतों के रूप में साथ दिखाई देते हैं।आज जब हम जाति, समुदाय और पहचान के प्रश्नों पर विचार करते हैं, तब रानी दुर्गावती की कहानी हमें इतिहास के उस पक्ष की ओर देखने का अवसर देती है, जहाँ विविध परंपराएँ संबंधों के माध्यम से एक-दूसरे के निकट आईं। यह इतिहास हमें बताता है कि विविधता और समरसता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
5 अक्टूबर को रानी दुर्गावती की जन्म जयंती पर उन्हें केवल एक वीर महारानी के रूप में नहीं, बल्कि 'कलिंजर चंदेलों की बेटी और गढ़-मंडला की महारानी' के रूप में याद करना उनके जीवन की संपूर्णता को समझने का प्रयास होगा।
उनकी कहानी हमें यह संदेश देती है-
दो परिवार जुड़ सकते हैं,
दो परंपराएँ साथ चल सकती हैं,
और अपनी पहचान को बनाए रखते हुए दूसरे की पहचान का सम्मान किया जा सकता है।
आज संपूर्ण जनजाति समाज अपनी गोंडवाना की महान वीरांगना रानी दुर्गावती की जन्म जयंती उत्साह के साथ मना रहा है। वहीं, चंदेल राजपूताना वंश को अपनी शौर्य-पराक्रमी बेटी के उस साहस को याद रखना होगा, जिसने उनके कुल के गौरव को अमर कर दिया।यही सामाजिक समरसता की वह ऐतिहासिक विरासत है, जिसे रानी दुर्गावती का जीवन आज भी हमारे सामने रखता है।
कलिंजर की बेटी, गढ़-मंडला की महारानी और भारत की वीरांगना रानी दुर्गावती को जन्म जयंती पर सादर नमन।

डॉ. दीपमाला रावत
(लेखिका लोक भवन, भोपाल में जनजातीय प्रकोष्ठ की विषय विशेषज्ञ हैं।)