ट्रम्प की शुल्क नीति का विश्लेषण

ट्रम्प की शुल्क नीति, अमेरिका पर भारी

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प की शुल्क नीति को खारिज कर दिया, जिससे भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में महत्वपूर्ण उलटफेर हुआ है।

By : नरेंद्र कुमार
ट्रम्प की शुल्क नीति, अमेरिका पर भारी

इस सप्ताह अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फरवरी 2026 के फैसले ने, जिसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के व्यापक टैरिफ कार्यक्रम को खारिज कर दिया गया, भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक महत्वपूर्ण कानूनी और आर्थिक उलटफेर पैदा किया है। अदालत ने फैसला सुनाया कि अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियाँ अधिनियम (IEEPA) राष्ट्रपति को शुल्क लगाने का अधिकार नहीं देता और इस बात की पुनः पुष्टि की कि संविधान सीमा शुल्क और विदेशी वाणिज्य को विनियमित करने की शक्ति मुख्य रूप से कांग्रेस को प्रदान करता है। इसके जवाब में, प्रशासन ने अमान्य किए गए देश-विशिष्ट शुल्कों को एक अस्थायी, सर्वव्यापी 10 प्रतिशत टैरिफ से बदल दिया, जो 24 फरवरी 2026 से भारतीय वस्तुओं पर अधिकतम 150 दिनों की अवधि के लिए लागू होगा।

हालाँकि, पहले के दंडात्मक स्तरों की तुलना में शुल्कों में कमी भारतीय निर्यातकों को अस्थायी राहत प्रदान करती है, लेकिन यह घटना अमेरिकी व्यापार नीति की एक गहरी समस्या को उजागर करती है। टैरिफ को बातचीत के बजाय दबाव के एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करके, ट्रम्प अपने ही उपभोक्ताओं, उद्योगों, रणनीतिक हितों और कूटनीतिक प्रभाव पर भारी लागत थोपने का जोखिम उठा रहे हैं। इसलिए, भारत के प्रति दंडात्मक टैरिफ नीति दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण उभरती शक्तियों में से एक पर दबाव डालने की कोशिश में अमेरिका के लिए भारी नुकसान का कारण बन सकती है।

दंडात्मक शुल्क अमेरिका को कैसे नुकसान पहुँचा सकते हैं:पहली लागत अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ेगी। शुल्क कानूनी रूप से आयातकों द्वारा चुकाए जाते हैं, न कि विदेशी सरकारों द्वारा। भारतीय फार्मास्यूटिकल्स, परिधान, आभूषण, इंजीनियरिंग सामान, सूचना प्रौद्योगिकी हार्डवेयर और ऑटो कंपोनेंट्स का आयात करने वाली अमेरिकी कंपनियाँ शुरू में अतिरिक्त लागत वहन करेंगी। फिर वे या तो अपने मुनाफे के मार्जिन को कम करेंगी, आपूर्ति शृंखलाओं को स्थानांतरित करेंगी या कीमतें बढ़ाकर यह बोझ अमेरिकी उपभोक्ताओं पर डालेंगी। भारत उन क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहाँ अमेरिका आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत तेजी से विकसित नहीं कर सकता।

भारतीय जेनेरिक दवाएँ और फार्मास्यूटिकल सामग्री अमेरिकी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में किफायती कीमतों और आपूर्ति की स्थिरता बनाए रखने में योगदान देती हैं। ऐसे उत्पादों पर व्यापक शुल्क लगाने से अस्पतालों, बीमाकर्ताओं और मरीजों की खरीद लागत बढ़ सकती है। इसके परिणाम विशेष रूप से कम आय वाले अमेरिकियों के लिए गंभीर हो सकते हैं, जो सस्ती जेनेरिक दवाओं पर निर्भर हैं।

दंडात्मक टैरिफ अमेरिकी निर्माताओं को भी नुकसान पहुँचा सकते हैं। भारतीय निर्यात अक्सर प्रत्यक्ष उपभोक्ता उत्पादों के बजाय मध्यवर्ती इनपुट के रूप में इस्तेमाल होते हैं। इंजीनियरिंग घटक, रसायन, सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण, वस्त्र और ऑटो पार्ट्स अमेरिकी उत्पादन नेटवर्क का हिस्सा हैं। इन इनपुट पर टैरिफ लगाने से अमेरिका में निर्मित वस्तुओं की लागत बढ़ती है और घरेलू तथा विदेशी, दोनों बाजारों में अमेरिकी कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मकता कम होती है।

यह नीति अमेरिकी मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्यों को भी कमजोर करेगी। ऐसे समय में, जब अमेरिकी नीति-निर्माता जीवन-यापन की लागत को लेकर चिंतित हैं, टैरिफ खपत पर कर के रूप में काम करते हैं। वे सीमा शुल्क से राजस्व उत्पन्न कर सकते हैं, लेकिन यह राजस्व आपूर्ति शृंखला में लागत बढ़ाकर प्राप्त किया जाता है। परिणामस्वरूप, कीमतें बढ़ सकती हैं, उपभोक्ता माँग कमजोर हो सकती है और ब्याज दरों पर दबाव पड़ सकता है।

