राष्ट्र निर्माण का इतिहास केवल बड़े नेताओं, आंदोलनों और घोषणाओं का इतिहास नहीं होता, वह उन अनाम तपस्वियों की साधना का भी इतिहास होता है, जिन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण किसी महान उद्देश्य के चरणों में अर्पित कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रारंभिक काल में ऐसे अनेक कर्मयोगी हुए जिन्होंने न प्रचार चाहा, न प्रतिष्ठाः केवल राष्ट्र के लिए जीना और उसी के लिए खप जाना ही जिनका संकल्प था। ऐसे ही निस्पृह, समर्पित और तेजस्वी व्यक्तित्व थे श्री उदय प्रकाश गुप्त। उनका जीवन किसी साधारण व्यक्ति का जीवन-वृत्त नहीं, बल्कि त्याग, तप, राष्ट्रभक्ति और संगठन-साधना का प्रेरक आख्यान है।
बाल्यकाल में ही जागी राष्ट्रभक्ति की ज्वालाः 22 मार्च 1917 को उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर जनपद के सौहरखा ग्राम में जन्मे उदय प्रकाश गुप्त का जीवन आरंभ से ही संघषों से परिचित रहा। मात्र साढ़े तीन वर्ष की आयु में मातृछाया सिर से उठ गई, किन्तु इस अभाव ने उनके व्यक्तित्व को दुर्बल नहीं, बल्कि अधिक संवेदनशील और आत्मनिर्भर बनाया। उनके पितामह आर्यसमाज के प्रभाव से ओतप्रोत थे और परिवार शिक्षा तथा संस्कारों की समृद्ध परंपरा वाला था। बालक उदय को पुस्तकों से विलक्षण प्रेम था। जो पुस्तक हाथ में आती, उसे पूरा पढ़े बिना चैन नहीं पड़ता। यही अध्ययनशीलता उनके मन में पराधीन भारत की वेदना और स्वतंत्रता की आकांक्षा का बीज बोती चली गई। किशोरावस्था में ही उन्होंने अपने साथियों के साथ 'रेड बेल्ट ग्रुप' नामक बाल क्रांतिकारी संगठन बना लिया। यह उस ज्वाला की पहली चिंगारी थी जो आगे चलकर राष्ट्रकार्य की अखंड अग्नि बन गई।
क्रांतिकारी चेतना और निर्भीक व्यक्तित्वः मेधावी, चिंतनशील और असाधारण संगठन क्षमता से सम्पन्न उदय प्रकाश अपने मित्रों में 'भाईसाहब' और गुरुओं में 'प्रताप' के नाम से प्रसिद्ध थे। स्वतंत्रता की चाह उनके भीतर इतनी प्रबल थी कि वे क्रांतिकारियों और कांग्रेसजनों दोनों के विश्वसनीय सहयोगी बन गए। गुप्त संदेशों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाना, जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में भी निर्भय बने रहना और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानना उनके स्वभाव का अंग था। कविवर बलवीर सिंह 'रंग' की यह पंक्ति 'करो किसी भी तरह मातु को बन्धन मुक्त करो' उनके जीवन का मानो मंत्र बन गई। वैचारिक मतभेदों के बावजूद वे हर उस प्रयास के साथ खड़े रहे जिसमें भारत माता की मुक्ति का स्वप्न दिखाई देता था।
संघ से परिचय जीवन को मिला लक्ष्यः कुछ समय तक ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन से जुड़े रहने के बाद जब उनका परिचय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ, तो उन्हें लगा कि जिस राष्ट्रनिर्माण की कल्पना वे अपने मन में संजोए हुए हैं, उसे साकार करने का सबसे उपयुक्त माध्यम यही है। संघ के प्रथम, द्वितीय और तृतीय तीनों प्रशिक्षण वर्ग पूर्ण कर वे प्रचारक बने और एटा जिले का दायित्व संभाला। उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों को उन्होंने संघ कार्य से जोड़ा। जनसंघ के भावी अध्यक्ष रहे पीतांबर दास और बच्छराज व्यास जैसे व्यक्तित्वों को संघ से जोड़ने का श्रेय भी उन्हें प्राप्त है। एटा, मथुरा, बरेली और दिल्ली में उन्होंने संगठन को मजबूत आधार प्रदान किया। शाखाओं में वे स्वयं शस्त्र संचालन का प्रशिक्षण देते थे और युवाओं में आत्मविश्वास तथा अनुशासन का संचार करते थे।
