धर्म हमारे डीएनए में, रिलिजन बांधता है, धर्म मुक्त करता है
हम अपनी भाषा, धर्म और उसके मूल अर्थ को भूल गए हैं। 'रिलिजन' शब्द अंग्रेजी के 'रिलिजियो' से आया है, जिसका अर्थ बांधना या एक अनुशासन में रखना होता है, लेकिन 'धर्म' शब्द की उत्पत्ति 'धृ' धातु से हुई है, जिसका अर्थ 'धारणा करना' है। धर्म मनुष्य को बांधता नहीं, बल्कि उसे मुक्त करता है और उन्नत बनाता है। भारतीय दृष्टिकोण में धर्मनिरपेक्ष (सेकुलर) शब्द ही नहीं है, क्योंकि धर्म कभी निरपेक्ष नहीं होता। धर्म रिलिजन से ऊपर होता है, इसीलिए भारत को धर्मप्राण राष्ट्र कहा गया है, क्योंकि धर्म हम भारतीयों के डीएनए में है।
यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कही। वे यहां शुक्रवार को 'सेवाज्ञ संस्थानम्' के राष्ट्रीय उपक्रम 'युवा धर्म संसद-2026 अवन्तिका' के गीता भवन में आयोजित तीन दिवसीय आयोजन के शुभारंभ पर युवाओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने इसके पूर्व युवा धर्म संसद का विधिवत उद्घाटन भी किया। इस अवसर पर सेवाज्ञ संस्थानम् के संरक्षक आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण महाराज, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी तथा सेवाज्ञ संस्थानम् के राष्ट्रीय अध्यक्ष आशीष कुमार आशु सहित देशभर से 1700 से अधिक युवा व सैकड़ों विद्वान उपस्थित रहे।
धर्म समझने से पहले मन का खाली होना जरूरी
डॉ. भागवत ने कहा, ऐसा मानना है कि धर्म का विचार युवा करते हैं, यह बात आजकल दिखाई व सुनाई नहीं देती है। धर्म की बात यानी बुढ़ापे की बात, लेकिन ऐसा नहीं है। धर्म अस्तित्व के प्रारंभ से अंत तक जाता है, उसी अनुसार सारी बातें चलती हैं। दुनिया में भी ऐसी बातें चलती हैं। मनुष्य अहंकार में रहता है। उसे लगता है, सब जगह मेरी चलती है। यह उसकी गलतफहमी है, ऐसा होता नहीं है।धर्म ऐसी कल्पना है, उसके अन्वेषण में सारा जीवन चलाया जाए, तब भी कम है। धर्म समझने से पहले मन का खाली होना जरूरी है। मन में यदि पहले से कल्पना बनी हो, तो समझाने का कोई लाभ नहीं। धर्म को समझना है, तो हम लोगों को पहले जो बातें मन में बैठी हैं, उन्हें भुलाना होगा। मेरे लिए मेरा धर्म जन्म से निश्चित है और मृत्यु तक रहेगा। धर्म सभी सुख का कारण है।
धर्म का त्याग कभी न करें
डॉ. भागवत ने कहा कि माता-पिता, मित्र, सखा, ये संबंध चलते रहेंगे। पहले भी थे, आज भी हैं। ऐसे जीवन की यात्रा में दुःख व सुख के क्षण होते हैं। इनके चक्कर में जानकार नहीं फंसते। अर्थ, काम, मोक्ष धर्म से प्राप्त होते हैं, वही सुख देगा और वही मोक्ष देगा। अपनी इच्छा की पूर्ति, भय, लोभ, प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग न करें, धर्म नित्य रहता है।
चार स्तंभों पर टिका धर्म - सरसंघचालक ने
धर्म के चार आधार बताते हुए कहा कि सत्य, करुणा, शुचिता और तप जीवन को धर्ममय बनाते हैं। मनुष्य को प्रकृति और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। उन्होंने कहा कि मानव की बुद्धि उसे सृष्टि में विशेष भूमिका देती है, इसलिए प्रकृति की रक्षा और कमजोरों का संरक्षण उसका दायित्व भी है। प्रकृति को क्षति पहुंचाना अधर्म है।
धर्म में परोपकार की भावना
