रायपुर। मैं छत्तीसगढ़ हूं... लोग मुझे धान का कटोरा कहते हैं, घने जंगल और खनिज संपदा से जोड़कर देखते हैं। पर मेरी पहचान बस इतनी नहीं है। मेरी मिट्टी में इतिहास की अनगिनत कहानियाँ दबी हैं। मैंने राजाओं का उठना और साम्राज्यों का गिरना भी देखा है। मेरे जंगलों में संघर्ष की गूंज रही है तो मेरी धरती पर मंदिरों और स्थापत्य कला कने सभ्यता पर अमिट छाप छोड़ी है। प्राचीन दक्षिण कोसल से आज एक अहम राज्य तक की मेरी यात्रा विरासत, वीरता और विकास की अनूठी गाथा है।
36 गढ़ों से बनी मेरी पहचान
प्रदेश के नाम के पीछे इतिहास की एक दिलचस्प कहानी है। माना जाता है कि इस इलाके में 36 किले या गढ़ थे। इसी वजह से इसका नाम छत्तीसगढ़ पड़ा। रायपुर जिले के गजेटियर (1973) में लिखा मिलता है कि इनमें 18 गढ़ शिवनाथ नदी के उत्तर में और 18 दक्षिण में थे। हालांकि नाम को लेकर एक दूसरा मत भी चलता है। इसके मुताबिक छत्तीसगढ़ शब्द चेदिशगढ़ का अपभ्रंश है, क्योंकि यह क्षेत्र लंबे समय तक चेटि राजवंश के अधीन रहा। नाम की उत्पत्ति पर भले ही अलग-अलग मान्यताएं हों, एक बात पर कोई विवाद नहीं कि मेरी ऐतिहासिक पहचान सदियों पुरानी है।
दक्षिण कोसल से राजवंशों की गौरवगाथा तक
प्रदेश बनने की कहानी प्राचीन दक्षिण कोसल से शुरू होती है। इतिहासकारों के अनुसार, वर्तमान छत्तीसगढ़ का भूभाग दक्षिण कोसल, महाकांतार और दण्डकारण्य जैसे ऐतिहासिक क्षेत्रों से जुडा रहा है। बस्तर का वन क्षेत्र प्राचीन माहकांतार का हिस्सा था। इसकी धरती ने कई महान राजवंशों का शासन देखा है। देशज राजर्षितुल्य, शरभपुरीय, पाण्डुवंश, नलवंश, छिंदक नागवंश, फणीनागवंश, सोमवंश और कलचुरी वंश ने यहां अपनी सत्ता कायम की। इनेक शासनकाल में मंदिरों, किलों और स्थापत्य कला का विकास हुआ। आज भी यहां मौजूद ऐतिहासिक धरोहरों उसी गौरवशाली अतीत की गवाही देती हैं। इन स्मारकों को देखकर लगता है कि मेरा इतिहास सिर्फ राजाओं और युद्धों का ब्योरा नहीं है। यह कला, संस्कृति और स्थापत्य के विकास की कहानी भी है।
मराठों से अंग्रेजों तक, संघर्ष की धरती
समय बदला तो इतिहास में नए अध्याय जुड़ते गए। मध्यकाल में यह क्षेत्र मराठा शासन के अधीन आया। स्थानीय रियासतों और जमींदारों ने यहां का प्रशासनिक ढांचा खड़ा किया। इसके बाद अंग्रेजों ने नियंत्रण अपने हाथ में लिया। पर मेरी धरती ने विदेशी शासन के आगे कभी आसानी से सिर नहीं झुकाया। 1857 की क्रांति के दौरान यहां भी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की ज्वाला धधकी। सोनाखान के वीर नारायण सिंह ने अंग्रेजों से लोहा लिया और अपने साहस व बलिदान से इतिहास में अमिट जगह बनाई। इसकी मिट्टी में ऐसे कई संघर्षों की यादें हैं। उन्होंने आजादी की चेतना को मजबूत किया। यहां के आदिवासी आंदोलनों ने भी अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाकर स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा दी।
आस्था औ संस्कृति की अनमोल विरासत
