नई दिल्ली/भोपाल। युवाओं के नेतृत्व वाली कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) में संगठनात्मक मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। बागी नेता मनीष ब्रह्मभट्ट ने मौजूदा नेतृत्व पर जमीनी कार्यकर्ताओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं देने और आम आदमी पार्टी (AAP) के कथित प्रभाव को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए CJP- डेमोक्रेटिक (CJP-D) नाम से अलग मंच बनाने की घोषणा की है।
ब्रह्मभट्ट ने गुरुवार को नई दिल्ली में CJP-D के गठन का ऐलान किया। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने के बाद आंदोलन के मूल स्वरूप में बदलावि आया है और संगठने के फैसलों में सीमित लोगों का प्रभाव बढ़ गया है। इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। रिपोर्ट लिखे जाने तक आप या अरविंद केजरीवाल की ओर से इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।
नेतृत्व के गठन को लेकर उठाए सवाल
ब्रह्मभट्ट का आरोप है कि CJP के राष्ट्रीय नेतृत्व के गठन के दौरान कई जमीनी कार्यकर्ताओं और स्वंयसेवकों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। उन्होंने दावा किया कि संस्थापक अभिजीत दिपके और 112 अन्य लोगों ने राज्य समन्वयकों और प्रदर्शनकारियों से व्यापक चर्चा किए बिना 12 सदस्यीय टीम तैयार की है। उन्होंने यह भी दावा किया कि जंतर-मंतर आंदोलने से जुड़े करीब 450 समन्वयकों को नेतृत्व संरचना में प्रतिनिधित्व नहीं मिला। ब्रह्मभट्ट ने आरोप लगाया कि टीम के आठ सदस्यों के आप से संबंध रहे हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ब्रह्मभट्ट ने सवाल उठाया कि यदि आंदोलन में अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं और सामाजिक समूहों से जुड़े युवा शामिल हैं। तब नेतृत्व में भी उसी तरह की विविधता क्यों नहीं दिखाई दे रही है।
महिला, छात्र और विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व का मुद्दा
बागी गुट ने केवल राजनीतिक संबंधों को लेकर ही सवाल नहीं उठाए है। उन्होंने महिलाओं, छात्रों और विभिन्न समुदायों की भागीदारी को लेकर भी चिंता जताई है। ब्रह्मभट्ट का कहना है कि जिन आंदोलन को अलग-अलग वर्गों के युवाओं का समर्थन मिला। उसके नेतृत्व में भी उन सभी समूहों की पर्याप्त भागीदारी होनी चाहिए। उनके अनुसार, सीजेपी-डी में निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्वयंसेवकों की भूमिका सुनिश्चित की जाएगी।
करीब एक महीने से चल रहा था विवाद
सीजेपी के भीतर मतभेद पिछले करीब एक महीने से बढ़ने की बात सामने आई है। ब्रह्मभट्ट और उसके सहयोगी कार्यकर्ता राहुल ने इससे पहले छत्रपति संभाजीनगर में अभिजीत दिपके के आवास के बाहर जमीनी कार्यकर्ताओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग को लेकर भूख हड़ताल की थी। खबरों के अनुसार, स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद दोनों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। मांगों पर सहमति नहीं बनने के बाद अब ब्रह्मभट्ट ने अलग संगठनात्मक मंच बनाने का फैसला किया ैह।
सीजेपी-डी में परामर्श से नेतृत्व चुनने का दावा
ब्रह्मभट्ट के अनुसार, सीजेपी-डी अपनी राष्ट्रीय टीम का चयन परामर्श की प्रक्रिया के जरिए करेगा। उनका दावा है कि नए मंच में स्वयंसेवकों को संगठन के फैसलों में अधिक भूमिका दी जाएगी। नए गुट की ओर से सोशल मीडिया, वाट्सऐप और मिस्ड कॉल के जरिए लोगों से जुड़ने की अपील की गई है। हालांकि, सीजेपी-डी ने अभी अपनी पूरी नेतृत्व संरचना, पदाधिकारियों की सूची और सदस्य संख्या सार्वजनिक नहीं की है।
कैसे शुरू हुआ था सीजेपी आंदोलन?
सीजेपी की शुरुआत एक व्यंगात्मक ऑनलाइन मंच के तौर पर हुई थी। जो बाद में युवा आंदोलन में बदल गया। बेरोजगार युवाओं को 'तिलचट्टे' कहे जाने के विवाद से जुड़े संदर्भ को आंदोलन ने अपने विरोध और पहचान के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया। धीरे-धीरे इसका ऑनलाइन अभियान सड़कों तक पहुंचा। परीक्षा में कथित अनियमितताओं, प्रश्नपत्र लीक, बेरोजगारी और सरकारी शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर आंदोलन किया गया। जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के बाद संगठन और उसके संस्थापक अभिजीत दिपके को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।
अभिजीत ने टीम बी के आरोपों को खारिज किया
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने पहले ही संगठन पर किसी राजनीतिक दल के प्रभाव के आरोपों को खारिज करत चुके हैं। उन्होंने कहा है कि सीजेपी एक जन दबाव समूह के रूप में छात्रों, शिक्षा और जबावदेही से जुडे़ मुद्दों पर काम करती रहेगी। दिपके ने कांग्रेस और आप की बी टीम होने के आरोपों पर तज कसते हुए कहा कि अलग-अलग राजनीतिक लोग संगठन को अलग-अलग पार्टियों की बी टीम बताते हैं। उनका कहना है कि सीजेपी किसी राजनीतिक दल की टीम नहीं,बल्कि 'छात्रों की ए टीम'है। हालांकि ब्रह्मभट्ट द्वारा लगाए गए सभी आरोपों पर सीजेपी की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आना अभी बाकी है।
सीजेपी के सामने अब क्या चुनौती?
सीजेपी में यह घटनाक्रम केवल नेतृत्व चयन को लेकर विवाद नहीं है। इसके साथ यह सवाल भी जुड़ गया है कि सोशल मीडिया से तेजी से उभरे युवा आंदोलन को किस तरह संगठित किया जाए और उसमें अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़े समर्थकों को कैसे साथ रखा जाए। आंदोलन के तेजी से विस्तार ने उसे समर्थन दिलाया। लेकिन औपचारिक संगठनात्मक ढांचे के निर्माण के साथ आंतरिक मतभेद भी सामने आए हैं। सीजेपी-डी का गठन अब इस बात की परीक्षा होगा कि उसे जमीनी कार्यकर्ताओं और राज्य समन्वयकों से कितना समर्थन मिलता है। वहीं मूल CJP के सामने संगठन के भीतर मतभेद सुलझाने और अपने छात्र-केंद्रित आंदोलन की पहचान बनाए रखने की चुनौती है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि CJP के कितने कार्यकर्ता और राज्य समन्वयक CJP-D के साथ गए हैं। दोनों पक्षों की वास्तविक सदस्य संख्या और संगठनात्मक ताकत आने वाले दिनों में ही स्पष्ट हो सकेगी।