भारत के रणनीतिक और आर्थिक विकल्प:भारत ने ट्रम्प की शुल्क नीति का जवाब सुविचारित विविधीकरण के माध्यम से देना शुरू कर दिया है। उसने यूरोपीय संघ, आसियान, खाड़ी देशों, अफ्रीका और अन्य हिंद-प्रशांत साझेदारों के साथ व्यापार का विस्तार करना शुरू कर दिया है। वह घरेलू उत्पादन को भी बढ़ावा दे रहा है, जहाँ संभव हो, रुपये में लेन-देन को प्रोत्साहित कर रहा है और भारतीय विकल्पों का समर्थन करने के लिए सार्वजनिक खरीद का उपयोग कर रहा है। साथ ही, रणनीतिक रूप से, भारत सरकार ने ऐसे समझौते से इनकार कर दिया है, जिसमें केवल अस्थायी शुल्क राहत पाने के लिए संवेदनशील कृषि या आजीविका संबंधी हितों का बलिदान करना पड़े।

नुकसान केवल वाणिज्यिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी हो सकता है। भारत अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति, समुद्री सुरक्षा सहयोग, आपूर्ति शृंखला विविधीकरण और चीन के प्रभाव को संतुलित करने के प्रयासों में केंद्रीय भूमिका निभाता है। दबाव डालने वाली शुल्क नीति एक दुर्भाग्यपूर्ण संकेत देती है: वाशिंगटन रणनीतिक साझेदारी की अपेक्षा करता है, जबकि साथ ही भारत को एक आर्थिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है।

भारत की विदेश नीति परंपरागत रूप से रणनीतिक स्वायत्तता से निर्देशित रही है। अत्यधिक अमेरिकी दबाव भारत को रूस, यूरोप, खाड़ी देशों और व्यापक वैश्विक दक्षिण सहित वैकल्पिक साझेदारों के साथ सहयोग गहरा करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। इससे प्रौद्योगिकी नियंत्रण, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय कूटनीति के मामलों में अमेरिका के साथ तालमेल बिठाने की भारत की इच्छा भी कम हो सकती है।

टैरिफ प्रकरण अमेरिकी विश्वसनीयता को और कमजोर करता है। यदि कार्यकारी आदेशों के माध्यम से लगाए गए टैरिफ को बदलते कानूनी आधारों पर घोषित, वापस लिया और प्रतिस्थापित किया जा सकता है, तो विदेशी सरकारें अमेरिकी प्रतिबद्धताओं को राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदलने योग्य मानेंगी। सुप्रीम कोर्ट का फैसला कानूनी अनुशासन बहाल कर सकता है, लेकिन टैरिफ की लगातार धमकियाँ अमेरिकी नेतृत्व में विश्वास को कम कर सकती हैं।

अमेरिका का सबसे बड़ा नुकसान:इस सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने राष्ट्रपति की टैरिफ लगाने की शक्ति पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सीमा स्थापित की है, जबकि अस्थायी 10 प्रतिशत शुल्क भारतीय निर्यातकों को पहले से अधिक गंभीर देश-विशिष्ट दंडों से राहत प्रदान करता है। फिर भी, बड़ा सबक स्पष्ट है: दंडात्मक शुल्क एक ऐसा कुंद हथियार है, जो उसे इस्तेमाल करने वाले देश को भी नुकसान पहुँचा सकता है।

भारतीय आयात पर कर लगाकर अमेरिका अपने उपभोक्ताओं के लिए ऊँची कीमतों, अपने निर्माताओं के लिए बढ़ी हुई लागतों, फार्मास्यूटिकल्स और प्रौद्योगिकी की आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान तथा एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण साझेदारी में गिरावट का जोखिम उठा रहा है। भारत भले ही अभी कई चुनौतियों का सामना कर रहा हो, लेकिन उसका बढ़ता बाजार, विविध कूटनीति और बढ़ता आर्थिक महत्व उसे दबाव का विरोध करने की गुंजाइश देते हैं।

एक टिकाऊ भारत-अमेरिका व्यापार संबंध बातचीत, पारस्परिकता और रणनीतिक विश्वास पर आधारित होना चाहिए, न कि शुल्क की धमकियों पर। यदि ट्रम्प अब भी साझेदारी के बजाय दंड का विकल्प चुनते हैं, तो उन्हें जल्द ही पता चलेगा कि उनकी शुल्क नीति का मुख्य शिकार भारत नहीं, बल्कि स्वयं अमेरिका है।

प्रो. अंशु जोशी

(लेखिका जेएनयू में प्राध्यापक हैं।)

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