प्रदेश की पहचान सिर्फ इतिहास और वीरता तक सीमित नहीं है। मेरी सांस्कृतिक आत्मा मंदिरों, लोकपरंपराओं और धार्मिक आस्था में भी बसती है। बस्तर का दंतेश्वरी मंदिर, डोंगरगढ़ का बम्लेश्वरी मंदिर, रतनपुर का महामाया मंदिर, सक्ती का चंद्रहासिनी मंदिर और कबीरधाम का भोरमदेव मंदिर ऐसी धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत के अहम प्रतीक हैं। ये मंदिर सिर्फ पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं हैं। ये मेरे अतीत, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक परंपराओं के जीवंत प्रमाण भी हैं। यहां परंपराएं बीते दिनों की याद बनकर नहीं रह गईं। वे आज भी जनजीवन का हिस्सा हैं और नई पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं।
1 नवंबर 2000 को मिली नई पहचान
सदियों की ऐतिहासिक यात्रा के बाद 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के तहत मेरा एक नए राज्य के रूप में गठन हुआ। रायपुर को राजधानी बनाया गया। बाद में नवा रायपुर (अटल नगर0 को आधुनिक प्रशासनिक केंद्र के तौर पर विकसित किया गया। राज्य बनने के साथ ही क्षेत्रीय पहचान को नई मजबूती मिली। सामाजिक और आर्थिक प्रगति के नए अवसर खुले। विकास की राह पर बढ़ते हुए भी मैंने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को संजोकर रखा। आज तक की यात्रा बताती है कि परंपरा और आधुनिकता एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों साथ चलें तो किसी क्षेत्र को नई पहचान दे सकते हैं।
खनिज संपदा से औद्योगिक शक्ति तक
छत्तीसगढ़ के गर्भ में लौह अयस्क, कोयला, बॉक्साइट, डोलोमाइट और टिन जैसे खनिजों का भंडार है। इसी प्रचुरता ने देश के औद्योगिक विकास में मुझे अहम जगह दिलाई। भिलाई इस्पात संयंत्र ने मुझे देश के औद्योगिक नक्शे पर खास पहचान दी। यह देश के प्रमुख इस्पात कारखानों में गिना जाता है और मेरी औद्योगिक क्षमता का बड़ा प्रतीक है।
इतना ही नहीं कोरबा, रायगढ़, बिलासपुर और जांजगीर-चांपा जैसे जिले बिजली उत्पादन में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसी वजह से प्रदेश को देश के प्रमुख ऊर्जा उत्पादक राज्यों में गिना जाता है। मेरी औद्योगिक प्रगति सिर्फ कारखानों और बिजली संयंत्रों की कहानी नहीं है। यह उन संभावनाओं की झलक भी है, जो संसाधनों और सामर्थ्य में छिपी हैं।
अतीत की विरासत और भविष्य की संभावनाएं
आज प्रदेश ऐसे मुकाम पर खड़ा है, जहां गौरवशाली अतीत और विकासशील वर्तमान आपस में जुड़ते हैं। मेरी पहचान इतिहास, संस्कृति, प्राकृतिक संपदा और औद्योगिक प्रगति के अनूठे संगम से बनी है। मैंने पाण्डुवंश, छिंदक नागवंश और कलचुरी वंश जैसे महान राजवंशों का शासन देखा है।
प्रदेश ने मराठों का दौर देखा, अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष देखा और स्वतंत्र भारत में एक नए राज्य के रूप में अपना सफर शुरू किया। आज मेरी धरती पर विकास की नई संभावनाएं आकार ले रही हैं। सांस्कृतिक विरासत मुझे जड़ों से जोड़े रखती है, तो प्राकृतिक और औद्योगिक संपदा भविष्य की ओर बढ़ने की ताकत देती है।
मैं छत्तीसगढ़ हूं। मेरी कहानी सिर्फ बीते हुए गौरव की नहीं, बल्कि आज की उपलब्धियों और आने वाले कल की संभावनाओं की भी कहानी है। प्रदेश की असली पहचान इसी में है कि मैं अपनी विरासत को संजोते हुए लगातार आगे बढ़ रहा है।