दीनदयाल, वसंतराव और संगठन साधना के संस्मरणः जिस समय पंडित दीनदयाल उपाध्याय पीलीभीत में प्रचारक थे, उसी कालखंड में उदय प्रकाश जी बरेली के प्रचारक थे। यह वह समय था जब संघ के कार्यकर्ता सुविधाओं से नहीं, संकल्पों से चलते थे। वरिष्ठ प्रचारक वसंतराव ओक उन्हें अपना अनन्य सहयोगी मानते थे और महत्वपूर्ण योजनाओं में सदैव साथ रखते थे। यह विश्वास उनकी कार्यकुशलता और संगठनात्मक क्षमता का प्रमाण था। उनके संपकों का दायरा इतना व्यापक था कि बाद के वर्षों में अनेक प्रमुख व्यक्तित्व उनसे जुड़े रहे। राष्ट्रीय जीवन के अनेक महत्वपूर्ण अध्यायों के वे साक्षी भी थे और सहभागी भी।
जनसंघ, मजदूर संघ और साहित्य सेवा
उदय प्रकाश गुप्त केवल संगठनकर्ता ही नहीं, एक गंभीर वैचारिक कर्मयोगी भी थे। भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में उनकी गणना होती है। जनसंघ का संविधान जहाँ मौलिचन्द्र शर्मा ने लिखा, वहीं उसके संपादन का महत्वपूर्ण कार्य उदय प्रकाश जी ने किया। भारतीय मजदूर संघ की स्थापना के बाद उन्होंने दिल्ली में मजदूर संघ को संगठित और सुदृढ़ बनाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। कुछ समय तक 'ऑर्गनाइजर' के संपादकीय विभाग में भी कार्य किया। साहित्य के प्रति उनके अनुराग ने उन्हें भारतीय साहित्यकार संघ की स्थापना की प्रेरणा दी। इस प्रकार वे संगठन, विचार और साहित्य, तीनों
क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय रहे।
न पद चाहा, न यश, केवल कर्म को बनाया अपना धर्म उदय प्रकाश गुप्त का जीवन हमें बताता है कि राष्ट्र निर्माण केवल भाषणों से नहीं, बल्कि मौन तपस्या से होता है।उन्होंने न पद चाहा, न यशः उन्होंने केवल कर्म को अपना धर्म बनाया। उनके द्वारा प्रशिक्षित स्वयंसेवक देश के अनेक भागों में में संगठन और समाज जीवन के स्तंभ बने। उनका जीवन आज भी यह संदेश देता है कि जब व्यक्ति स्वयं को किसी महान उद्देश्य के लिए समर्पित कर देता 1 है. है, तब उसका नाम इतिहास के पन्नों में ही नहीं, पीढ़ियों की स्मृतियों में भी अमर हो जाता है।
त्याग का वह अद्भुत प्रसंग
महात्मा गांधी की हत्या के बाद जब व्यापक गिरफ्तारियाँ हुई, तब दिल्ली संघ कार्यालय से उदय प्रकाश जी को भी गिरफ्तार किया गया. गिरफ्तीर के समय उनकी कुल कुल संपति थी - 1- एक धोती, एक कुर्ता, एक तौलिया, कच्छा-बनियान, जेब में रखा एक पेन और मात्र दो रुपये बारह आने। छह माह से अधिक समय जेल में बिताने के बाद जब वे मुक्त हुए, तो यही सामान उन्हें वापस मिला। यह प्रसंग केवल एक व्यक्ति की निर्धनता का नहीं, बल्कि उस युग के प्रचारकों के अद्भुत त्याग का प्रमाण है। जिनके पास अपना घर नहीं, भोजन का निश्चित स्थान नहीं, भविष्य की कोई चिंता नहीं, किन्तु राष्ट्रकार्य के प्रति अटूट निष्ठा थी।