रहा सितंबर का महीना है, जो वर्ष 1893 में और भी अधिक महत्वपूर्ण बन गया था। यह स्वयं भारत के लिए एक निर्णायक मोड़ था, जब 30 वर्षीय एक युवा संन्यासी, जो आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के नाम से प्रसिद्ध हुए, ने 11 सितंबर 1893 को विश्व धर्म संसद के मंच से हिंदू धर्म और भारतवर्ष की गौरवगाथा का उद्घोष किया।
विवेकानंद की पश्चिम की यात्रा कोई साधारण यात्रा नहीं थी। बाद में ऋषि अरविंद ने भी इस तथ्य को महसूस किया। 26 जून 1909 को 'कर्मयोगिन' में प्रकाशित अपने लेख 'भारत की जागृत आत्मा' में उन्होंने लिखा कि जब कलकत्ता के शिक्षित युवाओं ने एक अशिक्षित हिंदू संन्यासी के चरणों में स्वयं को नत किया, जो आत्मप्रकाशित, आध्यात्मिक और रहस्यदर्शी था तथा जिस पर विदेशी विचार और शिक्षा की कोई छाप नहीं थी, तभी मानो संघर्ष जीत लिया गया। उनके अनुसार विवेकानंद का पश्चिम की ओर प्रस्थान इस बात का पहला स्पष्ट संकेत था कि भारत केवल जीवित रहने के लिए नहीं, बल्कि विश्व को अपनी आध्यात्मिक शक्ति से प्रभावित करने के लिए जाग उठा है। आज के समय में भी यह भाषण भारत और पूरी दुनिया के लिए आवश्यक है। जो लोग स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए संघर्ष करने का दावा करते हैं और स्वयं को 'जेन जी' कहते हैं, उन्हें यह सीखना चाहिए कि जेन जी का चरित्र और आदर्श क्या होने चाहिए। मुझे नहीं लगता कि 30 वर्ष की आयु में ही दुनिया को अपनी प्रतिभा और विचारों से प्रभावित कर देने वाले व्यक्ति का इससे बड़ा कोई उदाहरण हो सकता है। स्वामी विवेकानंद ने अपने प्रथम भाषण में वास्तव में जो संदेश दिया, वह भारत और उसकी आत्मा हिंदू धर्म के सार से कम नहीं था। लंबे समय तक पराधीनता के कारण भारत ने विश्व मंच पर उपेक्षा और अपमान सहा था। लेकिन यही भारत के पुनरुत्थान की शुरुआत भी थी। हालांकि, इस यात्रा में स्वयं स्वामीजी को अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ा।
शिकागो पहुंचने के बाद स्वामीजी को पता चला कि औपचारिक प्रमाण-पत्र के बिना वे सम्मेलन में भाग नहीं ले सकते। शिकागो में जीवन-यापन का खर्च बहुत अधिक होने के कारण वे बोस्टन चले गए। वहां 25 अगस्त को उनकी मुलाकात हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट से हुई। पहली ही बातचीत में प्रोफेसर राइट स्वामीजी के व्यापक ज्ञान और बौद्धिक प्रतिभा से अत्यंत प्रभावित हुए। जब स्वामीजी ने उन्हें बताया कि सम्मेलन में भाग लेने के लिए आवश्यक प्रमाण-पत्र उनके पास नहीं है, तो प्रोफेसर राइट ने कहा कि आपसे आपके प्रमाण-पत्र मांगना तो सूर्य से उसके चमकने का अधिकार पूछने जैसा है। इसके बाद उन्होंने स्वयं स्वामीजी के लिए आवश्यक प्रमाण-पत्र उपलब्ध कराने का दायित्व उठाया। अपनी अनुशंसा में उन्होंने लिखा कि यह व्यक्ति हमारे सभी विद्वान प्रोफेसरों को एक साथ रख देने पर भी उनसे अधिक विद्वान है।
11 सितंबर 1893 को स्वागत भाषण के उत्तर में स्वामी विवेकानंद ने कहा, 'मुझे उस धर्म से संबंधित होने पर गर्व है, जिसने संसार को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति दोनों की शिक्षा दी है। हम केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में विश्वास नहीं करते, बल्कि सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे उस राष्ट्र से संबंधित होने पर गर्व है, जिसने संसार के सभी धर्मों और सभी देशों से आए पीड़ितों तथा शरणार्थियों को आश्रय दिया है।'
