पाकिस्तान, तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया ने रक्षा उत्पादन और सैन्य क्षमताओं में सहयोग बढ़ाने के लिए बद्र समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। 21 अक्टूबर को दोहा में हुए इस समझौते के तहत चारों देश रक्षा उद्योग, तकनीकी प्रशिक्षण, संयुक्त अनुसंधान और विकास जैसे क्षेत्रों में साथ काम करेंगे।
इस समझौते ने भारत के लिए भी रणनीतिक सवाल खड़े किए हैं। इसकी वजह इंडोनेशिया की भागीदारी है, जिसके साथ भारत ने ब्रह्मोस मिसाइलों की आपूर्ति को लेकर रक्षा सहयोग बढ़ाया है। हालांकि बद्र समझौते को फिलहाल भारत के खिलाफ सैन्य गठबंधन मानने का कोई ठोस आधार सामने नहीं आया है। लेकिन पाकिस्तान, तुर्किये की रुख भारत के प्रति अच्छा नहीं रहा है ।
बद्र और मक्का समझौते में क्या अंतर है?
बद्र समझौते का मुख्य जोर रक्षा उपकरणों के निर्माण, तकनीक और औद्योगिक सहयोग पर है। तुर्किये अपनी रक्षा तकनीक और उत्पादन क्षमता के जरिए योगदान दे सकता है, पाकिस्तान और इंडोनेशिया विनिर्माण क्षमता उपलब्ध करा सकते हैं, जबकि कतर निवेश के अवसर दे सकता है।
इसके उलट पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच हुआ मक्का रक्षा समझौता सामूहिक सुरक्षा पर केंद्रित है । उसके तहत एक सदस्य पर सशस्त्र हमला बाकी सदस्यों पर हमला माना जाएगा, बद्र समझौते में ऐसी साझा सैन्य प्रतिक्रिया की प्रतिबद्धता घोषित नहीं की गई है।
भारत और ब्रह्मोस सौदे पर क्या असर पड़ सकता है?
पाकिस्तान के लिए यह समझौता रक्षा उत्पादन में सहयोग बढ़ाने और चीन पर अपनी सैन्य निर्भरता के अलावा दूसरे विकल्प विकसित करने का अवसर बन सकता है।
भारत के लिए इंडोनेशिया की भागीदारी पर नजर रखना जरूरी है, लेकिन भारत और इंडोनेशिया के रक्षा सौदों में तकनीकी जानकारी और बौद्धिक संपदा की सुरक्षा से जुड़े प्रावधान अहम हैं। फिलहाल बद्र समझौते का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि चारों देश घोषणाओं को कितने ठोस संयुक्त रक्षा प्रोजेक्ट में बदलते हैं।