नई SC गाइडलाइंस रेप मामलों में

SC की नई गाइडलाइंस: रेप मामलों में 'लज्जा भंग' जैसे शब्दों से बचेंगे जज, पीड़ित-केंद्रित सुनवाई पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने रेप मामलों में संवेदनशील भाषा का उपयोग करने और पीड़ित-केंद्रित सुनवाई पर जोर देने की गाइडलाइंस जारी की हैं।

By : नरेंद्र कुमार
SC की नई गाइडलाइंस: रेप मामलों में 'लज्जा भंग' जैसे शब्दों से बचेंगे जज, पीड़ित-केंद्रित सुनवाई पर जोर

 

यौन अपराधों की सुनवाई को अधिक संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित बनाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने नई गाइडलाइंस जारी की हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि रेप और अन्य यौन अपराधों से जुड़े मामलों में फैसले लिखते समय या सुनवाई के दौरान ऐसी भाषा से बचना चाहिए, जो पीड़ित की गरिमा को ठेस पहुंचाए या सामाजिक पूर्वाग्रहों को बढ़ावा दे।

विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में जजों को 'लज्जा भंग', 'बेबस महिला', 'पवित्रता खो दी' जैसे शब्दों के इस्तेमाल से बचने और उनकी जगह 'पीड़ित (Victim)', 'सर्वाइवर (Survivor)', 'शिकायतकर्ता (Complainant)', 'शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy)' और 'यौन हमला (Sexual Assault)' जैसे तटस्थ और सम्मानजनक शब्द अपनाने की सलाह दी गई है।

125 फैसलों के अध्ययन के बाद तैयार हुई रिपोर्ट

'Judgments and Gender: Sensitivity and Compassion in Writing Judgments' शीर्षक वाली यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने तैयार की है। इसके लिए देशभर की ट्रायल कोर्ट के 125 फैसलों का अध्ययन किया गया।रिपोर्ट में पाया गया कि कई मामलों में न्यायिक भाषा और सवालों में ऐसे शब्द और दृष्टिकोण दिखाई दिए, जो पीड़ित को असहज कर सकते हैं या रूढ़िवादी सोच को बढ़ावा देते हैं।

जजों को क्या सलाह दी गई?

समिति ने कहा है कि अदालतों का ध्यान पीड़ित के चरित्र, कपड़ों या व्यवहार पर नहीं, बल्कि आरोपी के कथित कृत्य और कानून के तथ्यों पर होना चाहिए।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि

  • देर से शिकायत दर्ज होना सहमति का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
  • शरीर पर चोट के निशान न होना यौन अपराध न होने का सबूत नहीं है।
  • पीड़ित द्वारा शारीरिक प्रतिरोध न करना भी सहमति नहीं माना जा सकता।
  • अदालतों को पीड़ित के व्यवहार को लेकर बनी-बनाई धारणाओं से बचना चाहिए।

जिरह के दौरान भी संवेदनशीलता बरतने पर जोर

विशेषज्ञ समिति ने ट्रायल कोर्ट के जजों से कहा है कि वे अपमानजनक, डराने वाले या निजी जीवन में अनावश्यक दखल देने वाले सवालों को रोकें। खासतौर पर पीड़ित के यौन इतिहास, कपड़ों या निजी जीवन से जुड़े सवालों को अनुमति न दी जाए।रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सुनवाई के दौरान पीड़ित को सम्मानजनक माहौल मिलना चाहिए। इसके लिए अदालतों में बैठने की व्यवस्था, पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और जरूरत पड़ने पर गैर-जरूरी लोगों को कोर्टरूम से बाहर रखा जाए।

'हवस' और 'इज्जत' जैसे शब्दों पर भी आपत्ति

समिति ने कहा कि 'हवस', 'इज्जत', 'शर्म', 'पवित्रता', 'संकोच' जैसे शब्द पितृसत्तात्मक सोच को दर्शाते हैं और अपराध की कानूनी प्रकृति से ध्यान भटका सकते हैं। इसके बजाय फैसलों में 'यौन हिंसा', 'यौन हमला', 'शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन' जैसे कानूनी और तथ्यपरक शब्दों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

क्यों बनी यह समिति?

यह विशेषज्ञ समिति सुप्रीम कोर्ट के 10 फरवरी 2026 के उस आदेश के बाद गठित की गई थी, जिसमें यौन अपराधों और संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए न्यायिक अधिकारियों के लिए व्यवहार और भाषा संबंधी दिशानिर्देश तैयार करने को कहा गया था।यह आदेश इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेने के बाद आया था।

अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट की यह रिपोर्ट फिलहाल न्यायपालिका के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक दस्तावेज के रूप में देखी जा रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यौन अपराधों की सुनवाई के दौरान पीड़ित की गरिमा, संवैधानिक अधिकार और सम्मान सर्वोच्च प्राथमिकता बने रहें।

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