रायपुर। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्म काछनगादी जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में पूरी हुई। 75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में यह रस्म बेहद अहम मानी जाती है। इस बार पनका समाज की 12 साल की पीहू दास पर काछनदेवी सवार हुईं। देवी ने बेल के कांटों से बने खास झूले पर झूलकर बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति दी गई। माना जाता है कि यह परंपरा 618 साल पुरानी है। अनुमति मिलते ही दशहरा की दूसरी धार्मिक रस्मों का रास्ता भी खुल गया।
9 दिन उपवास और पूजा
पीहू दास पांचवीं कक्षा में पढ़ती हैं। रस्म से पहले उन्होंने करीब 9 दिनों तक देवी की पूजा की और उपवास रखा। वे पांचवीं बार इस परंपरा में शामिल हुईं। इससे पहले पनका समाज की अनुराधा ने करीब पांच से 6 साल तक यह जिम्मेदारी संभाली थी। बस्तर दशहरा में अलग-अलग जाति और गांवों के लोगों को अलग-अलग काम सौंपे गए हैं। झारउमर और बेड़ाउमर गांव के लोग रथ बनाते हैं, जबकि काछनगादी की रस्म पनका समाज की कन्या निभाती है। यह सिलसिला कई पीढ़ियों से चल रहा है।
22 पीढ़ियों से एक ही परिवार बना रहा कांटों का झूला
रस्म में इस्तेमाल होने वाला बेल के कांटों का झूला भी परंपरा का अहम हिस्सा है। लामनी के रहने वाले जगत राम नेताम का परिवार करीब 22 पीढ़ियों से यह झूला बनाता आ रहा है। परिवार के लोग जंगल की बेल की कांटेदार डालियां लाकर झूला तैयार करते हैं। इस दौरान उनके घर में नौ दिनों तक अखंड दीपक भी जलता रहता है। परिवार ने आगे भी इस जिम्मेदारी को निभाते रहने का संकल्प लिया है।
नवरात्र से एक दिन पहले होती है रस्म
बता दें कि काछनगादी हर साल नवरात्र से ठीक एक दिन पहले होती है। बस्तर राजपरिवार के सदस्य और दशहरा समिति के पदाधिकारी काछनगुड़ी पहुंचकर देवी से उत्सव मनाने की इजाजत मांगते हैं। इजाजत मिलने पर आतिशबाजी की जाती है। काछनदेवी को रण की देवी भी कहा जाता है। पनका समाज की महिलाएं इस मौके पर धनकुल वाद के साथ गीत गाती हैं। रस्म के बाद जगदलपुर के गोल बाजार में रैला देवी की पूजा भी हुई। इसे देखने बस्तर संभाग के साथ दूसरे राज्यों से भी लोग पहुंचे थे।
सोमवार को जोगी बिठाई
काछनदेवी से अनुमति मिलने के बाद 12 अक्टूबर, सोमवार को कलश स्थापना के साथ जोगी बिठाई की रस्म होगी। इसी के साथ बस्तर दशहरा के अगले धार्मिक कार्यक्रम शुरू होंगे। बस्तर दशहरा की शुरुआत 12 अगस्त को पाट जात्रा की रस्म से हुई थी। इसमें लकड़ी के पाट की पूजा की गई। इस पर्व में मां दंतेश्वरी की आराधना की जाती है।