बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के झीरम घाटी हत्याकांड में 10 दोषियों को फांसी की सजा मिली है। इस पर अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की परख से गुजरेगी। जगदलपुर की राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण यानी एनआईए की विशेष अदालत ने 16 सितंबर 2026 को सभी 10 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया था। कानून के अनुसार ऐसी सजा तभी पक्की मानी जाती है जब हाईकोर्ट उस पर मुहर लगा दें।
हालांकि झीरम घाटी हत्याकांड में 10 दोषियों को दी गई फांसी की सजा का मामला अब हाईकोर्ट पहुंच चुका है। पर सुनवाई की तारीख अभी तय नहीं हुई है। लेकिन यह खबर बाहर आने के बाद फिर एक बार चर्चा शुरू हो गई है।
फांसी की सजा पर हाईकोर्ट की पुष्टि क्यों जरूरी है?
निचली अदालत जब किसी को मृत्युदंड देती है तो कानूनी प्रक्रिया में उसकी पुष्टि हाईकोर्ट से कराना अनिवार्य होता है। इसी नियम के तहत विशेष अदालत ने यह मामला हाईकोर्ट भेजा है। हाईकोर्ट की खंडपीठ केस के अभिलेख और विशेष अदालत का फैसला दोबारा देखेगी। दोषियों को फैसले के खिलाफ अपील के लिए 30 दिन का समय भी दिया गया था। हाईकोर्ट की न्यायिक समीक्षा पूरी होने के बाद ही फांसी की सजा पर अंतिम मुहर लगेगी।
13 साल की सुनवाई और 101 गवाहों के बयान
विशेष अदालत के न्यायाधीश अजय सिंह राजपूत ने 5 सितंबर 2026 को 10 आरोपितों को दोषी करार दिया था। सजा का ऐलान 16 सितंबर को हुआ। न्यायिक प्रक्रिया करीब 13 साल चली और इस दौरान 101 गवाहों के बयान दर्ज हुए। केस में कुल 11 आरोपी थे। एक की सुनवाई के दौरान मौत हो गई। बाकी सभी 10 को अदालत ने दोषी माना और मृत्युदंड सुनाया।
25 मई 2013 को बस्तर की झीरम घाटी में क्या हुआ?
बता दें कि 25 मई 2013 को बस्तर जिले के दरभा थाना क्षेत्र की झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया था। इस हमले में कांग्रेस के कई सीनियर नेताओं समेत 29 लोगों की जान गई और कई लोग घायल हुए। मृतकों में तत्कालानी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा भी थे।
हाईकोर्ट के फैसले केबाद क्या होगा?
चर्चित हत्याकांड में मृत्युदंड दिए जाने के बाद अब आगे की कानूनी राह हाईकोर्ट की समीक्षा से तय होगी। उसके फैसले से ही साफ होगा कि दोषियों की फांसी की सजा कायम रहती है या नहीं।