पितृपक्ष के इस पावन अवसर पर, जब हम अपने पूजनीय पूर्वजों और वैचारिक मार्गदर्शकों का स्मरण कर उन्हें तर्पण अर्पित करते हैं, तब माँ भारती के अनन्य उपासक और परम कर्मयोगी श्रद्धेय मोरोपंत जी (मोरेश्वर नीलकंठ पिंगले) का स्मरण स्वतः ही मन को अपार श्रद्धा और भावुकता से भर देता है।
30 अक्टूबर 1919 को जबलपुर के एक साधारण परिवार में जन्मे मोरोपंत जी ने बाल्यावस्था में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जी के पावन सान्निध्य में आकर राष्ट्र-साधना का व्रत ले लिया था। नागपुर के मॉरिस कॉलेज से उच्च शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात् 1941 में उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन का त्याग कर प्रचारक के रूप में माँ भारती की सेवा का जो संकल्प लिया, उसे जीवन की अंतिम सांस तक 65 वर्षों तक पूर्ण निष्ठा से निभाया।
खण्डवा से आरंभ हुई उनकी यह साधना मध्य भारत, महाराष्ट्र और पूरे देश में संगठन के विविध अखिल भारतीय दायित्वों को संभालते हुए निरंतर प्रखर होती गई। वे केवल एक महान संगठक ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और अस्मिता के सजग प्रहरी थे। छत्रपति शिवाजी महाराज के 300वें राज्याभिषेक का भव्य आयोजन हो, नागपुर का पावन 'स्मृति-मंदिर' निर्माण हो, अथवा आपातकाल के घनघोर अंधेरे में भूमिगत रहकर लोकतंत्र की रक्षा का संघर्ष हर मोर्चे पर उनका नेतृत्व अतुलनीय रहा।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए उनके द्वारा चलाई गई 'एकात्मता यात्रा' और लुप्त हुई वैदिक सरस्वती नदी की खोज हेतु किया गया ऐतिहासिक शोध अभियान भारतीय इतिहास को एक नई दिशा दे गया। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के मुख्य रणनीतिकार के रूप में श्रीराम शिला पूजन और शिलान्यास जैसे पावन आयोजनों का मार्गदर्शन कर उन्होंने संपूर्ण भारतवर्ष को भक्ति और राष्ट्रीयता के एक अटूट सूत्र में पिरो दिया।
21 सितंबर 2003 को नागपुर की पावन भूमि पर मोरोपंत जी का भौतिक शरीर भले ही शांत हो गया, किंतु उनका त्याग, उनकी दूरदर्शिता और राष्ट्र-साधना की अमर ज्योति आज भी हम सभी का मार्गदर्शन कर रही है।
इस पवित्र पितृपक्ष में, माँ भारती के इस महान सपूत, राष्ट्र-शिल्पी और हमारे वैचारिक पितृ-तुल्य श्रद्धेय मोरोपंत जी पिंगले के चरणों में हम कोटि-कोटि नमन करते हुए अपनी अश्रुपूरित और भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
॥ ॐ शांति: शांति: शांति: ॥