RBI Hikes Repo Rate to 5.50%

RBI ने 4 साल बाद बढ़ाई रेपो रेट, 5.50% हुई; EMI पर पड़ेगा असर

The RBI has raised the repo rate by 0.25% to 5.50%, marking its first increase in four years, affecting loans and EMIs.

By : नरेंद्र कुमार
RBI ने 4 साल बाद बढ़ाई रेपो रेट, 5.50% हुई; EMI पर पड़ेगा असर

भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों को लेकर बड़ा फैसला लिया है। RBI ने करीब चार साल बाद पहली बार रेपो रेट में 0.25% की बढ़ोतरी की है। अब रेपो रेट 5.25% से बढ़कर 5.50% हो गई है।

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार, 7 अक्टूबर को मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की तीन दिन चली बैठक के बाद इस फैसले की जानकारी दी। केंद्रीय बैंक ने महंगाई को नियंत्रण में रखने और अर्थव्यवस्था में पैसे के प्रवाह को संतुलित करने के लिए ब्याज दर बढ़ाने का फैसला किया है।इस फैसले का असर आने वाले दिनों में बैंकिंग सेक्टर के साथ-साथ लोन लेने वाले ग्राहकों पर भी दिखाई दे सकता है। होम लोन, कार लोन और कुछ पर्सनल लोन की ब्याज दरें बढ़ने पर EMI का बोझ बढ़ सकता है।

रेपो रेट क्या होती है?

रेपो रेट वह ब्याज दर है, जिस पर RBI बैंकों को कम अवधि के लिए पैसा उधार देता है। बैंकिंग सिस्टम में पैसे की लागत तय करने में इसकी अहम भूमिका होती है।जब RBI रेपो रेट बढ़ाता है तो बैंकों के लिए RBI से पैसा लेना महंगा हो जाता है। इसके बाद बैंक अपनी लोन दरों में बदलाव कर सकते हैं। हालांकि, हर बैंक का असर एक जैसा नहीं होता, क्योंकि ब्याज दर तय करने में बैंक की अपनी फंडिंग कॉस्ट और लोन की शर्तें भी महत्वपूर्ण होती हैं।MPC आम तौर पर हर दो महीने में मौद्रिक नीति की समीक्षा करती है और महंगाई, आर्थिक विकास तथा घरेलू-वैश्विक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ब्याज दरों पर फैसला करती है।

RBI ने 0.25% की बढ़ोतरी क्यों की?

रेपो रेट बढ़ाने के पीछे RBI का मुख्य उद्देश्य महंगाई को नियंत्रण में रखना है। ब्याज दर बढ़ने से बैंकों के लिए कर्ज की लागत बढ़ती है और इसका असर ग्राहकों तक पहुंच सकता है।जब लोन महंगे होते हैं तो लोग घर, कार या कारोबार के लिए नया कर्ज लेने में सावधानी बरत सकते हैं। खर्च और कर्ज की मांग में कमी आने से अर्थव्यवस्था में पैसों के प्रवाह पर असर पड़ता है। इसका इस्तेमाल महंगाई के दबाव को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।यानी RBI का फैसला एक तरफ कर्ज लेने वालों के लिए चुनौती बढ़ा सकता है, लेकिन दूसरी तरफ महंगाई को लेकर केंद्रीय बैंक की चिंता को भी दिखाता है।

आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

रेपो रेट में बढ़ोतरी का सबसे सीधा असर उन ग्राहकों पर पड़ सकता है, जिनके लोन की ब्याज दर RBI के रेपो रेट से जुड़े बाहरी बेंचमार्क पर आधारित है।

होम लोन

अगर बैंक होम लोन की ब्याज दर बढ़ाते हैं तो नई दर पर लोन लेने वालों की EMI बढ़ सकती है। पहले से चल रहे फ्लोटिंग रेट होम लोन पर भी ब्याज दर बढ़ने का असर पड़ सकता है।

कार लोन

कार खरीदने के लिए लोन लेने वालों के लिए भी ब्याज दर बढ़ने से कुल कर्ज लागत बढ़ सकती है। EMI में कितना बदलाव होगा, यह लोन की रकम, अवधि और बैंक की नई ब्याज दर पर निर्भर करेगा।

पर्सनल लोन

पर्सनल लोन की ब्याज दर बढ़ने पर भी ग्राहक को ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक असर बैंक और लोन की ब्याज दर व्यवस्था पर निर्भर करेगा।

FD और जमा योजनाएं

ब्याज दर बढ़ने के माहौल में बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट और दूसरी जमा योजनाओं पर ब्याज दरों में बदलाव कर सकते हैं। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि हर बैंक तुरंत और समान अनुपात में दर बढ़ाए।

2026 में अब तक क्या हुआ?

2026 में अक्टूबर से पहले RBI की तीन MPC बैठकें हो चुकी थीं। अप्रैल, जून और अगस्त में हुई इन बैठकों में रेपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखा गया था।यानी लगातार तीन बैठकों में ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं किया गया। अब अक्टूबर की बैठक में 0.25% की बढ़ोतरी के बाद रेपो रेट 5.50% हो गई है।यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि करीब चार साल बाद RBI ने पहली बार रेपो रेट बढ़ाने का फैसला किया है।

क्या आगे रेपो रेट फिर घट सकती है?

फिलहाल अगली कटौती की कोई निश्चित समयसीमा नहीं है। RBI हर मॉनिटरी पॉलिसी बैठक में महंगाई, आर्थिक विकास, घरेलू परिस्थितियों और वैश्विक घटनाक्रम की समीक्षा करता है।अगर आने वाले समय में महंगाई लगातार नियंत्रण में रहती है और आर्थिक परिस्थितियां ब्याज दरों में राहत की गुंजाइश बनाती हैं, तो RBI आगे चलकर रेपो रेट में कटौती पर विचार कर सकता है।लेकिन अभी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 5.50% की नई रेपो रेट का असर बैंकिंग सिस्टम और ग्राहकों की लोन दरों पर किस तरह दिखाई देता है।

रेपो सिस्टम की शुरुआत कैसे हुई?

रेपो सिस्टम का इतिहास अमेरिका के वित्तीय बाजार से जुड़ा है। 1917 के आसपास प्रथम विश्व युद्ध के दौर में इसके शुरुआती स्वरूप का विकास हुआ। समय के साथ इस व्यवस्था में कई बदलाव हुए और इसमें शामिल संस्थाओं तथा इस्तेमाल की जाने वाली सिक्योरिटीज का दायरा भी बढ़ता गया।शुरुआत में सरकारी और वॉर बॉन्ड जैसे साधनों का इस्तेमाल होता था। बाद में ट्रेजरी सिक्योरिटीज और दूसरे वित्तीय साधन भी रेपो लेनदेन का हिस्सा बने।आज रेपो मार्केट केंद्रीय बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए शॉर्ट-टर्म फंडिंग और सिस्टम में लिक्विडिटी मैनेज करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

अब आगे किस पर रहेगी नजर?

RBI के फैसले के बाद अब बाजार की नजर बैंकों की ब्याज दरों पर होगी। खासतौर पर होम लोन, कार लोन और अन्य फ्लोटिंग रेट वाले कर्ज की दरों में कितना बदलाव होता है, यह ग्राहकों के लिए अहम रहेगा।वहीं RBI के लिए आगे महंगाई और आर्थिक गतिविधियों के आंकड़े महत्वपूर्ण होंगे। इन्हीं संकेतकों के आधार पर आने वाली MPC बैठकों में ब्याज दरों की दिशा तय होगी।

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