डॉ. भागवत ने कहा कि मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अर्जन करना चाहिए, लेकिन दूसरों को नुकसान पहुंचाकर नहीं। आवश्यकता से अधिक प्राप्त संसाधनों को समाज के हित में लगाना धर्म का महत्वपूर्ण स्वरूप है। धर्मशालाएं, चिकित्सालय और सेवा के अन्य कार्य इसी भावना से विकसित हुए। उन्होंने कहा कि व्यापार में भी केवल धनार्जन नहीं, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक उत्तरदायित्व का भाव होना चाहिए।
धर्म जीवन का आधार, युवा राष्ट्र की आशा : स्वामी अवधेशानंद गिरि
युवा धर्म के प्रथम व्याख्यान सत्र 'धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा एवं चारित्रिक उत्तरदायित्व' में धर्म, आत्मबोध, भारतीय संस्कृति और युवा सामर्थ्य को लेकर विमर्श हुआ। सत्र में आचार्य महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी अवधेशानंद गिरिजी महाराज तथा प्रसिद्ध पटकथा लेखक एवं गीतकार गा एवं मनोज मुंतशिर ने युवाओं को धर्म को केवल जानने तक सीमित न रखते हुए उसे जीवन के आचरण में उतारने का संदेश दिया। सत्र में पूज्य आचार्य श्री मिथिलेशनन्दिनीशरणजी महाराज, प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ीजी एवं मातृश्री स्मृति अनंतलक्ष्मीजी ने भी अपने विचार रखे। सत्र का संचालन आशुतोषजी ने किया।
युवा केवल आयु से नहीं, चेतना से भारतीय
आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि केवल कम आयु का होना किसी को भारतीय युवा नहीं बनाता। युवा वह है, जिसकी चेतना में भारत जीवित हो और जिसकी दृष्टि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी हो। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता ऐसे युवाओं के निर्माण की है, जो आधुनिकता को समझते हुए अपनी भारतीय पहचान, परंपरा और जीवन-दृष्टि से भी परिचित हों। भारतीय चेतना से संपन्न युवा ही देश के भविष्य को सही दिशा दे सकता है।
इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अ.भा. सह बौद्धिक प्रमुख दीपक विस्पुते, मध्य क्षेत्र प्रचारक स्वप्निल कुलकर्णी, मालवा प्रांत संघचालक डॉ. प्रकाश शास्त्री, मालवा प्रांत प्रचारक राजमोहनजी, मालवा प्रांत कार्यवाह विनीत नवाथे, मालवा प्रांत सहकार्यवाह श्रीनाथ गुप्ता, मालवा प्रांत सहप्रचार प्रमुख पवन तिवारी, हिंदी ग्रंथ अकादमी के निदेशक अशोक कड़ेल, सांसद अनिल फिरोजिया, यूडीआई अध्यक्ष डॉ. रवि सोलंकी, विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा एवं संघ के विभिन्न पदाधिकारी, देशभर से आए 1700 से अधिक युवा, 300 विद्वान तथा गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।
समापन आज, मुख्यमंत्री होंगे शामिल
शनिवार, 19 सितंबर को तीन दिवसीय आयोजन का समापन दिवस रहेगा।
प्रातः 10 से दोपहर 12 बजे तक: व्याख्यान सत्र।
विषय: ऋषि एवं कृषि संस्कृति के मध्य भारत का आजीविका विचार।
वक्ता: आचार्य मिथिलेश नंदिनीशरण, पद्मभूषण रामबहादुर राय, डॉ. इंदुमति काटदरे एवं प्रो. आनंद रंगनाथन।
दोपहर 1.30 से 3.30 बजे तक: संवाद सत्र।
विषय: मनुष्य निर्माण में आस्था का महत्व तथा धर्म स्थलों की भूमिका।
वक्ता: प्रो. सच्चिदानंद मिश्र, डॉ. बलराम शुक्ल, अमृत अभिजात एवं श्रीराम तिवारी।
समापन सत्र
अपराह्न 4 से 6 बजे तक।
अतिथि: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, आचार्य मिथिलेश नंदिनीशरण, श्रीराम तिवारी, माधव कुमार एवं कार्यक्रम संयोजक।
सांस्कृतिक कार्यक्रम: सायं 6.30 से 7.30 बजे तक।