यही वह कारण है कि हिंदू धर्म आज भी जीवित है, केवल मान्यताओं की एक व्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि अपनी अंतर्निहित स्वीकृति, सह-अस्तित्व और सभी मार्गों के प्रति सम्मान की भावना के कारण। स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में जो बात कही, वह केवल शब्दों में व्यक्त कोई आदर्श नहीं था; यह वह सिद्धांत था, जिसका हिंदू समाज सदियों से आचरण करता आया है। इसका एक प्रभावशाली उदाहरण कुमारी पूजा की परंपरा में दिखाई देता है, जिसमें छोटी बालिकाओं की दिव्य माता के स्वरूप के रूप में पूजा की जाती है। इसके पीछे यह मूल सिद्धांत है कि सामाजिक और धार्मिक भेदों से परे प्रत्येक मनुष्य में दिव्यता को पहचाना जा सकता है। ऐसी परंपराएं हिंदू धर्म के व्यापक सभ्यतागत लोकाचार को प्रतिबिंबित करती हैं, जो केवल स्वीकृति का उपदेश नहीं देता, बल्कि उसे व्यवहार में उतारने का प्रयास करता है। स्वामी विवेकानंद ने विदेशी धरती पर खड़े होकर ऐसे धर्म की बात की, जहां ईश्वर केवल किसी विशेष स्थान या वर्ग में नहीं, बल्कि सामान्य मनुष्य में भी विद्यमान है।
स्वामीजी का भाषण सुनने के बाद प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखिका एनी बेसेंट ने उनका वर्णन भारत के सूर्य के समान तेजस्वी व्यक्तित्व के रूप में किया। उन्होंने लिखा कि पीले और नारंगी वस्त्रों में शिकागो के गंभीर वातावरण के बीच स्वामीजी ऐसे दिखाई दे रहे थे, जैसे भारत का सूर्य चमक रहा हो। उनका सिंह के समान मुख, पैनी आंखें, गतिशील होंठ और तीव्र, सहज गति वाला व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली था। नोबेल पुरस्कार विजेता और प्रसिद्ध फ्रांसीसी उपन्यासकार रोमा रोलां ने कहा कि स्वामी विवेकानंद के शब्दों को सुनने के बाद, यदि कोई लेटा हो तो उठकर बैठ जाता है; यदि बैठा हो तो खड़ा हो जाता है और यदि खड़ा हो तो दौड़ पड़ता है।
15 सितंबर को शिकागो के 'संडे हेराल्ड' में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, स्वामीजी के भाषण के बाद मानव जाति के बीच भाईचारे को मानवता के सबसे वांछनीय लक्ष्यों में से एक माना गया। जिस प्रकार स्वामीजी का संदेश भारत की मौलिकता और हिंदुत्व को समझने के लिए महत्वपूर्ण था, उसी प्रकार उनके शब्द विश्व राजनीति की एक व्यापक रणनीति की ओर भी संकेत करते हैं। आज विश्व राजनीति की अशांत परिस्थितियों में, जब दुनिया के लगभग हर कोने में संघर्ष दिखाई दे रहा है, उनके शब्दों का इस संदर्भ में अनुसरण किया जाना चाहिए।
हम सामान्यतः शिकागो में विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के प्रथम भाषण पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। लेकिन उनके अंतिम भाषण की समापन पंक्तियां भी उतनी ही, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण थीं। उन्होंने कहा, 'इन प्रमाणों के सामने यदि कोई अपने धर्म के अकेले जीवित रहने और दूसरे धर्मों के विनाश का स्वप्न देखता है, तो मुझे अपने हृदय की गहराइयों से उस पर दया आती है। मैं उसे बताना चाहता हूं कि प्रत्येक धर्म के ध्वज पर शीघ्र ही, विरोध के बावजूद, लिखा होगा—'संघर्ष नहीं, सहायता', 'विनाश नहीं, आत्मसात', 'विरोध नहीं, समन्वय और शांति।''
आज हम विभिन्न देशों में उग्रवाद के अनेक रूप देख रहे हैं। लेकिन कहीं न कहीं हम उन मूल सिद्धांतों को भूल गए हैं, जो दुनिया में स्थायी शांति स्थापित करने में हमारी सहायता कर सकते हैं—वे सिद्धांत, जिन्हें आज से नहीं, बल्कि 133 वर्ष पहले, 27 सितंबर 1893 को शिकागो में विश्व धर्म संसद के मंच से मात्र 30 वर्ष की आयु के एक युवा संन्यासी ने दुनिया के सामने रखा था।

दिगंत चक्रवर्ती
(लेखक जागरण जोश अवॉर्डी युवा स्तंभकार हैं)