हरदोई। लखनऊ खंड स्नातक विधान परिषद चुनाव में अब मुद्दा उम्मीदवारों की दावेदारी से आगे स्थानीय बनाम बाहरी की बहस तक पहुंच गया है। एक वरिष्ठ पत्रकार की सोशल मीडिया पोस्ट में नामांकन पत्रों में दर्ज पतों के आधार पर उम्मीदवारों के हरदोई से जुड़ाव पर सवाल उठाए गए हैं। लेकिन इस कसौटी को समानता से लागू किया जाए तो दूसरा सवाल भी उठता है, क्या नामांकन में दर्ज पोस्टल एड्रेस ही किसी उम्मीदवार की स्थानीय पहचान का अंतिम प्रमाण है? वहीं, सोशल मीडिया पर सपा समर्थकों ने पार्टी प्रत्याशी का बचाव किया है।
नामांकन विवरण के मुताबिक, भाजपा प्रत्याशी इंजी. अवनीश कुमार सिंह का पता जिले के कासिमपुर थाना क्षेत्र के तेरवा दहिगवां का है। वहीं, सपा प्रत्याशी कांति सिंह का पोस्टल एड्रेस लखनऊ के कृष्णानगर थाना क्षेत्र के बजरंगनगर का है। केवल इन पतों को आधार बनाकर स्थानीय और बाहरी का निष्कर्ष निकालना आसान है, लेकिन क्या इससे दोनों उम्मीदवारों का अपने-अपने क्षेत्र से वास्तविक जुड़ाव पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है?
बता दें कि एमएलसी चुनाव में नामांकन में पोस्टल एड्रेस के आधार पर स्थानीय बनाम बाहरी की बहस तेज है। हालांकि इस बीच समर्थकों ने कहा कि एसपी सिंह सदरपुर की माटी के पूत हैं तो कांति बहू है और ये सच बदल नहीं सकता।
सदरपुर से कांति का रिश्ता नाम का नहीं
कांति सिंह को लखनऊ के पते के आधार पर हरदोई से दूर बताने वाली बहस में उनके पारिवारिक और सामाजिक जुड़ाव का तथ्य भी महत्वपूर्ण है। कांति सिंह माधौगंज ब्लॉक के सदरपुर गांव की बहू हैं। उनके पति और प्रतापगढ़ के सांसद एसपी सिंह का सदरपुर से रिश्ता केवल पारिवारिक परिचय भर नहीं है। वह इसी गांव की मिट्टी में खेले, पले, पढ़े और बढ़े हैं। इस लिहाज से सदरपुर उनके जीवन और पहचान का अभिन्न हिस्सा है। माधौगंज में लखनऊ पब्लिक स्कूल संस्थान, पेट्रोल पंप और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की मौजूदगी कांति सिंह के परिवार के क्षेत्र से जुड़ाव की चर्चा में प्रासंगिक है। ऐसे में उनके राजनीतिक और सामाजिक रिश्तों का आकलन केवल लखनऊ में दर्ज पोस्टल एड्रेस के आधार पर करना तस्वीर का एक हिस्सा देखकर पूरी कहानी लिखने जैसा होगा।
स्थानीयता की कसौटी सबके लिए एक जैसी हो: पम्मू
अवनीश कुमार सिंह का हरदोई के तेरवा दहिगवां से जुड़ाव उनकी स्थानीय पहचान का है। उसी तरह कांति सिंह का सदरपुर से रिश्ता और उनके पति एसपी सिंह का गांव से जीवन भर का जुड़ाव भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। समाजवादी पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष पद्मराग सिंह यादव पम्मू कहते हैं, सवाल किसी एक उम्मीदवार को स्थानीय या बाहरी घोषित करने का नहीं, बल्कि यह है, दोनों के संबंधों का आकलन एक ही कसौटी पर किया जाए।
मतदाता विवेकशील, नाम नहीं, काम को बनाएगा आधार
एक प्रत्याशी के नाम से मिलते-जुलते उम्मीदवारों की मौजूदगी और चुनावी गणित को प्रभावित करने की कथित कोशिशों पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, इसे किसी उम्मीदवार की सुनियोजित रणनीति बताने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी हैं। बिलग्राम-मल्लावां क्षेत्र के युवा एक्टिविस्ट रविकांत पटेल कहते हैं, आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन उन्हें स्थापित तथ्य की तरह पेश करना उचित नहीं होगा। स्नातक मतदाता समझदार हैं। वे पोस्टल एड्रेस के साथ उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि, क्षेत्र से संबंध, उपलब्धता और काम को भी परख सकते हैं। आखिरकार, चुनाव में स्थानीय पहचान का फैसला किसी सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं, मतदाताओं के विवेक से होगा।